<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252</id><updated>2012-01-26T03:16:23.702-08:00</updated><category term='power'/><category term='PM'/><category term='It was this pose that made a mahajanpad lay prostrate before the fury and revenge of a courtesan'/><category term='pranab mukharjee'/><category term='surveillance'/><title type='text'>आम्रपाली</title><subtitle type='html'>और जाओ... जला कर राख कर दो वैशाली को इस आग में...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>110</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-6871742833125939359</id><published>2012-01-24T22:55:00.001-08:00</published><updated>2012-01-24T23:42:12.616-08:00</updated><title type='text'>कोसी महासेतु दर्शन-2</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-mNaw_oJppSg/Tx-ug0QxAfI/AAAAAAAAAg4/CIuuT2lAdow/s1600/Laxminath%2BGosain.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 238px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-mNaw_oJppSg/Tx-ug0QxAfI/AAAAAAAAAg4/CIuuT2lAdow/s320/Laxminath%2BGosain.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701467532082348530" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;एक जमाना था जब दोनों इलाके रेललाईन से जुड़े हुए थे। निर्मली से भपटियाही रेललाईन थी। लेकिन सन् 1934 के भूंकंप &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt; में वो पुल भी टूट गया। फिर तो सारा कुछ बर्बाद हो गया। तमाम पुराने संबंध खत्म होते गए। दरभंगा-मधुबनी वालों के लिए सहरसा-पूर्णिया की चर्चा दंतकथा जैसी हो गई। मेरी दादी बताती थी कि उस पार परसरमां की एक काकी &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;थीं, उधर चैनपुर नामका कोई गांव था। हम गौर से उन गावों का नाम सुनते और कल्पना करते कि वे गांव कहां होंगे। हम बनगांव-महिषी का नाम सुनते और वहां की प्रसिद्ध उग्रतारा भगवती की कहांनियां सुनते। कोई दूर के संबंधी उधर से आते तो बनगांव के संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं की कहानी सुनाते। हवा का कोई ताजा सा झोंका आता।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;&lt;span&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हम चाहक&lt;/span&gt;&lt;span&gt;र भी उस पार आसानी से नहीं जा पाते। सहरसा या पूर्णिया जाने का मतलब था पांच जिला पा&lt;/span&gt;&lt;span&gt;र कर के जाना। ट्रेन या बस से जाने का मतलब था लगभग 18-20 घंटे का सफर। ऐसा ही उस पार के लोगों के लिए भी था। दिल्ली जाना आसान लगता था, लेकिन पुर्णिया जाना दुरुह। हम रेणु का मैला आंचल पढ़कर अंदाज लगाते कि फारबिसगंज कैसा होगा। पुरनिया कैसा होगा। श्रीनगर, चंपानगर स्टेट, गढ़बनैली स्टेट, कुमार गंगानंद सिंह...सिंहेश्वर स्थान.. मैथिली-हिंदी के ढ़ेरों प्रसिद्ध साहित्यकार उधर से हुए। हिंदी-मैथिली के प्रसिद्ध साहित्यकार राजकमल चौधरी महिषी के ही थे।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;br /&gt;पिताजी की एक बुआ उधर ही ब्याही थी, परिहारी गांव में। शायद पुर्णियां में है। दादाजी अक्सर उस पार जाते, बताते कि उधर पटुआ(पटसन) की खेती बहुत होती है। किसानों के पास बहुत जमीन हैं। बड़े जमींदार हैं, लेकिन साथ ही ये भी बताते कि इलाका &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI"&gt;थोड़ा पिछड़ा&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI"&gt; हुआ है। सड़के खराब हैं...और लोग &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI"&gt;मोटा खाते-पहनते&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI"&gt; हैं&lt;/span&gt; ! &lt;span lang="HI"&gt;ये बातें उस वक्त समझ में नहीं आती थी। हम &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;मधुबनी-दरभंगा के लोग अपने आपको थोड़ा ऊंचा समझते! अकड़ में रहते! कोसी के इलाके को हमारे इलाके के लोगों ने &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;कोसिकंधा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;’&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt; बना दिया!&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;img src="http://2.bp.blogspot.com/--cbAMp58Yzg/Tx-u1tYqycI/AAAAAAAAAhE/zj6InJzrP3I/s320/kosi-shifting-course%2Bin%2Bhistory.gif" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701467891013700034" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 238px; height: 320px; " /&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;&lt;span lang="HI"&gt;दरभंगा वालों ने उन्हें हमेशा कम करके आंका। एक श्रेष्टतावोध उन पर हमेशा हावी रहा!शायद ऐसा मैथिली साहित्य में भी हुआ। दरभंगा और सहरसा वालों में अक्सर शीतयुद्ध चलता रहता। दरभंगा वाले अक्सर अपनी मैथिली को मानक मैथिली साबित करने की कोशिश करते। वे उधर की मैथिली पर ना&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;क-भौं सिकोरते। दुर्भाग्यवश कमोवेश अभी भी वैसी ही मानसिकता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;ये बातें बचप&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;न &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;में भेजे में अंटती &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;नहीं थी। हमें क्या पता था कि कोसी ने बीती सदियों में उस इलाके का ये हा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;ल &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;कर दिया है कि हमारे इलाके के लोग उसे &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;कोसिकंधा&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt; कहने लगे।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;पिछली ढ़ाई शताब्दियों में कोसी करीब &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;120 किलोमीटर &lt;a href="http://www.martinfrost.ws/htmlfiles/aug2008/flood-calamity-koshi.html"&gt;खिसक क&lt;/a&gt;र पश्चिम आ गई।&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;पिछली बार यह चालीस के दशक में पश्चिम की &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;तरफ खिसकी थी। यानी इसने करीब 8 बार अपनी धारा बदली। सैकड़ों गांव, हजारों-लाखों लोग बेघर हो गए&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;।जमीन रेत से पट गई। तो फिर उस इलाके का क्या हाल हुआ होगा...&lt;/span&gt;?&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;आजादी के बाद कुछ कोशिशें हुई, लेकिन कामयाब नहीं हो पाई। पचा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;स के दशक में नेपाल के साथ एक समझौता करके &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;कोसी पर तटबंध बनाने की शुरुआत हुई। कोसी की भुजाओं में मानो हथकड़ी डाल दिया गया। साठ के दशक में प्रसिद्ध नदी घाटी परियोजना कोसी प्रोजेक्ट शुरु हुई। मेरे गांव से होकर पश्चिमी कोसी नहर की मु&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;ख्य शाखा जाती है। इसे सन् 1983 में पूरा हो जाना था। तीस साल होने को आए, लेकिन वो आज तक नहीं बन पाई। सुना कि पूर्वी कोसी नहर लगभग&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-FRRviD8LAe0/Tx-wdoWX7SI/AAAAAAAAAhQ/xDQrLPcEapc/s320/kosi_barrage.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701469676368293154" style="float: right; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 10px; margin-left: 10px; cursor: pointer; width: 320px; height: 204px; " /&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;कामयाब हो गई। अगर ठीक से शोध कि&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;या जाए तो पश्चिमी कोसी नहर की विफलता बिहार के भ्रष्टाचार की कहानियों में शीर्ष स्थान हासिल करेगी।&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;लेकिन लाख प्रयासों के बावजूद कोसी पर फिर से पुल नहीं बनाया जा सका। न तो रेल पुल, न ही सड़क पुल। इस तथ्य के बावजूद कि सूबे पर लंबे समय तक राज करनेवाला और राजनीति को प्रभावित करनेवाला एक प्रमुख परिवार उसी इलाके से आता था। पूर्व रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र को इलाके में काफी प्रतिष्ठा मिली-खासकर मधुबनी-दरभंगा में। कहते है कि उन्होंने कोसी पर फिर से रेल पुल बनवाने की कोशिश भी की थी। लेकिन इसमें वे कामयाब हो पाते, इससे पहले ही वे दुनिया से कूच कर गए। उनके मुख्यमंत्री भाई ने फिर उस इलाके की तरफ बहुत ध्यान नहीं दिया।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;करीब एक दशक पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी ने कोसी पुल का शिलान्यास किया तो अचानक एक उम्मीद सी जगी। सदियों की प्यास मानों जिंदा हो उठी। सन् 2012 में अब वो जुड़ाव पूरा हो गया है। कोसी पुल के साथ बिल्कुल उससे सटे हुए रेल पुल का भी निर्माण हो रहा है। राजनीतिक कारणों से उसमें विलंब हो रहा है। मैं पुल पर ख़ड़ा होकर सोच रहा हूं कि अगली बार चाय पीने पुरनियां जरुर जाऊंगा। या फिर अपने जैसे यार मिल गए तो सिलीगुड़ी तक जाऊंगा। उस पार से छोटी बसों और टैक्सियों में सबार होकर कुछ झुंड के झुंड स्कूली बच्चे कोसी पुल देखने आ रहे हैं। कभी पंडित नेहरु ने कल-कारखानों और पुलों को आधुनिक भारत का तीर्थ कहा था। ये बच्चे उसी तीर्थ को देखने आए हैं। उनकी आंखों की चमक में मैं इस इलाके का सपना ढ़ूंढ रहा हूं। वो सपना मुझे साफ दिखाई दे रहा है। (जारी)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-6871742833125939359?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/6871742833125939359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=6871742833125939359' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6871742833125939359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6871742833125939359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2012/01/2.html' title='कोसी महासेतु दर्शन-2'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-mNaw_oJppSg/Tx-ug0QxAfI/AAAAAAAAAg4/CIuuT2lAdow/s72-c/Laxminath%2BGosain.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4150841848242222094</id><published>2012-01-24T06:50:00.000-08:00</published><updated>2012-01-24T08:27:28.759-08:00</updated><title type='text'>कोसी महासेतु दर्शन-1</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-3lso-VM6JnU/Tx7I0pUQ1uI/AAAAAAAAAfo/nNIx7jT29_w/s1600/NH57.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 240px; height: 180px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-3lso-VM6JnU/Tx7I0pUQ1uI/AAAAAAAAAfo/nNIx7jT29_w/s320/NH57.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701214985067222754" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-3lso-VM6JnU/Tx7I0pUQ1uI/AAAAAAAAAfo/nNIx7jT29_w/s1600/NH57.jpg"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;पिछले महीना गांव गया तो कोसी पुल देखने देखने गया। बहुत दिनों से मन में इच्छा थी कि कोसी पुल को देखा जाए, कोसी नदी को देखा जाए। सो इस बार गांव जाते ही एक दोस्त के साथ बाईक पर सबार हुआ और चला निर्मली की तरफ... जहां कोसी पर महासेतु का निर्माण किया गया है।&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;निर्मली में जहां कोसी महासेतु है, वो जगह मे&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;रे गांव खोजपुर से करीब 45 किलोमीटर&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;पूरब है। सड़कें अच्छी हो गई है। मेरे गांव से खुटौना 7 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है और वहां से फुलपरास करीब 18 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व । फुलपरास में हमें एनएच 57 मिल जाती है जो ईस्ट-वेस्ट कॉरिडोर का हिस्सा है। ये सड़क चार लेन की है जो गुजरात से मिजोरम तक जाती है। पोरबंदर से शुरु होकर यह सड़क, राजकोट, कांडला, उदयपुर, कोटा, झांसी, कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर होते हुए गोपालगंज में बिहार में प्रवेश करती है। फिर मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी होते हुए सुपौल, अरड़िया, पुर्णिया चली जाती है। फिर वहां से बंगाल, असम और मिजोरम। ऐसी सड़क इससे पहले बिहार में सिर्फ जीटी रोड &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;थी जो स्वर्णिम चतुर्भुज का हिस्सा है और गया के पास से गुजरती है। अब तो बिहार में कई जगह चार लेन की सड़के बन रही है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;&lt;span lang="HI"&gt;&lt;br /&gt;तो हम बात कर रहे थे &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;कोसी महासेतु दर्शन की। हम सुबह करीब 10 बजे चले थे। पुराना वक्त होता तो हम जाने की हिम्मत नहीं कर पाते। एक तो पहले सड़कें खराब थी और फिर उस इलाके को &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI"&gt;कोसिकंधा&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI"&gt; बोलते थे।&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt; पता नहीं कब क्या हो जाए। कोसिकंधा अपने आप में नकारात्मक भाव छुपाए रखता था, कोसी ने इलाके को तबाह कर दिया था। फिर भी लोग कोसी को &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI"&gt;महारानी&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI"&gt; या &lt;/span&gt;‘&lt;span lang="HI"&gt;मैइया&lt;/span&gt;’&lt;span lang="HI"&gt; बोलते&lt;/span&gt;! &lt;span lang="HI"&gt;शायद इसका कारण भय रहा हो, या नदियों के प्रति हमारी श्रद्धा&lt;/span&gt;!&lt;span lang="HI"&gt; लेकिन अब माहौल दूसरा था। हम &lt;/span&gt;&lt;span&gt;फुलपरास में रुके, वहां पान खाया, बाईक में तेल डलवाया और फिर रवाना हुए निर्मली की तरफ।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;img src="http://4.bp.blogspot.com/-SLTYZGw2ytw/Tx7JXv6BgiI/AAAAAAAAAfw/vMcRu6o60f8/s320/Kosi1.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701215588131635746" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 320px; height: 240px; " /&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;अ&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;ब &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;ह&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;म &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;चा&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;र लेन की &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;सड़क पर थे। निर्मली महज 20 किलोमीटर दूर &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;थी, यानी बीस मिनट का सफर था। ये बाढ़ का इलाका है, कोसी की कई सहायक नदियां इधर से बहती हैं। भुतही बलान, तिलयुगा, सुगरवे और न जाने क्या-क्या। इन नदियों का नाम मैं बचपन से सुनता आ रहा था, लेकिन इस इलाके&lt;/span&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;में जाना पहली बार हो रहा था। सड़क जमीन से काफी ऊपर बनी है। शायद ऐसा &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;इसलिए कि बाढ़ का पानी उस पर चढ़ न जाए। हरेक किलोमीटर-दो किलोमीटर पर पानी के बहाव के लिए साईफन बनाया गया है। हरेक नदी-नाले के ऊपर भीमकाय पुल बनाया गया है। हम हरेक पुल पर उतर कर वहां से नीचे पानी के बहाव को देखते। ये बरसाती नदियां हिमालय से नेपाल की तरफ से आती हैं। ये नदियां कभी बाढ़ के लिए कुख्यात रही हैं, इतनी कुख्यात की लोगों ने इनका नाम भुतही, सुगरवे न जाने क्या-क्या रख दिया&lt;/span&gt;!&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;फुलपरास से आगे(पूरब) भुतही बलान है, फिर नरहि&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;या गांव&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt; और उसके पूरब कोसी। यानी नरहिया, भुतही और कोसी के बीच में है। बुजुर्गों का कहना है कि नरहिया पहले बाजार हुआ करता था। लेकिन पश्चिम से भुतही ने और पूरब से कोसी ने उसे काटना शुरु कर दिया। नरहिया बाजार उजड़ गया। ये सन् 50 के दशक की बात होगी। नरहिया के व्यापारी आस-पड़ोस के गांवों-कस्बों में पलायन कर गए। नरहिया से पूरब और भी ऐसे कई गांव थे जो अब कोसी के पेट में समा चुके हैं। उनका नामो-निशान इस दुनिया से मिट चुका है। वहां के लोग प्रवासियों की तरह दिल्ली-मुम्बई और पटना-सहरसा में रह रहे हैं। बहरहाल ये कहानी आगे।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;नरहिया से आगे गए तो तिल&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;युगा घार&lt;/span&gt;(&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt; ये बरसाती नदी भी नेपाल की तरफ से आती है, जो फिर कोसी में ही मिल जाती है) मिला, फिर कोसी का पुराना पश्चिमी तटबंध। वो तटबंध कोसी के पश्चिमी किनारे पर बनाई गई थी और नेपाल की तरफ से आती है। उस पर पक्की सड़क बन रही थी। बिहार सरकार तन्मयता से सड़क निर्माण कार्य में जुटी हुई थी। उसके बाद कोसी का मूल इलाका शुरु होता है। यानी वो इलाका जो नदी का पाट नहीं था लेकिन जब नदी में &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;पानी आती थी तो वहां तक का कम से कम पूरा हिस्सा जलाप्लावित हो जाता था। ऐसा ही तटबंध कोसी के पूर्वी तट पर भी बनाया गया था। यानी कोसी का पाट मान लीजिए 4-5 किलोमीटर चौड़ा होगा तो दोनो तटबंधों के बीच का इलाका कम से कम 15 किलोमीटर चौड़ा होगा। यानी ये इलाका कोसी के रहमोकरम पर था। इसमें कई गांव थे, हैं, जो बाढ़ के वक्त प्रकृति के रहमोकरम पर जिंदा रहते हैं। यों, इस वजह से यहां &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;की आबादी बिरल है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;बहरहाल, हम पश्चिमी तटबंध के नजदीक एक पान की दुकान पर रुके। महासेतु की दूरी पूछी तो पता चला कि महज 5 किलोमीटर है। हाईवे पर खूबसूरत साईनबोर्ड चमक रहे थे...पूर्णिया 140 किलोमीटर, फारबिसगंज 80 किलोमीटर, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;गोहाटी 700 किलोमीटर...&lt;/span&gt;!&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt; यकीन नहीं हो रहा था कि यहां से पूर्णिया मात्र तीन घंटे की दूरी पर है...और फारबिसगंज मात्र सवा घंटे में...&lt;/span&gt;! &lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;रेणु के उपन्यास का पुरनियां...फारबिसगंज....मैलां आंचल का इलाका...&lt;/span&gt;!&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;img src="http://3.bp.blogspot.com/-zhsk-cRlUS0/Tx7WIvMYtcI/AAAAAAAAAf8/M5M2PNYIdH0/s320/kosi%2Bbridge.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5701229623893341634" style="float: left; margin-top: 0px; margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; margin-left: 0px; cursor: pointer; width: 250px; height: 200px; " /&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;रास्ते में हा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;ईवे पर कई मरे हुए जानवर मिले। खासकर गीदड़ और कुत्ते। एक जगह कुछ भेड़ भी मरे हुए मिले। &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;लोगों ने &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;बताया कि हाईवे पर इतनी तेज रफ्तार से गाड़िया चलने लगी है कि बहुत जानवर मरते हैं। भेड़हरों&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;(&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; "&gt;गड़ड़िये) के एक समूह से बात हुई, उसने कहा कि वो सुपौल की तरफ से आया है। उसने पूछा कि बाबू आपकी तरफ भी हमारी जाति के लोग हैं क्या..&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt;?&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; "&gt; &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;ज्यों-ज्यों कोसी के नजदीक जाता गया, आबादी बिरल होने लगी। मीलों तक निर्जन जमीन...उजाड़ सी धरती। नीची जमीन...लो लैंड..नदी के किनारें कई किलोमीटर तक बालू ही बालू...। अतीत में आई बाढ़ की विभिषिका ने मानों जीवन को लील लिया था।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;आखिरकार हम कोसी महासेतु के नजदीक पहुंच गए। पुल से पहले हाईवे टॉल प्लाजा बनाया जा रहा था। उसका रंग-रोगन किया जा रहा था। पूछने पर पता चला कि 6 फरवरी को पुल का उद्घाटन होनेवाला है। प्रधानमंत्री आएंगे।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;o:p&gt; &lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI"&gt;आखिरकार हम पुल पर पहुंच ही गए। हमने बीच पुल पर अपनी बाईक खड़ी की। हमारा दिल धड़क रहा था। हम उस नदी को गौर से देखना चाहते थे जो उत्तर-बिहार का शोक कही जाती थी। जिसने मिथिला को भौगोलिक रूप से दो भागों में बांट दिया था। ऐसा लग रहा था मानो भारत-पाकिस्तान बन गया हो। मधुबनी-दरभंगा एक तरफ और सहरसा-पूर्णिया एक तरफ। हम पुल के उस पार यानी नदी से पूरब की तरफ कुछ दूर गए। हमने पूरब के आसमान को ताका। दूर क्षितिज पर कुछ पंछी उड़ रहे थे। शायद वे पुर्णिया की तरफ से आ रहे थे...&lt;/span&gt;! (&lt;span lang="HI" style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI"&gt;जारी)&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4150841848242222094?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4150841848242222094/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4150841848242222094' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4150841848242222094'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4150841848242222094'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2012/01/1.html' title='कोसी महासेतु दर्शन-1'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-3lso-VM6JnU/Tx7I0pUQ1uI/AAAAAAAAAfo/nNIx7jT29_w/s72-c/NH57.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3570366312725781525</id><published>2011-06-21T23:42:00.000-07:00</published><updated>2011-06-21T23:55:31.085-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='surveillance'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='power'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='PM'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='pranab mukharjee'/><title type='text'>क्या प्रणब मुखर्जी, वी पी सिंह की राह पर चलना चाहते थे ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-BK_IZC9oq_A/TgGRzGSw96I/AAAAAAAAAdU/Hh6ukpJL9aE/s1600/Pranab_Mukherjee___94142a.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 223px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-BK_IZC9oq_A/TgGRzGSw96I/AAAAAAAAAdU/Hh6ukpJL9aE/s320/Pranab_Mukherjee___94142a.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5620934116983764898" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि वित्त मंत्रालय में पहली बार खुफियागिरी की गई है। बड़े कॉरपोरेट हाउस, दलाल, टेंडर माफिया पहले भी वहां से गुप्त सूचनाएं हासिल करते थे लेकिन वो खुफियागिरी नहीं बल्कि मिलीभगत होती थी। कहते हैं कि 'घोषित तौर पर' देश का सबसे अमीर अंबानी परिवार इन्ही कुछ वजहों से इतनी लंबी छलांगे मार पाया। लेकिन देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी वित्तमंत्री ने अपने कार्यालय में 'सेंध' लगाने की घटना को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया हो। मजे की बात ये भी कि उसकी जांच निजी जासूसों से भी करवाई गई। बकौल वित्तमंत्री, उन्होंने सितंबर में ही प्रधानमंत्री को इस बावत चिट्ठी लिखी थी और आईबी ने इसकी जांच की थी जिसमें उसने 'कुछ नहीं' पाया था। फिर निजी जासूसों से जांच करवाई गई और जांच अपने विभिन्न चरण में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीडिया अभी तक यहीं सवाल पूछ रहा है कि इस मामले की निजी जासूसों से जांच करवाने की क्या जरुरत थी और मुखर्जी ने गृहमंत्रालय में शिकायत न करके सीधे प्रधानमंत्री से ये बात क्यों कही। ये कहा जा रहा है कि मुखर्जी के चिदंबरम् से गंभीर मतभेद है ! ये बातें इस आधार पर की जा रही है कि मुखर्जी चाहते तो दिल्ली पुलिस, सीबीआई या फिर आईबी से जांच करवाते या फिर चिंदंबरम् से शिकायत करते। लेकिन जो सवाल मीडिया नहीं पूछ पा रहा है वो ये कि क्या वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, राजीव गांधी के कार्यकाल में वित्तमंत्री रहे वी पी सिंह की राह पर अग्रसर हैं? और क्या उनकी जांच 10 जनपथ ने करवाई है? क्या कांग्रेस आलाकमान को ये एहसास हो गया था कि वे ब्लैक मनी की सूचनाओं का इस्तेमाल उसी तरह कर सकते हैं जिस तरह वी पी सिंह ने बोफोर्स घोटाले का किया था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल ही में दिग्विजय सिंह ने बयान दिया था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए 'बिल्कुल' तैयार है ! जाहिर सी बात है कि ये बयान मनमोहन सिंह के खिलाफ तो नहीं ही था। सो मनमोहन सिंह को इसका दुख भी नहीं हुआ क्योंकि वे जानते हैं कि जिस दिन से वे प्रधानमंत्री बने हैं उसी दिन से राहुल गांधी तैयारी कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह का बयान दरअसल प्रणब मुखर्जी के खिलाफ था जो सन् 1984 से इस पद के दावेदार हैं। मौजूदा भ्रष्टाचार के आलम में सरकार का सबसे मजबूत चेहरा प्रणब मुखर्जी ही हैं जिसका अपराध यहीं है कि उनमें राजनीतिक काबिलियत कूट-कूट कर भरी हैं और वे राजनीतिक पृष्ठभूमि के रहे हैं। नेहरु परिवार अब वो जोखिम मोल नहीं ले सकता जो उसने सन् 1991 में नरसिंह राव के लिए रास्ता खालीकर लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता-सुरंग में आवाजाही करनेवाले कई लोग ये भी कहते हैं कि बाबा रामदेव के अनशन पर 'पुलिसिया आक्रमण' में भी प्रणब मुखर्जी को भरोसे में नहीं लिया गया। ये सब चिदंबरम्( जो वैसे भी दिल्ली पुलिस के सुपर-मुखिया हैं) और 10, जनपथ के इशारे पर किया गया ताकि मामला इतना तूल न पकड़ ले कि उसकी लपट में 10,जनपथ तक आ जाए। प्रणब मुखर्जी अपने बयान में कह चुके हैं कि उन्हें ब्लैक मनी जमा करनेवाले लोगों के बारे में मालूम है लेकिन कानून और 'परंपराओं' के तहत उनके हाथ 'बंधे' हुए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखा जाए, तो मुखर्जी को अपनी जिंदगी में वो सब हासिल हो चुका है जिसकी आकांक्षा एक औसत कांग्रेसी राजनेता को होती है। हां, अभी तक उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी नहीं मिली है। लेकिन कांग्रेस में भी ऐसे महात्वाकांक्षी नेताओं की लंबी लिस्ट रही है जिन्होंने नेहरु राजवंश से दो-दो हाथ किए हैं और लड़-झगड़कर एक-आध साल के लिए ही सही प्रधानमंत्री जरुर बने है। मोरारजी देसाई और वी पी सिंह ऐसे ही उदाहरण रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सवाल ये है कि क्या प्रणब मुखर्जी, वी पी सिंह की तरह कांग्रेस छोड़कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व कर सकते हैं या उनमें ये मा्द्दा है? सपाट तौर पर इसका जवाब ना में है। वे लड़ाकू राजनेता और व्यापक जनाधार वाले नहीं है,उन्होंने हमेशा टेबुल की पॉलिटिक्स की है। लेकिन कांग्रेस के अंदर रहकर ही वे अपने नाम पर मुहर लगवाने का ख्वाब जरुर पाल सकते हैं या पालते रहे हैं। इसकी बानगी उनके कई बयानों में देखने को मिलती है, मसलन जब हाल ही में उनसे उनके बेटा को टिकट मिलने के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि टिकट पर किसी का कोई नैतिक दावा नहीं हो सकता, मैं भी सन् 1984 में 'वरिष्टतम' कैबिनेट मंत्री था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस जिस विश्वासहीनता के भंवर में फंसी दिखती है उसमें मुखर्जी के लिए इससे मुफीद वक्त कोई नहीं हो सकता। उन्हें कांग्रेस छोड़कर जाने या बिगुल फूंकने की कोई जरुरत नहीं है, न ही इसका उन्हें फायदा ही होगा। एक 'ढ़ीलीढ़ाली' और 'नेतृत्व-विहीन' सरकार में उनके सामने प्रधानमंत्री बनने के भरपूर अवसर है सिवाय नेहरु परिवार रुपी रोड़े के। तो क्या प्रणब मुखर्जी कुछ ऐसा करनेवाले थे जिससे नेहरु परिवार की बड़े पैमाने पर बदनामी होती? यही् वो सवाल है जिसमें ये राज छुपा है कि वित्तमंत्रालय की खुफियागिरी कौन कर रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, बुढ़ापा भी जोखिम उठाने के लिए बुरा वक्त नहीं माना जाता खासकर तब जब दाव ऊंचे लगे हों।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3570366312725781525?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3570366312725781525/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3570366312725781525' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3570366312725781525'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3570366312725781525'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='क्या प्रणब मुखर्जी, वी पी सिंह की राह पर चलना चाहते थे ?'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-BK_IZC9oq_A/TgGRzGSw96I/AAAAAAAAAdU/Hh6ukpJL9aE/s72-c/Pranab_Mukherjee___94142a.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3341177896303241975</id><published>2011-03-07T22:44:00.000-08:00</published><updated>2011-03-07T23:10:03.872-08:00</updated><title type='text'>बिहार की तीन 'मासूम' घटनाएं</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-8T6_w5iHqWM/TXXUlNkX76I/AAAAAAAAAcg/i2-O5zcyCHs/s1600/ganga%2Baarti%2Bpatna.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-8T6_w5iHqWM/TXXUlNkX76I/AAAAAAAAAcg/i2-O5zcyCHs/s320/ganga%2Baarti%2Bpatna.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5581601048958070690" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-bTKJeMNmUPY/TXXTPqEtoyI/AAAAAAAAAcY/-o_wsD2iYLw/s1600/simariya%2Bkumbh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-bTKJeMNmUPY/TXXTPqEtoyI/AAAAAAAAAcY/-o_wsD2iYLw/s320/simariya%2Bkumbh.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5581599579141153570" /&gt;&lt;/a&gt;सरसरी निगाह से देखने पर ये घटनाएं सामान्य लगती हैं, लेकिन ये घटनाएं उतनी सरल हैं नहीं जितनी प्रतीत होती हैं। दरअसल हाल में बिहार में तीन घटनाएं साथ-साथ हुई हैं जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया ने कायदे से रिपोर्ट नहीं किया या हड़बड़ी में या जानबूझकर या अयोग्यतावश इनके निहितार्थों को नजरअंदाज कर दिया। घटना नंबर एक है बिहार के सिमरिया में कुंभ मेले के आयोजन का प्रयास। दूसरी घटना है पटना में बिहार सरकार द्वारा गंगा आरती की शुरुआत और तीसरी है आरएसएस द्वारा मुसलमानों को लेकर हाल ही में किया गया सर्वे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे किसी भी संगठन को किसी भी तरह के सर्वे करने का हक है और किसी भी धर्म के लोगों को संविधान के मुताबिक अपने धर्म के प्रचार-प्रसार और आयोजन करने का हक है। लेकिन इन तीनों घटनाओं का संदर्भ, इससे जुड़ी हुई हाल की घटनाएं और इसके समय का चयन कुछ दूसरी तरफ इशारा कर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे पहले बात सिमरिया कुंभ की। हाल ही में दिल्ली में बिड़ला मंदिर में सिमरिया में कुंभ के आयोजन को लेकर 20 फरवरी को एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस आयोजन में करपात्री अग्निहोत्री जी महाराज, गोविन्दाचार्य, हिंदू महासभा के अध्यक्ष चंद्रप्रकाश कौशिक समेत कई दूसरे क्षेत्र के लोग भी मौजूद थे। हमारे देश में परंपरा से चार धार्मिक स्थलों पर कुंभ मनाया जाता है और इसके अलावा कई दूसरे जगहों पर भी समय-समय पर लोग इस तरह की गतिविधियों में जुटते रहे हैं, यूं उसे कुंभ का नाम नहीं दिया जाता। हाल के सालों में उन सब जगहों पर बकायदा 'कुंभ' के नाम से आयोजन करने की मांग करवायी जाती रही है और धार्मिक ग्रंथों से इसके बावत सबूत और उल्लेख जुटाने की कोशिश की जाती रही है। सिमरिया कुंभ के सिलसिले में भी कुछ इसी तरह की कोशिश की जा रही है। गुजरात में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद वहां डांग जिले में भी एक इसी तरह के कुंभ का आयोजन शुरु किया गया है और ये कहने की जरुरत नहीं है कि उसके क्या निहितार्थ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिमरिया, उत्तर बिहार के लोगों के लिए वैसा ही है, जैसा दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब वालों के लिए हरिद्वार। सदियों से यहां लोग गंगा स्नान करने, अस्थियों को प्रवाहित करने और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आते रहे हैं। राष्टीय स्तर पर यह जगह रामधारी सिंह दिनकर की जन्मस्थली होने की वजह से भी जाना जाता है। लेकिन सही मायनों में कहें तो सिमरिया वर्तमान बिहार का भौगोलिक केंद्रविन्दु है। यह जगह भौगोलिक रुप से पटना से भी ज्यादा केंद्रीय है और परिवहन साधनों से बेहतरीन ढ़ंग से जुड़ा हुआ है। उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़नेवाला गंगा पर सबसे पहला पुल यहीं बना था, उत्तर-पूर्व की ओर जानेवाली रेलगाड़ियां इसी इलाके से होकर गुजरती है। इसके उत्तर-पूर्वी दिशा में वो इलाका शुरु होता है जो कोसी और आगे सीमांचल के नाम से जाना जाता है। बिहार के इस इलाके में मुसलमानों की सबसे ज्यादा आबादी है और नब्बे के दशक में यह इलाका बीजेपी का एक 'किला' बनके उभरा है। किसी भी आयोजन और महोत्सव के क्या 'कारण' होते हैं, इससे जागरुक लोग पहले से वाकिफ हैं। इस संगोष्ठी के प्रेरणा पुरुष करपात्री अग्निहोत्री चिदात्मान जी महाराजजी बताए जाते हैं। उनके बारे में तो बहुत नहीं मालूम लेकिन जिन्हें इतिहास पढ़ने में रुचि हो उन्हें शायद मालूम होगा कि सन् पचास- साठ के दशक में एक भी करपात्री जी महाराज थे जिन्होंने हिंदू कोड बिल को लेकर नेहरु-इंदिरा की नाक में दम कर रखा था और इंदिरा गांधी के काल में देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए एक लाख साधुओं की भीड़ को लेकर संसद भवन पर हमला कर दिया था और जब पुलिस ने कार्रवाई की तो भीड़ ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज का सरकारी आवास जला दिया था। बहरहाल विषय पर लौटते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी घटना 'सरकारी' है। पिछले दिनों बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने पटना में गंगा 'आरती' का शुभारंभ किया। यह गंगाआरती हरिद्वार और बनारस की तर्ज पर मनाने की बात की गई। इसे बिहार के पर्यटन मंत्रालय के तत्वावधान में करवाया जा रहा है जिसके मंत्री हैं सुनील कुमार पिंटू। पिंटू बीजेपी के विधायक हैं। हरिद्वार और बनारस में बहुत पहले से ही गंगाआरती का आयोजन किया जा रहा है और शायद यह वहां की सरकार द्वारा प्रायोजित नहीं है। लेकिन पटना में शुरु हई गंगा आरती शायद पहली आरती है जिसे नीतीश कुमार की अगुआई में सेक्यूलर सरकार के एक मंत्रालय ने शुरु किया है। इसके पीछे मासूम तर्क दिए गए हैं। गंगा आरती बिहार में पर्यटन को बढ़ावा देगा वगैरह-वगैरह। लेकिन जिनलोगों को बिहार की दंतकथाओं और मान्यताओं की जानकारी है वे जानते हैं मगध और खासकर पटना की गंगा कभी भी व्यापक जनसमूह में धार्मिक रुप से बड़े आकर्षण का केंद्र नहीं रही। बिहार में सिमरिया, सोनपुर, सुल्तानगंज में गंगा तट पर विशेष आयोजन होता है। यूं, छठपूजा और दैनिक आयोजन हर जगह होता है। ऐसे में पटना में गंगाआरती किस तरह के पर्यटन को बढ़ावा देगा सोचनेवाली बात है। शायद बिहार सरकार को गया, नालंदा, राजगीर, वैशाली, लौरिया और अन्य जगहों से ज्यादा फिक्र गंगा आरती की ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीसरी खबर आरएसएस के एक सर्वे से है। पिछले महीने आरएसएस ने बिहार में एक सर्वे करवाया जिसमें धार्मिक आधार पर आरक्षण, मुसलमानों की वोटिंग पैटर्न, मुसलमानों को लेकर नीतीश सरकार की योजनाओं के बावत इकतरफा सवालों के जवाब पूछे गए। संघ से जुड़े हुए लेखक-प्रोफेसर और हेडगेवार के जीवनीकार राकेश सिन्हाइसे अकादमिक सर्वे मानते हैं। लेकिन कई लोग इसका राजनीतिक अर्थ ढ़ूढ़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल तक बिहार में संघ की मशीनरी का बहुत काम नहीं रहा है। संयुक्त बिहार में इसकी ऊर्जा, झारखंड के इलाकों में ही उलझी रही थी और बिहार प्रगतिशील शक्तियों और समाजिक न्याय का गढ़ बन गया था। लेकिन संघ मशीनरी ने बिहार को अब अपने मुख्य एजेंडे पर स्थान दे दिया है और प्रतीकों के माध्यम से वह यहां अपना प्रसार करना चाहती है। नीतीश सरकार की पहली पारी में बीजेपी के जिस संयमित रुप को लोगों ने देखा है वह आनेवाले दिनों में बदल सकता है। ज्यादा सीटें जीतकर आने के बाद वैसे भी पार्टी जोश से लवरेज है और उसके लक्षण सामने आ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट-इन पंक्तियों के लिखे जाने तक एक खबर भोपाल से आ रही है कि मध्यप्रदेश की सरकार भोपाल का नाम बदल कर 'भोजपाल' करनेवाली है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3341177896303241975?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3341177896303241975/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3341177896303241975' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3341177896303241975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3341177896303241975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='बिहार की तीन &apos;मासूम&apos; घटनाएं'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-8T6_w5iHqWM/TXXUlNkX76I/AAAAAAAAAcg/i2-O5zcyCHs/s72-c/ganga%2Baarti%2Bpatna.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2801067764576035901</id><published>2010-12-12T06:24:00.000-08:00</published><updated>2010-12-12T06:27:16.625-08:00</updated><title type='text'>...ये बनाना रिपब्लिक क्या बला है ?</title><content type='html'>आजकल जिसे देखो, वहीं बनाना रिपब्लिक का नाम लेता जा रहा है। बात शुरू हुई नीरा राडिया से, फिर रतन टाटा ने तस्दीक किया कि हम बनाना रिपब्लिक में रहते हैं। इधर हमारे कामरेड भाईलोग सालों से ये बात कहते आ रहे थे, पर किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था। आखिरकार हमने आजिज आकर अपने एक दोस्त से पूछ ही लिया कि मियां ये बनाना रिपब्लिक क्या बला है? उसका कहना था कि यू नो… जब रिपब्लिक बनाना की तरह हो जाए तो उसे बनाना रिपब्लिक कहते हैं! मैंने कहा कि अर्थ स्‍पष्‍ट करो। तो उसने कहा कि जिस देश को लोग पके हुए केले की तरह मनमर्जी दबा दें, तो वो बनाना रिपब्लिक हो जाता है!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर हाजीपुर से  एक भाई ने फोन पर दावा किया कि बनाना रिपब्लिक का नाम हाजीपुर के केला बागान पर पड़ा है! उसका तर्क था कि जैसे गंगा किनारे के दियारा में (नदी के किनारे का इलाका) ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस चलती है’, वही हाल बनाना रिपब्लिक का भी होता है! मुझे लगा कि ये सही परिभाषा है। वैसे हाजीपुर के ही एक दूसरे सज्जन ने फोन किया कि ऐसा कहना हाजीपुर के केला बागान का अपमान है और इस पर मानहानि का मामला बन सकता है! आखिर ‘दियारा’ के भी कुछ अपने नियम-कानून होते हैं, उसकी तुलना आप बनाना रिपब्लिक से कैसे कर सकते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, इस सवाल ने मुझे भी कई दिनों तक परेशान किया। फिर महर्षि गूगल ने बताया कि बनाना रिपब्लिक दरअसल उसे कहते हैं, जहां वाकई जिसकी लाठी उसकी भैंस होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;दरअसल, बनाना रिपब्लिक का नामकरण एक अमेरिकी लेखक ओ हेनरी ने 20वीं सदी के शुरुआती सालों में किया था। हेनरी साहब ने 1904  में ‘कैबेज एंड किग्स’ नामकी अपने लघुकहानी संग्रह में इसका ज़िक्र किया था, जब वे अमेरिकी कानूनों से बचने के लिए होंडुरस में रह रहे थे। होंडुरस, उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप मे ही है, मैक्सिको-ग्वाटेमाला से बिल्कुल सटा हुआ, उसके दक्षिण में।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बनाना रिपब्लिक  का केले से वाकई संबंध है। दरअसल, जब बागवानी कृषि के लिए बड़े पैमाने पर गुलामों और दासों का उपयोग किया जा रहा था, तो उस समय भूस्वामियों ने बुरी तरह गुंडागर्दी मचा रखी थी। बागवानी कृषि में बड़े पैमाने पर केले का उत्पादन होता था और दासों से जानवरों की तरह काम लिया जाता था। ये भूस्वामी आपस में भी लड़ते थे और साथ ही उन देशों की सत्ता को इन्होंने अपनी रखैल बना लिया था। उन भूस्वामियों की बड़ी-बड़ी कंपनियां थीं, जो केले का निर्यात अमेरिका और यूरोप के बाजारों में करती थीं। कहते हैं कि पहली बार जब इसका निर्यात यूरोपियन मार्केट में हुआ, तो उसमें हज़ार फीसदी का मुनाफा हुआ था! उसी केले की बागवानी के नाम पर ऐसे देशों को बनाना रिपब्लिक कहा गया। जहां नियम-कायदों की जगह ताकत, पूंजी और भाई-भतीजावाद का नंगा खेल चलता था। केले को डॉलर में बदलने का ये सिलसिला 19वीं सदी के शुरुआत में चालू हुआ था।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;बाद में  लोग कैरिबियन द्वीप समूहों के अलावा कई लैटिन अमेरिकी देशों को बनाना रिपब्लिक कहने लगे। वजह साफ थी। यहां लाठी का नंगा नाच होता था। वैसे इन देशों में व्यापक पैमाने पर केले की खेती करने का काम रेल पटरी बिछाने वाली अमेरिकी कंपनी के मालिक हेनरी मेग्स और माईनर कीथ ने किया था, जिसने मजदूरों को खाना खिलाने के लिए रेलवे पटरियों के किनारे केले की खेती शुरू की। बाद में यह केला सोना उगलने लगा और इसे लेकर खून-खराबे, सत्ता पलट और मजदूरों पर अमानुषिक अत्याचार शुरू हो गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं कि  केले की खेती से इतना मुनाफा होने लगा कि केला कंपनियों ने वहां की सत्ता का दुरुपयोग कर कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। माईनर कीथ जो रेल पटरी बिछाते थे, उन्होंने कई केला कंपनियों के साथ अपनी रेल पटरी कंपनी का विलय कर इतनी बड़ी कंपनी बना ली कि उन्होंने अमेरिका के 80  फीसदी केला कारोबार पर ही कब्जा कर लिया! अब वे ‘बनाना किंग’ बन गये। इसके लिए हर उपलब्ध साधन अपनाये गये। हालत ये हो गयी कि इन केला कंपनियों ने दक्षिण अमेरिका, कैरिबियाई द्वीप समूह और केंद्रीय अमेरिका के लाखों लोगों को भूमिहीन बनाकर बंधुआ मजदूर बना लिया गया। इन मजदूरों को सीमित रूप से भोजन और यौन संबंध बनाने की आजादी मिली हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ये केला कंपनियां  इतनी ताकतवर थीं कि इन्होंने सीआईए के साथ मिलकर कई देशों में तख्ता पलट कराया और कई राष्ट्रपतियों की हत्या कर दी गयी। पाब्लो नेरुदा ने लैटिन अमरीकी देशों में इन केला कंपनियों के राजनीतिक प्रभुत्व की अपनी कविता ‘ला यूनाईटेड फ्रूट कंपनी’ में भर्त्सना भी की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस हिसाब से  देखा जाए तो केला कंपनियों की तरह अपने यहां कंपनियां ज़मीन से लेकर स्पेक्ट्रम तक की लूटमार करती ही रहती हैं। तो फिर टाटा साहब का कहना ठीक है कि हम बनाना रिपब्लिक हो गये हैं! अंग्रेजी में ये शब्द कितना अच्छा लगता है…!&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2801067764576035901?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2801067764576035901/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2801067764576035901' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2801067764576035901'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2801067764576035901'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='...ये बनाना रिपब्लिक क्या बला है ?'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2863231556226222344</id><published>2010-10-11T07:37:00.000-07:00</published><updated>2010-10-11T07:49:32.599-07:00</updated><title type='text'>असली एंग्री यंग मैन तो तुम थे जेपी....!</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TLMiwY_HMxI/AAAAAAAAAbU/JoemNM6_tbk/s1600/Jayaprakash_18165.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5526799382449959698" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 255px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TLMiwY_HMxI/AAAAAAAAAbU/JoemNM6_tbk/s320/Jayaprakash_18165.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;गनीमत है कि अमिताभ का जन्म 2 अक्टूबर को नहीं हुआ। नहीं तो लोग बापू को भी भूल जाते। क्या फर्क पड़ता है कि आज 11 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण का जन्म दिन है। बिग बी का भी जन्मदिन आज ही है। जेपी के बारे में टीवी और अखबारों में शायद ही कहीं छपा हो। एक पत्रकार ने कहा कि जेपी को चलाने से टीआरपी नहीं मिलती। बात सही है। टीआरपी तो बिग बी उगल रहे हैं। शायद लालू-नीतीश भी जेपी को भूल गए हों। चुनाव प्रचार में बिजी होंगे। क्या पता कहीं माला-वाला चढ़ा दिया हो।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;हां&lt;/span&gt;, बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकारी ने जरुर जेपी को याद किया। लेकिन गलत संदर्भ में। उन्होंने कहा कि आज जेपी (और नानाजी देशमुख भी) के जन्मदिन को बीजेपी कर्नाटक में अपनी सरकार बचा कर सेलीब्रेट कर रही है। सही बात है। लेकिन बीजेपी ने जिस तरह से स्पीकर की सत्ता का अपने पक्ष में इस्तमाल करके सरकार बचाई है जेपी तो उसी के खिलाफ थे। जेपी ने 1974 में इंदिरा-बनाम राजनारायण मुकदमे में हार के बाद लोकसभा स्पीकर को मनमर्जी फैसला लेनेवाला बताया था। इसे उस वक्त स्पीकर की गुंडागर्दी बताया गया। लेकिन बीजेपी, अपनी जीत को जेपी के जन्मदिन को सुपुर्द किए जा रही है! &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;खैर, बात जेपी की हो रही थी। कई लोग कहते हैं कि जेपी सारे चेले लंपट और उचक्के निकले। उनका इशारा लालू-मुलायम की तरफ होता है। यूं, मुलायम जेपीआईट नहीं है, वे अपने को लोहियाईट कहते हैं। इस तरह के आरोप पूर्वाग्रह से भरे होते हैं, उसमें गंभीरता कम होती है। जेपी आन्दोलन से जो सबसे अहम परिवर्तन आया वो ये कि हमारे लोकतंत्र का समाजीकरण हो गया। अब संसद और विधानसभाएं सिर्फ साफ बोलने और पहनने वालों की जागीर नहीं रही। ऐसे में कुछ ऐसे भी लोग सामने जरुर आए जिन्हें सार्वजनिक जीवन में देखकर संभ्रान्तों को तकलीफ होती थी। ऐसे लोगों को जेपी के लंपट और उचक्के चेलों की संज्ञा दे दी गई! &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;जेपी और अमिताभ दो और वजहों से महत्वपूर्ण हैं। देश की आजादी के बाद जब सपने टूटने लगे थे और उम्मीदें दरकने लगी थीं तो दोनों ने ही अलग-अलग तरीकों से इसे अभिव्यक्त किया था। जेपी का इंदिरा विरोधी आन्दोंलन और अमिताभ का एंग्री यंग मैन एक ही चीज की वकालत कर रहा था। साहित्य में इसकी अभिव्यक्ति बहुत पहले हो चुकी थी। रेणु, देश की आचंल को मैला साबित कर चुके थे, और श्रीलाल शुक्ल नेताओँ को रागदरबारी। माध्यम अलग-2 था। जेपी को भी इस बात का एहसास था कि उनके आन्दोंलन में &lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TLMi7XtL3RI/AAAAAAAAAbc/hNBn8r2N4fo/s1600/ig.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5526799571084893458" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 228px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TLMi7XtL3RI/AAAAAAAAAbc/hNBn8r2N4fo/s320/ig.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;कई विचारधाराओँ के लोग हैं जिनकी निष्ठाएं अलग-अलग हैं। लेकिन बावजूद इसके, गैर-कांग्रेसवाद का पहला प्रयोग वे कामयाब बनाना चाहते थे। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कई लोगों को इस बात पर भी आपत्ति है कि ये जेपी ही थे जिन्होंने तत्कालीन जनसंघ को एक तरह से सियासी अछूतपना से निजात दिलाया था। लेकिन ये इल्जाम जेपी पर ही क्यों...! क्या लोहिया ने सन् '67 में पहली संविद सरकार में ऐसा ही नहीं किया था? जाहिर है, लोहिया का वो अधूरा प्रयोग साल 1977 में जाकर पूरा हुआ था। कांग्रेस इसलिए सत्ता में फिर से आ गई या आती रही कि कोई मजबूत विकल्प नही था। लोहिया इसका प्रयास करते रहे थे। जेपी ने उसे एक कदम आगे बढ़ाया। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जेपी इसका प्रयास करते रहे कि जनसंघ अपने कट्टर खोल से बाहर निकले और इसलिए जनता पार्टी भी बनाई गई। बाद में दोहरी सदस्यता पर जनसंघियों की जिद और दूसरे नेताओं की महात्वाकांक्षा की वजह से पार्टी टूट गई, ये अलग बात है। लेकिन जेपी ने अपने भर तो प्रयास किया ही था। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;सन् 77 में बड़ा मुद्दा ये था कि मुल्क को इंदिरा गांधी की तानाशाही से मुक्ति दिलाई जाए। इस चक्कर में बेहतर विकल्प और कार्यक्रमों पर ध्यान नहीं दिया गया और जनता पार्टी आपसी अंतर्कलह का शिकार हो गई। लेकिन इसने देश को ये बता दिया कि मुल्क एक परिवार और एक पार्टी के बगैर भी चल सकता है। यहीं वो प्रयोग था जिसने बाद के दिनों में कांग्रेस को अपेक्षाकृत ज्यादा लोकतांत्रिक बनने या दिखने पर मजबूर किया। इसमें कोई शक नहीं कि सन् 1975-77 का आन्दोलन देश के इतिहास में एक दूसरे आजादी के आन्दोलन की तरह ही याद रखा जाएगा जिसने भारतीय लोकतंत्र का इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र सबकुछ बदल दिया। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;जेपी को आंकने का पैमाना निश्चय ही लालू या मुलायम नहीं हो सकते। वैसे भी, लालू-मुलायम जिस देशज और व्यापक राजनीति की नुमाईंदगी करते हैं वो कांग्रेस के कलफ लगे हुए कुर्तों में नहीं थी। परवर्ती नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को जेपी पर नहीं थोपा जा सकता। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक व्यक्ति के तौर पर जेपी शायद गांधी के बाद पहले भारतीय थे जिन्होंने दो-दो बार सत्ता को ठुकरा दिया था। नेहरुजी की मौत के बाद भी जेपी को कथित तौर पर ये मौका मिला था और आपातकाल के बाद तो खैर जनता पार्टी ही उनकी ब्रेनचाईल्ड ही थी। जब इंदिरा गांधी तानाशाह बन रही थी तो जेपी चंबल में डकैतों से आत्मसमर्पण करवा रहे थे। उनकी ये नैतिक सत्ता थी, डकैतों को सरकार पर यकीन नहीं था। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;आज मुल्क जेपी की याद में जश्न मनाना जरुरी नहीं समझ रहा। शायद, सत्ता भी यहीं चाह रही है। लेकिन इस लोकतंत्र पर जब-जब खतरा आएगा और जब भी तानाशाही थोपने की कोशिशें होंगी, जेपी का नाम हमारे जेहन में बिजली सा जरुर कौंधेगा। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2863231556226222344?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2863231556226222344/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2863231556226222344' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2863231556226222344'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2863231556226222344'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='असली एंग्री यंग मैन तो तुम थे जेपी....!'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TLMiwY_HMxI/AAAAAAAAAbU/JoemNM6_tbk/s72-c/Jayaprakash_18165.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3940229763196750695</id><published>2010-09-23T03:35:00.000-07:00</published><updated>2010-09-23T03:42:32.944-07:00</updated><title type='text'>मेरी यादों में अयोध्या...!</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TJsupBXqpqI/AAAAAAAAAbA/URMfWS6p2WE/s1600/babri_masjid_demolition_20050620.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5520057050549888674" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 216px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TJsupBXqpqI/AAAAAAAAAbA/URMfWS6p2WE/s320/babri_masjid_demolition_20050620.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; अयोध्या में जब बाबरी मस्जिद ढ़हाई गई थी तो उस वक्त मैं शायद 7वीं क्लास में था। गांव में किसी बुजुर्ग के मौत की बरसी का भोज था। बीबीसी पर खबर आई थी कि बाबरी मस्जिद को जमींदोज कर दिया गया। लोगों ने उसे बाद में बीबीसी उर्दू पर विस्तार से सुना। पता नहीं बीबीसी वालों ने उस वक्त उसे क्या कहा था-मस्जिद या विवादित ढ़ांचा याद नहीं आता। लेकिन जो बात याद आती है वो ये कि खबर सुनते ही मानों लोगों में एक उन्माद सा छा गया था। कहने की जरुरत नहीं कि ये ब्राह्मणों का भोज था, पता नहीं दलितों और पिछड़ों में इसकी क्या प्रतिक्रिया हुई। वैसे भी अपने आपको अपवार्डली मोबाईल मानने वाले ब्राह्मण-सवर्ण ज्यादातर बीबीसी सुनते थे और कुछ पढ़े लिखे पिछड़े-दलित भी। ये उस समय का एक दस्तूर सा था कि शाम को पटना आकाशवाणी की खबर के बाद लोग बीबीसी सुनते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पटना में लालू प्रसाद नामका एक नेता मुख्यमंत्री बन चुका था और पिछड़ों में उन्हें लेकर एक उन्माद के हद तक आशावादिता थी। बिहार के सवर्ण उस दौर में सार्वजनिक स्थलों पर विवादों से बचने की भरसकर कोशिश करते थे। खाते- पीते लोगों ने बड़े पैमाने पर अपने बच्चों को पढ़ने के लिए दिल्ली भेजना शुरु कर दिया था। बाबरी मस्जिद उस एक तबके के लिए बड़ा आश्वासन बनकर आया था जब उसे लगा कि इस बहाने कम से कम वो अपने आपको अलग-थलग होने से बचा सकता था। बाबरी ध्वंश के बाद मेरे सूबे में दंगे नहीं हुए थे, यूं तनाव जरुर था। इस दंगे के न होने में एक बड़ी भूमिका लालू प्रसाद की जरुर थी जिन्होंने पिछड़ों और दलितों को बहकने नहीं दिया था। यूं, इससे पहले बिहार, भागलपुर और सीतामढ़ी का कुख्यात दंगा झेल चुका था। लेकिन बाबरी ध्वंश के बाद ऐसी बात नहीं हुई। दो महीना बाद भोपाल से मेरे चचेरे भाई आए थे तो बिहार में आए पिछड़ा उभार पर मर्सिया गाने के बाद भोपाल में हुए हिंदू-मुस्लिम झगड़े पर जरुर सीना चौड़ी कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वहीं दौर था जब बिहार- या यूं कहें कि पूरे उत्तर भारत- का पूरा का पूरा सवर्ण तबका कांग्रेस का दामन छोड़कर बीजेपी का मुरीद होने लगा था। उस वक्त अखबारों में नरसिंम्हा राव की तस्वीर ऐसे छपती थी जैसे वे आज के कलमाड़ी हों। वाजपेयी ने एक तबके में अपनी जगह बनानी शुरु कर दी थी। उसके बाद हम पटना आ गए थे और पढ़ाई लिखाई में व्यस्त होते गए। जब-जब बीजेपी उफान पर होती तो हमें लगता कि लालू का काट सामने आ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो लोगों खासकर सवर्णों और कट्टरपंथी किस्म के हिंदिओं में उसी तरह की खुशी हुई थी जब बाबरी ढ़हाई गई थी। कुछ उदारपंथी किस्म के लोगों ने वाजपेयी में एक आश्वासन जरुर देखा था। वाजपेयी सरकार ने जब परमाणु परीक्षण करने का फैसला लिया तो लोगों ने इसे एक तरह के हिंदु उभार से कम नहीं देखा था। लेकिन बीजेपी के कोर वोटरों में तब निराशा होने लगी तब बीजेपी की सरकार ने गठबंधन को बचाने के लिए राममंदिर को किनारे करना शुरु कर दिया। इसके उलट उन वोटरों ने जब प्रमोद महाजनों, अरुण शौरियों-जेटलियों को कारोबारियों के समर्थकों की भूमिका में देखा तो शायद उन्हें लगा कि बीजेपी को तो उन्होंने इसके लिए वोट किया ही नहीं था। साल 2004 आते-आते बीजेपी विकास के नाम पर इंडिया शाईनिंग का नारा भले ही गढ़ बैठी लेकिन उसके कोर समर्थकों में कोई उत्साह बाकी नहीं था। पार्टी औंधे मुंह गिरी। लगा कि कांग्रेस और बीजेपी में कोई फर्क ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर की व्याख्या जरुर दक्षिणपंथी किस्म की लग सकती है लेकिन ये मेरे जैसे इंसान का नितांत निजी अनुभव है जो खास सामाजिक परिस्थियों में पले-बढ़े होने की वजह पैदा हुआ था।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वाजपेयी सरकार के मध्याह्न काल तक हिंदुओं के एक वर्ग में जो उम्मीद बाकी थी वो साल 2010 तक आते-आते बिल्कुल खत्म हो चुकी है। अब जमीन पर कोई तनाव नहीं है। यूं, ये एक ऐसा मसला जरुर है जो काफी संवेदनशील है और कुछ भी भविष्यवाणी करना खतरनाक है। लेकिन साल 2010 तक आते-आते लगभग पूरा का पूरा राजनीतिक और समाजिक तबका इस बात का लगभग मुरीद हो चुका है कि जो होगा वो अब अदालत के फैसले से ही होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे अपनी दादी की बात याद आती है। वो एक धार्मिक महिला थी जो रह-रह कर प्रयाग, बनारस, मथुरा-बृंदावन और जगन्नाथजी की चर्चा करती थी। लेकिन अयोध्या का जिक्र उसमें शायद ही आता था। पता नहीं या मेरी दादी की ही बात थी या शायद मेरे पूरे इलाके में ही ऐसी बात थी। अयोध्या को लेकर कभी कोई फेसिनेशन नहीं था। कुछ बुजुर्ग कहते हैं कि मिथिला के लोगों में वैसे भी अयोध्या को लेकर कोई बहुत लगाव नहीं था जहां सीता के साथ ऐसा बुरा बर्ताव हुआ था ! यहां मैं थोड़ा क्षेत्रीय हो रहा हूं। पता नहीं मामला क्या है। बाबरी जब ध्वंश हुआ था तो ऐसा लगता है कि मेरे गांव के लोगों में खासकर ब्राह्मणों में वो तात्कालिक उन्माद ही था जो लालू यादव के गद्दीनशीं होने की स्थिति में खुशी का कोई क्षण खोजने के लिए भी आया था। बाद में सारी बातें हवा हो गई। आज मेरे गांव में लोग उसी तरह उदासीन है। कुछ लोग जो उत्साहित लगते हैं वे शहरों में ही लगते हैं जहां टीवी चैनल और मीडिया के दूसरे माध्यम उन्हें रह-रह कर इस बात की याद दिला ही देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने देश में दलितों का मसला अंबेदकर और गांधी ने मिल-बैठकर सुलझाया था। पिछड़ा आरक्षण का मसला संसद और अदालत ने सुलझाया था। पता नहीं अयोध्या का क्या होगा। लोग तो कह रहे हैं कि अदालत का फैसला मान लेंगे। अच्छी बात है। लेकिन अगर समाजिक रुप से सर्वसम्मत फैसला हो तो शायद हल और भी मजबूत हो। लेकिन दिक्कत ये है कि गांधी और अंबेदकर जैसे कद्दावर हमारे बीच फिलहाल तो नहीं है। फिर भी हम उम्मीद क्यों छोड़ें ?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3940229763196750695?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3940229763196750695/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3940229763196750695' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3940229763196750695'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3940229763196750695'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='मेरी यादों में अयोध्या...!'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TJsupBXqpqI/AAAAAAAAAbA/URMfWS6p2WE/s72-c/babri_masjid_demolition_20050620.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4391238722556002526</id><published>2010-08-30T06:05:00.000-07:00</published><updated>2010-08-30T06:08:07.071-07:00</updated><title type='text'>यूपीएससी परीक्षा में धांधली का आरोप</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THus4FuVA5I/AAAAAAAAAZ4/5QU3dHHtbtw/s1600/upsc-ias.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5511188648627078034" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 234px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THus4FuVA5I/AAAAAAAAAZ4/5QU3dHHtbtw/s320/upsc-ias.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span class=""&gt;हाल&lt;/span&gt; ही में जब एमसीआई का चेयरमैन 2 करोड़ रुपया घूस लेते हुए पकड़ा गया था तो लोगों ने उसे पहली ऐसी घटना माना था जिसमें कोई इतना बड़ा अधिकारी सरेआम घूस लेते पकड़ाया हो। यूं, कईयों ने उसे सुखराम कांड से तुलना करने की भी कोशिश की थी। लेकिन हाल ही में यूपीएससी पर जो घोटाले के आरोप लगे हैं वे इससे कहीं बड़े घोटाले को अंजाम दे सकते हैं। क्योंकि यूपीएससी ऐसा संस्थान है जो देश पर हुकूमत करने वाले नौकरशाहों को चुनता है। अगर यहां पर घोटाले की बात साबित हो जाती है तो वाकई एक एक सीट की बोली 5 या 10 करोड़ो में लगी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के इतिहास में अभी तक यूपीएससी को गाय, गंगा और ब्राह्मण की तरह पवित्र माना जाता रहा है! यूं, राज्यों में लोकसेवा आयोगों को लोग दशकों से घोटाला करते देख रहे हैं और बिहार और पंजाब जैसे राज्यों में तो इसके चेयरमैन तक जेल रहे हैं। रेलवे बोर्ड की भी यहीं हालत है। कुल मिलाकर हिंदुस्तान में कोई ऐसा सरकारी विभाग नहीं बचा जहां पैसा लेकर नौकरी न बांटी जाती हो। हां, इसके प्रतिशत में फर्क हो सकता है कि कितने सीट जेनुइन चुने गए और कितने पैसे लेकर। लेकिन अभी तक यूपीएससी पर कोई खुलेआम आरोप नहीं लगा था। एक बार यूपीएससी के प्रश्नपत्रों को लेकर सवाल जरुर उठा था जिसमें रांची के एक प्रेस से संबंधित कई लोगों ने यूपीएससी इक्जाम में कामयाबी पा ली थी। लेकिन उसके बाद से प्रश्नपत्रों की छपाई का काम अमेरिका भेज दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार यूपीएससी के उम्मीदवारों ने आरोप लगाया है कि पीटी की परीक्षा में भारी पैमाने पर धांधली हुई है। यूपीएससी ने घोषणा की थी कि वो पीटी में करीब 18,000 रिजल्ट देगा जो इसबार रिक्तियों की भारी संख्या को देखते हुए लाजिमी भी था। लेकिन यूपीएससी ने रिजल्ट दिए सिर्फ 12,000. यूपीएससी ने इसकी कोई वजह नहीं बताई और न ही आरटीआई के तहत वो इसकी जानकारी देना चाहता है। लेकिन ऐसा करना यूपीएससी का कोई अपराध नहीं लगता। लेकिन आंखे तो तब खुली रह जाती है कि यूपीएससी मिनिमम कट ऑफ मार्क नहीं बताना चाहता। क्योंकि ऐसी खबरें है कि कुछ ऐसे लड़को को पीटी में पास घोषित कर दिया गया है जो इक्जाम में बैठे ही नहीं थे। दूसरी तरफ जिन लड़कों ने पिछले साल आईपीएस का इक्जाम पास कर लिया था वे इस बार पीटी में खेत रहे। हलांकि कई दफा ऐसा होता है, लेकिन अगर ऐसे तकरीबन 100 से ज्यादा उम्मीदवारों के साथ हो जरुर घोटाले की गंध आती है। दूसरी तऱफ कुछ ऐसे लड़के हैं जिन्होंने जीएस में महज 20 सवाल बनाए थे उनका हो गया लेकिन 50 सवाल हल करने वाले खेत रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई छात्र इस बार के इक्जाम में क्षेत्रीय भेदभाव का आरोप भी लगा रहे हैं। हलांकि इसकी संभावना कम है। हिंदीभाषी इलाके के कई छात्रों का कहना है कि क्षेत्रविशेष के ज्यादातर उम्मीदवारों को पास करवा दिया गया है और हिंदी इलाकों के छात्रों का नाम काट दिया गया है।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;यूपीएसी उम्मीदवारों ने इसके लिए यूपीएससी कार्यालय के सामने धरना दिया और जंतर-मंतर पर भी वे धरना दे चुके हैं। लेकिन उनकी आवाज को सुनने को कोई तैयार नहीं है। आश्चर्यजनक बात ये है कि मीडिया का एक बड़ा तबका उनकी बातों को सुनने को तैयार नहीं है। हिंदी मीडिया में तो फिर भी उनके बारे में कुछ न कुछ छपा है लेकिन अंग्रेजी मीडिया ने इस तरफ से बिल्कुल अपनी आंख मूंद ली है। यूपीएससी को ये गुरुर है कि सांविधानिक संस्था होने के नाते कोई उस पर सवाल उठा ही नहीं सकता। उम्मीदवारों को अब आशा की एक ही किरण दिखाई देती है और वो है सुप्रीम कोर्ट। अपनी तरफ से उन्होंने सोशल मीडिया पर भी इसके लिए कई तरह के लेख लिखे हैं। लेकिन कई उम्मीदवार खुलकर आना नहीं चाहते, उन्हें भय है कि आनेवाले सालों में भी यूपीएससी के आका उन्हे ब्लैकलिस्ट न कर दे। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4391238722556002526?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4391238722556002526/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4391238722556002526' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4391238722556002526'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4391238722556002526'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/08/blog-post_30.html' title='यूपीएससी परीक्षा में धांधली का आरोप'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THus4FuVA5I/AAAAAAAAAZ4/5QU3dHHtbtw/s72-c/upsc-ias.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-6966941494187495609</id><published>2010-08-27T03:11:00.000-07:00</published><updated>2010-08-27T03:40:34.863-07:00</updated><title type='text'>रिलांयस-वेदांता कॉरपोरेट जंग और कांग्रेस का समीकरण</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THeSAHeHyQI/AAAAAAAAAZU/QevL3-jci64/s1600/Anil_Agarwal_300.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5510033199814134018" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 267px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THeSAHeHyQI/AAAAAAAAAZU/QevL3-jci64/s320/Anil_Agarwal_300.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; आपको मालूम है कि ये अनिल अग्रवाल कौन है ? मुकेश अंबानी और पी चिदंबरम वैसे भी किसी परिचय के मुंहताज नहीं हैं । इधर कुछ दिनों से जयराम रमेश भी याद करने लायक बन गए हैं। एक ग्लैमरस स्टोरी है जिसके ये अहम किरदार हैं। मधुर भंडारकर में अगर हिम्मत होती तो इसे जरुर पर्दे पर उतार देते और ‘कॉरपोरेट पार्ट टू’ बना देते। अब इस स्क्रिप्ट में राहुल गांधी की भी एंट्री हो चुकी है। राहुल गांधी ने नियामगिरी के उस पहाड़ी इलाके का दौरा किया है जहां बाक्साईट खनन का ठेका लेने में वेदांता को तगड़ा झटका लगा। राहुल गांधी ने खुलेआम कहा कि उन्ही की वजह से वेदांता को ये ठेका नहीं मिला और कि वे दिल्ली में आदिवासी हितों के एकमात्र पहरुआ हैं। आमीन।&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;चलिए अनिल अग्रवाल से शुरुआत करते हैं। उदार भारत के डालर अरबपतियों में दूसरे पोदान पर हैं ‘वेदांता रिसोर्स’ के मालिक अनिल अग्रवाल। साल 2009 में इनकी रैंकिंग पांचवी थी। यूं, मुकेश अंबानी से बहुत पीछे हैं लेकिन इनकी चमत्कारिक ग्रोथ रेट अंबानी के लिए यकीनन चिंता की बात होगी। अनिल अग्रवाल की जन्मस्थली पटना है । इस हिसाब से आप उन्हें पहला बिहारी डॉलर अरबपति भी कह सकते हैं! घनघोर किस्म के बिहारी चाहें तो अपना छाती चौड़ी कर सकते हैं! अग्रवाल ने पटना के मिलर स्कूल में पढ़ाई की जहां लालू प्रसाद यादव उनके सहपाठी हुआ करते थे। हाल ही में वो तब चर्चा में आए जब उन्होंने तेल और ऊर्जा के क्षेत्र की बड़ी कंपनी केर्न इंडिया पर 9।6 अरब डॉलर की बोली लगा दी। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;अनिल अग्रवाल के पिता शहर पटना में एक छोटे से धातु कारोबारी हुआ करते थे जो बिजली विभाग के लिए एल्यूमिनियम का कंडक्टर बनाते थे। सन् ‘76 में अनिल अग्रवाल ने स्टरलाइसट इंडस्ट्रीज नाम की कंपनी बनाई जिसे धातु कारोबार के फील्ड में आसमान चूमना था। जी हां, ये वहीं स्टरलाइट थी जिसने बीजेपी के राज में बाल्को को भारत सरकार से खरीद लिया था। बाद में साल 1986 में अग्रवाल ने ‘वेंदांता रिसोर्स’ नाम की कंपनी की नींव डाली। साल 2002 में अग्रवाल ने हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड को भी खरीद लिया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THeRJt9JZnI/AAAAAAAAAZE/LgB0P1Nvq9U/s1600/M_Id_169148_Rahul_tribal_rally.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5510032265252005490" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THeRJt9JZnI/AAAAAAAAAZE/LgB0P1Nvq9U/s320/M_Id_169148_Rahul_tribal_rally.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span class=""&gt;अनिल&lt;/span&gt; अग्रवाल और उनकी वेदांता पर भ्रष्टाचार और धांधली के कई आरोप लगे। बाल्को अधिग्रहण के वक्त भी और हाल ही में नियामगिरी हिल्स में बाक्साइट के खदान हथियाने की कोशिशों को लेकर भी। एन सी सक्सेना कमेटी ने वहां चल रही माईनिंग को अवैध करार दे दिया। वेदांत पर जमीन हड़पने, फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लंजीगढ़ (उड़ीसा) में एल्यूमिनियम रिफाइनरी खोलने के आरोप लगाए गए। उन्होंने तमाम नियम कानून ताक पर रख दिया और ऐसा मीडिया मैनेज किया कि मुख्यधारा की मीडिया इस खबर को सिर्फ सूंघकर रह गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत दिन नहीं हुए जब हमारे गृहमंत्री पी चिदंबरम वेदांता के एक डायरेक्टर हुआ करते थे। बाद में जब उन्हें गृहमंत्री बनाया गया तो अरुंधती राय ने कहा कि वे तो वेदांता के खनन हितों की सुरक्षा के लिए चौकीदार बने है। कई लोगों को अरुंधती सही भी लगी। बहरहाल, वेदांता उस वक्त विवादों में फंस गई जब उड़ीसा के नियामगिरी की पहाड़ियों में बाक्साइट के खदानों के लिए उड़ीसा सरकार हजारों आदिवासियों को उजाड़ने पर आमादा हो गई। पुनर्वास के बदले में आदिवासियों को 30 किलोमीटर दूर बने अपार्टमेंटनुमा मकानों में बसा दिया जाना था! लेकिन जिस दिन वेदांता ने केर्न इंडिया पर दावा ठोका, उसी दिन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने वेदांता के नियामगिरी प्रोजेक्ट पर पानी फेर दिया। बहरहाल, तेज रफ्तार से दौड़ रहे अनिल अग्रवाल, जयराम रमेश के दिए घावों को सहला रहे हैं और अगले वार की तैयारी में है। &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;यहां पर कुछ पेंच है जिसे समझना जरूरी है। अनिल अग्रवाल जैसे लोगों ने दिल्ली समेत छोटी राजधानियों में डीलमेकरों का जो जाल बिछाया है उसमें कई बार आपस में ही टकराव हो जाता है। बीजेपी के राज में उनका काम मजे से चला और कांग्रेस में चिदंबरम उनके पुराने यार हैं। केर्न इंडिया को अगर वो खरीद लेते हैं तो वो उस स्थिति में आ जाएंगे, जहां से उनका टकराव मुकेश अंबानी की रिलांयस से होगा। इसलिए अब वो मुकेश की आंखों में चुभ रहे हैं। तेल रिफाइरनी के मामले में वो मुकेश अंबानी से पंगा ले रहे हैं तो बिजली के सुपर प्रोजेक्ट की घोषणा करके उन्होंने अनिल अंबानी को भी चुनौती दे दी है। अग्रवाल एक बार रिफाइनरी के धंधे में हाथ जला चुके हैं लेकिन पुराने इरादे खतम नहीं हुए हैं। अगले साल के शुरुआत में वे बिजली के 11 सुपर प्रजेक्ट के लिए कमर कस रहे हैं जिसमें हरेक कम से कम 4,000 मेगावाट का है। यहीं जाकर रिलांयस के दो दिग्गजों से उनका टकराव शुरू होता है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस के अंदर के सत्ता समीकरण में चिदंबरम, मनमोहन सिंह और मोंटेक एक ‘कोटरी’ के हैं जो धुर उदारवादी माना जाता है। आप इसे कांग्रेस आलाकमान का कॉरपोरेट या उदार चेहरा(?) कह सकते हैं। दूसरी तरफ एक खेमा वो है जो पार्टी आलाकमान के हिसाब से पार्टी का समाजिक चेहरा बनना चाहता है। इसके नए अगुआ बने हैं दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश और सीपी जोशी। ये कांग्रेस &lt;span class=""&gt;आलाक&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THeRSqlEOpI/AAAAAAAAAZM/g9p3CRwVN-A/s1600/mukesh_ambani.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5510032418964519570" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 280px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THeRSqlEOpI/AAAAAAAAAZM/g9p3CRwVN-A/s320/mukesh_ambani.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;मान&lt;/span&gt; का समाजिक चेहरा है, बिल्कुल सौम्य, सरल और निश्चल! इस खेमे को ‘आम आदमी’ के ‘सरोकारों’ की सोते जागते चिंता रहती है। वो सरकार की कॉरपोरेट लॉबी के बरक्श हमेशा बयानवाजी करता है और जनता को आश्वस्त करता जाता है। सूत्रों की माने तो रिलांयस ने इसी खेमे को साधा है। इनके अलावा मुरली देवड़ा और रिलायंस के रिश्ते पर तो चर्चा होती ही रहती है। केर्न इंडिया को निगलने की फिराक में लगी वेदांता की बाक्साइट खदानों पर ताला जड़े जाने की घटना को इन संदर्भों में देखा जाना चाहिए। मजे की बात ये कि इधर जयराम ने वादांता के मनसूबों पर पानी फेरा और उधर राहुल गांधी, इस काम का श्रेय लेने नियामगिरी पहुंच गए। वैसे हमें याद है कि एक बार साल 1994 में तब के पर्यावरण मंत्री राजेश पायलट का रातोंरात तबादला कर दिया गया था जब उन्होंने चंद्रास्वामी से पंगा लिया था। लेकिन इस बार जयराम रमेश के पीछे मुकेश अंबानी खड़े हैं जिनकी कांग्रेस के बड़े नेताओं में आकंठ घुसपैठ है। इसलिए फिलहाल उनकी नौकरी सुरक्षित लगती है।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;इधर जिस हिसाब से माओवाद के बहाने दिग्विजय सिंह, चिदंबरम पर निशाना साध रहे हैं उससे कई बार चिदंबरम की नौकरी खतरे में लगती दिखती है। जाहिर है, दिग्गी राजा का ये माओवाद प्रेम महज दिखावा है, खेल तो कहीं और से खेला जा रहा है। आधिकारिक तौर पर दिग्विजय सिंह की हैसियत बातौर कांग्रेस महासचिव यूपी के प्रभारी की है और वे राहुल गांधी के हाथ-पैर-नाक और मुंह भी हैं !&lt;br /&gt;देखा जाए तो वेदांता जिस राह पर आगे बढ़ती हुई इस मुकाम पर पहुंची है, लगभग रिलांयस ने भी वहीं तरीका अपनाया था। धीरुभाई अंबानी हों या उनके सुपुत्र अंबानी बंधु-उन्होंने कारोबार में आगे बढ़ने के लिए हर उपलब्ध तरीका अख्तियार किया। ऐसे में ये कॉरपोरेट वार किस मंत्री को हलाल करेगा ये आगे देखने वाली बात होगी।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;दुर्भाग्य से हम एक ऐसे युग के गवाह हैं जहां ठेकेदारों, दलालों और खनन माफियाओं ने सरकार पर कब्जा कर लिया है। हिंदुस्तान में आर्थिक सुधार(?),खान माफियाओं का उदय, आदिवासियों का बड़े पैमाने पर विस्थापन और माओवाद के उदय का कालक्रम लगभग एक ही है। इस हिसाब से आप कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को अनिल अग्रवाल और अंबानी बंधुओं का लघु रूप मान सकते हैं। दुनिया के विशालतम लोकतंत्र में आपका फिर भी स्वागत है! चलिए कॉमनवेल्थ गेम्स में अतिथियों का स्वागत करें ! &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-6966941494187495609?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/6966941494187495609/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=6966941494187495609' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6966941494187495609'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6966941494187495609'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/08/blog-post_27.html' title='रिलांयस-वेदांता कॉरपोरेट जंग और कांग्रेस का समीकरण'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/THeSAHeHyQI/AAAAAAAAAZU/QevL3-jci64/s72-c/Anil_Agarwal_300.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-7025122186329248722</id><published>2010-08-18T09:07:00.000-07:00</published><updated>2010-08-18T11:01:23.125-07:00</updated><title type='text'>चट्टान दरकी भर है...टूटी नहीं है...!</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGwGIA_od-I/AAAAAAAAAY0/rFfdAxeSZws/s1600/nitish-kumar-bihar-cm_1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5506783179142887394" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 251px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGwGIA_od-I/AAAAAAAAAY0/rFfdAxeSZws/s320/nitish-kumar-bihar-cm_1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; लालू-पासवान के बीच डील पक्की होने के बाद बिहार में समीकरण के हिसाब से अब लड़ाई कांटे की हो गई है। लालू प्रसाद ने माय प्लस दलित प्लस राजपूतों का एक जुझारु, मजबूत और आक्रामक गठबंधन बनाया है और माय समीकरण की आक्रामक वोटिंग के लिए खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया है। कुल मिलाकर लालू यादव के पाले में लगभग 45 फीसदी जातियों का मजबूत समीकरण है जो नीतीश के लिए बड़ी चुनौती बनकर ताल ठोक रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर मौसमी पंछियों ने उड़ान भड़नी शुरु कर दी है। अभी नीतीश के पाले से कुछ उड़े हैं, बाकी लालू के पिंजड़े से उड़ने को बेताब हैं। पिछले साढ़े चार सालों की तेजड़िया उछाल के बाद अचानक सुशासन बाबू की लोकप्रियता जरुर दरकी है । मुख्यमंत्री पर तानाशाही के आरोप तो पहले से ही लगते थे लेकिन इस बीच भ्रष्टाचार के भी कई आरोप लग गए। इधर नीतीश के अपने ही नेता शरद यादव की वक्रदृष्टि उनपर पड़ गई। वैसे मामला अभी रफा दफा कर दिया गया है। ऊपर से सब शांत है, मुद्दा अगले चुनाव जीतने का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लालू ये जानते हैं कि कांग्रेस इस बार उनके मुस्लिम वोट बैंक में बड़े पैमाने पर सेंध लगाने की जुगत में है। ऐसा कांग्रेस ने बिहार में एक मुसलमान नेता को सरदारी सौंप कर अपनी मंशा जता भी दी है। दूसरी बात लालू ये भी जानते है कि कांग्रेस चुनाव में बड़े पैमाने पर धनवल का प्रयोग करेगी ताकि लालू के पाले से कम से कम आधे मुसलमानों को खींच कर लाया जा सके और आरजेडी की नैया को कोसी में डुबा दिया जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन लालू की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होती। अब कांग्रेस उनके यादव वोट बैंक में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में यूं यादव बहादुरों-पप्पू और साधुओं ने कोई विशेष कमाल नहीं दिखाया था लेकिन कांग्रेस को फिर भी कई अपेक्षाकृत साफ सुथरे यादवों पर भरोसा है। इधर कांग्रेस ने बिहार यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर भी एक यादव कुंअर की बहाली कर दी है। दूसरी तरफ झंझारपुर से कई दफा सांसद रह चुके देवगौड़ा सरकार में पूर्व मंत्री देवेंद्र यादव पर भी वो डोरे डाल रही है। देवेंद्र से कांग्रेस की कई दफा वार्ता हो चुकी है लेकिन देवेंद्र यादव भी कम चतुर नहीं है। वे एक ही साथ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस- दोनों से तार जोड़े हुए हैं। वे चाहते हैं कि अगर लालू का अवसान होता है तो पूरे बिहार के यादव उन्हे अपनी सरदारी सौंप दें ! दांव जरा ऊंचा ही लगा दिया, 2014 तक की बेरोजगारी बैचेन जो किए हुए है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर मामला जो भी हो , इससे संभावित नुकसान लालू का ही है। हां, उनको एक जगह जहां फायदा होता नजर आ रहा है वो ये है कि बिहार में &lt;span class=""&gt;राजपू&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGwGUyQezaI/AAAAAAAAAY8/SvUMI-pljXQ/s1600/laloo.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5506783398525324706" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 281px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGwGUyQezaI/AAAAAAAAAY8/SvUMI-pljXQ/s320/laloo.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;तों&lt;/span&gt; का ज्यादातर वोट आरजेडी के पाले में आएगा, लेकिन देखना ये है कि कांग्रेस कितना उसका डैमेज करती है। लालू यादव के साथ बड़ी दिक्कत ये है कि उनका भूत अभी भी जिंदा है। लालू यादव अपनी पुरानी छवि से मुक्त नहीं हो पा रहे, और यहीं नीतीश की सबसे बड़ी ताकत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर मौसमी पंछियों ने पाला बदलना शुरु कर दिया है। प्रभुनाथ सिंह के आरजेडी ज्वाईन करने के बाद अब लल्लन सिंह कांग्रेस का दामन थामने वाले हैं। इधर देवेंद्र यादव, कांग्रेस और सपा दोनों कंपनियों में इंटरव्यू दे आए हैं। लोगबाग कहते हैं राजपूतों की कमी के इस युग में सुशासन बाबू भी कुछ राजपूत नेता आयात करेंगे। अफवाह है कि आरजेडी सांसद जगदानंद सिंह से उनकी एक राउंड बात भी हो गई है। इधर अपने बच्चों को देहरादून में पढ़ा रहे आनंदमोहन को भी सितारों पर यकीन हो चला है। पंडितों की इकलौती दुकान महामहोपाध्याय प्रात:स्मरणीय जगन्नाथ मिश्रा ने फिर से खोल ली है और नीतीश बाबू ने उन्हें एक एमबीए स्कूल की चेयरमैनी सौंप दी है! लेकिन इसका खतरा ये है कि पिछले चालीस साल से मिसिरजी के तमाम राजनीतिक विरोधी(इसमें पंडितों की तादाद खासी है!) चौंकन्ने हो गए हैं और ब्राह्मणों के इस स्वयंभू लास्ट मुगल को जिंदा नहीं होने देने की कसम खा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिहार में चुनाव को सिर्फ विकास केंद्रित मान लेने की बात फालतू लगती है। लोग विकास की चर्चा तो करते तो हैं लेकिन वोट देते वक्त जातीय समीकरण ज्यादा अहम हैं। नीतीश बाबू ने करीने से एक समीकरण बनाया है। मामला 50-50 का न सही, 55-45 का जरुर है। आनेवाले कुछ सप्ताहों में गोलबंदी और साफ हो जाएगी। वैसे नीतीश चाहते हैं कि चुनाव खंडित ही हों। उनका फायदा इसी में है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले 63 सालों में बिहार में किसी ने मीडिया को मैनेज किया है तो उसका नाम है नीतीश कुमार। यूं, ऐसा करके उन्होंने अपने आंखों पर खुद ही पट्टी बांध ली है। उन्हें अपने विरोध के स्वर कम ही सुनाई पड़ते हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं जो ‘अंडरकरेंट’ की बात कर रहे हैं। कईयों का मानना है कि नीतीश का हाल कहीं 2004 के एनडीए जैसा न हो जाए। हलांकि लालू यादव की पुरानी छवि यहां भी नीतीश का तारणहार बनती हुई नजर आती है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यक्तिगत छवि के मोर्चे पर अभी भी नीतीश मजबूत दिखते है। घोटालों के ताजा आरोपों ने लोगों लोगों के कान तो जरुर खड़े किए हैं लेकिन उसका घनघोर विरोध में कितना परिवर्तन हुआ है इसका सही आकलन किसी के पास नहीं। सुशासन बाबू सिर्फ एक ही बात से चिंतित लग रहे हैं कि कहीं कांग्रेस ज्यादा सवर्णों को टिकट न बांट दे। कुल मिलाकर नीतीश कुमार का नंबर पांच साल पहले के मुकाबले कमजोर जरुर हुआ है लेकिन अभी भी उन्हे खारिज मान लेना जल्दवाजी होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उससे भी अहम बात ये कि लालू ने अपनी दावेदारी पेशकर नीतीश को वाक ओवर दे दिया है...लालू का वोटर फिक्स था, नीतीश का बिखरा हुआ था..अब लालू के इस कदम से नीतीश का वोटर भी फिक्स हो गया है...लालू का ये कदम इस इनसेक्यूरिटी कम्प्लेक्श में उठाया गया लगता है कि कहीं यादव भी न बिखर जाए...इसके आलावा लालू की दावेदारी का कोई मतलब नहीं है...लालू, लड़ाई से पहले नतीजे का ऐलान कर चुके लगते हैं.....!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-7025122186329248722?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/7025122186329248722/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=7025122186329248722' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7025122186329248722'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7025122186329248722'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/08/blog-post_18.html' title='चट्टान दरकी भर है...टूटी नहीं है...!'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGwGIA_od-I/AAAAAAAAAY0/rFfdAxeSZws/s72-c/nitish-kumar-bihar-cm_1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4607848946574316452</id><published>2010-08-13T23:07:00.000-07:00</published><updated>2010-08-13T23:28:18.794-07:00</updated><title type='text'>आनेवाले वक्त के लोग हैं ये...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGY1XVK-VpI/AAAAAAAAAYs/_puQGz9BJu8/s1600/leadership-word.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5505146269443446418" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 226px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGY1XVK-VpI/AAAAAAAAAYs/_puQGz9BJu8/s320/leadership-word.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; धीरेंद्र सिंह रायबरेली में रहते हैं और एक व्यावसायिक कोर्स में डिप्लोमा कर रहे हैं। वे जब भी कोई पत्र-पत्रिका खरीदते हैं या दोस्तों के घर उन्हें कोई पुरानी पत्रिका मिलती है तो उसे वे जमा कर लेते हैं और गांव जाकर बच्चों में बांट देते हैं। उनका मानना है कि पत्रिकाएं या पुरानी किताबों को कबाड़ी के हाथों बेचने से अच्छा है कि कोई उसे पढ़ ले। आगे चलकर वे इसे संस्थागत रुप देना चाहते हैं और एक एनजीओ भी बनाना चाहते हैं। लखीमपुर खीरी के कृष्णकुमार मिश्र पेशे से प्राथमिक स्कूल में अध्यापक हैं और वाईल्ड लाईफ कंजर्वेशन उनकी दीवानगी है। उनके जिले में ही दुधवा नेशनल पार्क है जहां वे बिली अर्जन सिंह के संपर्क में आए। एक मित्र की सलाह पर उन्होंने इसे और भी संगठित रुप दिया और उन्होंने दुधवालाईव डॉट कॉम नामके एक वेबसाईट की शुरुआत की जो हिंदी में इस तरह की हिंदी में अपने आप में पहली पहल थी। आज मिश्र इस अभियान को और भी आगे बढ़ाने की बात सोच रहे हैं और एक त्रैमासिक लघु पत्रिका की शुरुआत का इरादा बना रहे हैं। ऐसी ढ़ेरों कहानियां है जो हमारे आसपास बिखरी पड़ी हैं जिन्हें लोगों ने महज अपनी पहल पर शुरु किया है और वे जागरुकता के एक प्रतीक बन गए हैं। दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान(आईआईएमसी) के छात्र रहे अंशु गुप्ता ने जब दिल्ली की सड़कों पर गरीब लोगों को भीषण ठंढ से कराहते देखा तो उनकी अंतरात्मा को ये गवारा नहीं हुआ। बस फिर किया था, गुप्ता ने अपनी क्लासमेट मीनाक्षी के साथ- जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी भी बनी- मिलकर गूंज नामका एक एनजीओ बनाया जो लोगों से उनके पुराने गरम कपड़े डोनेशन के रुप में लेता है और गरीब लोगों में मुफ्ता बांटते हैं। अंशु ने तमिलनाडू में आए सूनामी के वक्त भी अच्छा काम किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;येकहानियाँ हमें क्या बताती हैं ? ये ऐसे लोग हैं जो कल के लीडर हैं और इन्होंने अपने अंदर के लीडरशिप की उर्जा को बखूबी पहचाना है और उसे साकार रुप देने की कोशिश की है। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने व्यक्तिगत काम के अलावा भी कुछ करने का जज्वा जिंदा रखा है अपनी अलग राह बनाई है। ये कहांनिया हमें बताती हैं कि लीडर के पास हमेंशा एक एडवांस एजेंडा होता है और वे कभी खाली नहीं होता। वे हमेशा इनिशिएट करते हैं। गांधीजी की जब हत्या हुई तो उससे पहले वो बांग्ला सीख रहे थे और सीखने के काफी करीब पहुंच गए थे। गीता में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि, ' हे अर्जुन कर्म किए जा, फल की चिंता मत कर, क्योंकि फल तो तुम्हारे हाथ में ही नहीं है। इसी तरह लीडर जो होते हैं वे तो बस कर्म किए जाते हैं भले ही लोग उस पर कुछ भी प्रतिक्रिया क्यों दें। वे जो चीज एक बार ठान लेते हैं फिर वे उससे पीछे नहीं हटते। वे क्विक डिसीजन लेते हैं और एक बार जब ले लेते हैं तो उस पर चट्टान की तरह खड़े रहते हैं। कार्ल मार्क्स ने कहीं लिखा है कि मध्यम और निम्नवर्ग के लोग कई बार इसलिए माता खा जाते हैं कि वे तेजी से फैसला नहीं ले पाते, जबकि इसके उलट उच्चवर्ग के लोगों में ये गुण तकरीबन अनुवांशिक रुप ले चुका होता है और वो कम काबिलियत के बावजूद कई बार कामयाब होते हैं। कहने का मतलब ये है कि एक लीडर को हमेशा क्विक डिसीजन लेना चाहिए और उसे किसी डाइलेमा का शिकार नहीं होना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि लीडर अतीतजीवी नहीं होते। वे अतीत से सिर्फ सीखते भर हैं, उसकी ओर कभी लौटते नहीं। वे बड़ी बेदर्दी से अतीत को अपनी जिंदगी से काट फेंक देते हैं। महाभारत में अगर कृष्ण के जीवन को गौर से देखें तो कृष्ण का चरित्र पूरी तरह से एक लीडर का चरित्र है। कृष्ण, गोकुल से जब मथुरा आए तो फिर वे कभी लौटकर गोकुल नहीं गए। वे उस यशोदा को भी बड़ी &lt;span class=""&gt;बे&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGY1IlkKcMI/AAAAAAAAAYk/e-0L8gK0szk/s1600/gandhi_hero.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5505146016146026690" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 202px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGY1IlkKcMI/AAAAAAAAAYk/e-0L8gK0szk/s320/gandhi_hero.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;दर्दी&lt;/span&gt; से भूल गए जिन्होंने उन्हें पाला था। मथुरा को एक बार छोड़ा तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। हस्तिनापुर की राजनीति में जब वे सक्रिय हुए तो बहुत दिनों तक द्वारका को भूल गए। कुल मिलाकर उनका तयशुदा काम ही उनकी पूजा थी। वे उसे डूबकर करते थे। एक लीडर के लिए कमिटमेंट और फोकस बड़ी चीज है। कहते हैं कि चर्चिल जब रिटायर हो गए तो वे गुलाब की बागवानी में डूब गए। एक पत्रकार ने जब उनसे राजनीति पर बात करनी चाही तो उन्होंने कहा कि बेहतर है कि गुलाब पर बात की जाए। कहने का मतलब ये कि लीडर अपने काम में फोकस्ड होता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;दूसरी अहम बात ये कि लीडर जो भी करता है वे उसका अपना नहीं होता, वो एक बड़े काउज के लिए करता है। अक्सर इसिलिए एक लीडर की जाती जिंदगी बहुत अच्छी नहीं होती। ये बात गांधी से लेकर लेनिन तक पर लागू होती है। अहम बात ये भी है कि एक लीडर प्रतिभाओं को बखूबी पहचानता है। वो हर घड़ी सही टैलंट को ग्रूम करने की कोशिश करता है और सेंकेंड जेनेरेशन लीडरशिप तैयार करता है।&lt;br /&gt;कहते हैं कि लीडर हमेशा जन्मजात होता है। लेकिन ऐसा नहीं है। लीडरशिप की क्वालिटी कमोवेश हरेक इंसान में होती है, बस उसे ग्रूम करने की जरुरत होती है। कुछ परिवेश का असर तो कुछ शैक्षणिक माहौल भी इसमें अहम रोल निभाते हैं लेकिन अगर सही गाईडेंस मिल जाए तो सोने में सुहागा हो जाता है। तो चलिए, हम आज ही अपने अंदर के लीडर को पहचानते हैं और बन जाते हैं कल के हिंदुस्तान की आवाज। आखिर कहाबत है न...कि गरते हैं शहसबार ही मैदाने जंग में। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4607848946574316452?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4607848946574316452/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4607848946574316452' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4607848946574316452'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4607848946574316452'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/08/blog-post_13.html' title='आनेवाले वक्त के लोग हैं ये...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TGY1XVK-VpI/AAAAAAAAAYs/_puQGz9BJu8/s72-c/leadership-word.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3315383715946238087</id><published>2010-08-04T05:02:00.000-07:00</published><updated>2010-08-04T05:04:19.103-07:00</updated><title type='text'>‘कॉमनवेल्थ’ के बाद अब ‘बुलेट ट्रेन’…तमाशा जारी है...!</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TFlXJfWog3I/AAAAAAAAAXc/DcgHLfaPpr4/s1600/Bullet+Trains2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5501524240356639602" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 203px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TFlXJfWog3I/AAAAAAAAAXc/DcgHLfaPpr4/s320/Bullet+Trains2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;क्या आपको बुलेट ट्रेन पर चढ़कर तीन घंटे में पटना पहुंचने की इच्छा नहीं होती ? कितना अच्छा लगेगा अगर आप 5,000 रुपया किराय अदा करें और एक उपन्यास पढ़ते हुए या सल्लू मियां की कोई फिल्म देखते हुए पटना पहुंच जाएं। वहां आपके इंतजार में कोई शॉफर ड्रिवने गाड़ी हो, जो आपको अपनी कोठी तक छोड़ आए ! और हां, ख्याल रहे कि आप अगर फिल्म देखने के बदले कोई उपन्यास या मैगजीन पढ़ते हुए जाएं तो वो खालिस अंग्रेजी की हो। तभी तो आप एक डिजाइनर हिंदुस्तानी (बिहारी नहीं) लगेंगे। आपकी चिंता बहुत जल्दी ही दूर होने वाली है। आपकी ये चिंता दिल्ली में बैठे हुए कुछ लोगों का गिरोह, जिसे सरकार कहते हैं बहुत जल्द दूर करने वाली है। अब ये मत पूछिए कि इसमें खर्च कितना आएगा। वो सब समझना आपके औकात की बात नहीं है। वैसे इस तरह के ट्रेन में चढ़ना भी आपके औकात के बाहर ही है, लेकिन मुगालता पालने में क्या हर्ज है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिए, ये जो हमारी सरकार बहादुर है न, वो आपको किस तरीके से बुलेट ट्रेन देगी। वो आपको नरेगा में काम देती है, बीपीएल को अनाज देती है-देती है कि नहीं ? तो उस सरकार बहादुर को अब इस बात की शर्म आने लगी है कि चीन जैसे देश में जब बुलेट ट्रेन दौड़ सकती है, तो हमारे यहां क्यों नहीं। माना कि हम उनके जैसे ओलंपिक नहीं करवा सके हैं, लेकिन कॉमनवेल्थ करवाने जा रहे हैं कि नहीं ? आप सच-सच बताईये, आपको कॉमनवेल्थ से खुशी हो रही है कि नहीं ? आपका दिल बल्लियों उछल रहा है कि नहीं..! जरुर उछल रहा होगा, आप शरमा रहे हैं, इसीलिए नहीं बोल रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब देखिए, दिल्ली से पटना है मात्र 1000 किलोमीटर। अब 500-600 करोड़ रुपये किलोमीटर के हिसाब से पटरी बिछा भी दी जाए(जो शर्तिया प्रोजेक्ट के बनने तक 1500 करोड़ रुपये प्रति किमी हो जाएगी) तो कितना बजट आएगा ? सही जोड़ा आपने(हिंदुस्तानी इसलिए अच्छा इंजिनियर बनते हैं), ये खर्च आएगा मात्र 5 लाख करोड़ रुपये। अरे जनाव, ये भी कोई खर्च है ? 12 लाख करोड़ का तो अपने सरकार बहादुर का खर्च है, डेढ़ लाख करोड़ सेना खा जाती है, 1 लाख करोड़ हम ‘खेल’ में खर्च कर सकते हैं तो इतनी रकम बुलेट ट्रेन में क्यों नहीं। अरे, कुछ पैसा विदेशों से ले लेंगे, कुछ जनता पर सरचार्ज लगा देंगे, बस खेल खतम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या कहा, इतने पैसे में सबको शिक्षा और स्वास्थ्य मिल जाएगी ? अरे महाराज, लोगों को एक ही दिन में थोड़े पढ़ाना है और तंदुरुस्त बनाना है ? और फिर आबादी भी देखिए, 120 करोड़ होने वाले हैं। अभी बुलेट पर चढ़िए। बाद की बाद में देखी जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या कहा, ये ठेकेदारों, दलालों और नेताओं का प्रोजेक्ट है ? आप पागल तो नहीं हो गए ? क्या आपको बैलगाड़ी के युग में ही रहना है ? 21वीं सदीं में नहीं जाना आपको ? जरुर इसमें विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है जो जनता में गलत-फलत संदेश फैलाते हैं कि उच्च तकनीक से देश का बुरा होगा। अरे आप सोचिए, कि हमारा देश विश्वस्तरीय बन रहा है, हमारे पास एटम है, मिसाईल है, साफ्टवेयर है, क़ॉमनवेल्थ है, मेट्रो है, फिर बुलेट से आपको क्यों खुजली हो रही है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे, आप क्या बकवास कर रहे हैं ? 15 अगस्त को परेड देखकर आपको खुशी नहीं होती ? मंत्रियों के बड़े बंगले और लंबी गाडियां देखकर आपको खुशी नहीं होती? अंग्रेजों के जमाने में थी अपने लोगों के पास ऐसी कोठियां ? तो पैसा तो इसमें भी खर्च होता है न...फिर बुलेट ट्रेन से तो देश का गौरव बढ़ेगा, आप मान भी जाईये। अब ठीक है ये ठेकेदार या नेता भी तो अपने ही भाई बंधु है, घी कहां जा रहा है तो दाल ही में न...! क्या कहा, स्विस बैंक…हम आपको आश्वासन देते हैं कि कमीशन या घूस की कोई रकम हम स्विस बैंक नहीं जाने देंगे। हम सीधे आपके लिए सरकार से बात करेंगे। अब तो खुश !&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3315383715946238087?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3315383715946238087/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3315383715946238087' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3315383715946238087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3315383715946238087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='‘कॉमनवेल्थ’ के बाद अब ‘बुलेट ट्रेन’…तमाशा जारी है...!'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TFlXJfWog3I/AAAAAAAAAXc/DcgHLfaPpr4/s72-c/Bullet+Trains2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-5782035732298046294</id><published>2010-07-29T10:04:00.000-07:00</published><updated>2010-07-29T11:19:41.940-07:00</updated><title type='text'>सफदरजंग के बहाने...</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;हाल&lt;/span&gt; ही में सफदरजंग अस्पताल के चक्कर काटने को मजबूर होना पड़ा। इससे पहले मैंने किसी बड़े अस्पताल का चक्कर नहीं काटा था। जब तक दिल्ली नहीं आया था तब तक बिहार में अपने घर के आसपास क्लिनिक या नर्सिंग होम से ही काम चल जाता था, लेकिन दिल्ली की बात और थी। यहां अस्पताल का मतलब कुछ और ही है, प्राईवेट में इलाज करवाना तो ज्यादातर लोगों के बूते की बात ही नहीं। यूं, दिल्ली के बारे में माना जाता है कि यहां देश के कुछ बेहतरीन अस्पताल हैं, जो काफी हद तक सही बात भी है। लेकिन वे अस्पताल काम के बेतहाशा बोझ के तले चरमरा रहे हैं। एम्स या सफदरजंग जब बना होगा तो उस समय की आबादी को ध्यान में रखकर इसे खासा बड़ा अस्पताल कहना चाहिए। &lt;span class=""&gt;लेकिन&lt;/span&gt; आज का हिंदुस्तान जब अपनी आबादी को करीब 120 करोड़ तक आंकने को बैचेन है-सफदरजंग मानो कराह रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हजारों की भीड़, लोगों का रेलमपेल, डॉक्टरों और नर्सों के चेहरे पर तनाव और उनके व्यवहार में चिड़चिड़ापन, सफदरजंग की मानो खासियत बन गई है। देश के सुदूरवर्ती इलाकों से आए लोग, बुंदेलखंडी से लेकर मैथिली तक बोलते हुए आपको सफदरजंग के कैम्पस में मिल जाएंगे। वे अपने मरीज के साथ एक बड़ी उम्मीद में यहां आते हैं और अस्पताल के कैंम्पस में दरी या चादर बिछाकर सो जाते हैं और अचानक कभी बारिश आती है और सब उठकर अस्पताल के अहाते में जाकर खड़े हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफदरजंग सरकारी अस्पताल है, बिल्कुल वैसा ही जैसा कोई सरकार अस्पताल होता है। लेकिन राजधानी में होने की वजह से और सरकार का एक प्रतिष्ठित अस्पताल होने की वजह से इसका काम काफी चाक चौबंद है। मरीजों को मुफ्त का इलाज और दवाईयां तो मिलती ही है-खाना भी ठीक ठाक मिलता है। मैं जिस मरीज के साथ आया था उसे अगर किसी निजी अस्पताल में इलाज करवाने ले जाता तो खर्च कम से काम लाख टके से ऊपर का आता, लेकिन सफदरजंग में एक अठन्नी तक खर्च नहीं हुआ। ये देखकर मैं शायद पहली बार अपनी सरकार से नाराज नहीं हुआ। मुझे लगा कि मेरे मुल्क में एक सरकार भी है जो कभी-2 कुछ काम भी कर लेती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफदर जंग में एक शानदार मेडिकल कॉलेज भी बनकर तैयार है और (कुछ लोगों के मुताबिक) हिंदुस्तान का सबसे बड़ा बर्न युनिट भी यहीं है। बगल में जयप्रकाश नारायण ट्रोमा सेंटर है और अस्पताल के पूरब में गर्व &lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TFG1cDLsymI/AAAAAAAAAW8/Xqvd9OE_rbE/s1600/11.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5499376113491429986" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 180px; CURSOR: hand; HEIGHT: 130px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TFG1cDLsymI/AAAAAAAAAW8/Xqvd9OE_rbE/s320/11.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;से&lt;/span&gt; इठलाता हुआ एम्स।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरकार के इस अस्पताल में लोगों की रेलमपेल के बावजूद मुफ्त का इलाज देखकर मुझे कुछ पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र याद आ गए जिसमें जनता को मुफ्त की स्वास्थ्य और शिक्षा सेवा मुहैया करवाने की बात अक्सर की जाती है। वैसे तो क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी सभी पार्टियों ने स्वास्थ्य के बारे में काफी जबानी जमा-खर्च की है लेकिन मुझे लगता है कि वाम पार्टियां इस बारे में ज्यादा गंभीर है। मेरे दोस्त राजीव का छोटा भाई सुमित हाल ही में कलकत्ता से इंजिनियरिंग करके लौटा है उसका भी यहीं कहना है कि बंगाल के गांवों में सरकारी अस्पतालों की हालत काफी अच्छी है। बिहार-यूपी में इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। इधर सुना नीतीश बाबू भी कुछ सक्रिय हुए हैं। केरल में भी सुना कि सरकारी अस्पताल टनाटन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा ध्यान अचानक सफदरजंग की दीवार पर लगे एक पोस्टर पर जाता है जिसमें कर्मचारी यूनियन के एक धरने का जिक्र है। इसमें कहा गया है कि सफदरजंग को दिल्ली से झझ्झर(हरियाणा) न ले जाया जाए और इसकी जमीन को निजी हाथों में बेचने का षडयंत्र न किया जाए। मैं अचानक चौंक उठता हूं। सफदरजंग अस्पताल जिस जमीन पर बना है कायदे से दिल्ली के हिसाब से उस जमीन की कीमत करीब 20,000 करोड़ से कम नहीं होनी चाहिए। तो क्या सरकार इसे किसी अंबानी या टाटा को सौंपने वाली है ? मेरा मन बैचेन हो उठता है। दूसरी बात ये कि इसे हरियाणा शिफ्ट करने का मतलब होगा कि यूपी, बिहार और एमपी से आए उन हजारों लोगों की परेशानियों में एक और इजाफा जो दिल्ली में अपने कई रिश्तेदारों के होने की वजह से सफदरजंग में इलाज करवाने आ जाते हैं और अपने रहने का इंतजाम भी कर लेते हैं। झझ्झर में उन्हें कौन अपने घर में रहने देगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचानक लखीमपुर खीरी से मेरे मित्र के के मिश्रा का फोन आता है, मैं उन से बात करता हूं। वे कहते हैं कि सुशांत, खीरी में भले ही मैं कार मेनटेन कर लूं लेकिन मेरे जैसे लाखों हिंदुस्तानियों की औकात नहीं है कि वे निजी अस्पताल में लाखों की रकम चुका कर इलाज करवाएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी अचानक किसी अखबार में मणिशंकर अय्यर के बयान पर नजर जाता है वे कॉमनवेल्थ गेम्स को कोस रहे हैं। मैं उनकी राय से इत्तेफाक रखने लगता हूं। आखिर इस गेम के नाम पर 50,000 करोड़ रुपैया किसकी जेब से खर्च हो रहे हैं ? और क्यों ? इतने रुपये में तो सफदरजंग जैसा करीब 50 सफदरजंग मुल्क के 50 जिलों में जरुर बन सकता था। हमारी सरकार ठेकेदारों और दलालों के चंगुल में फंस गई है जो भव्य खेलों का आयोजन करवाकर मेरा खून पी रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सोच रहा हूं कि अगर वाकई सफदरजंग को कहीं और शिफ्ट कर दिया गया और इसकी जमीन कॉरपोरेट घरानों को दे दी गई तो अगली बार मेरा कोई रिश्तेदार या खुद मैं ही-कर्ज लेकर कहीं इलाज करवा रहा होउंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बगल की दीबार पर सफदरजंग के एक स्टॉफ का बेशर्म इश्तेहार पोस्टर में खिलखिला रहा है-कृपया दो बीएचके का स्टॉफ क्वाटर किराए के लिए उपलब्ध है, संपर्क करें। आमीन!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-5782035732298046294?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/5782035732298046294/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=5782035732298046294' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/5782035732298046294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/5782035732298046294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/07/blog-post_29.html' title='सफदरजंग के बहाने...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/TFG1cDLsymI/AAAAAAAAAW8/Xqvd9OE_rbE/s72-c/11.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4666438312158551584</id><published>2010-07-04T07:37:00.000-07:00</published><updated>2010-07-04T07:39:57.030-07:00</updated><title type='text'>बी हैप्पी...बी पोजिटिव...</title><content type='html'>&lt;p&gt;क्या आपने कभी महसूस किया है कि अचानक कोई आता है और आपका चेहरा खिल उठता है, जबकि कुछ लोगों के आते ही आप नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं ! कई बार तो ऐसा होता है कि कई लोगों के जिक्र भर करने से, आप अपने आप को खिला हुआ महसूस करते हैं भले ही आप उससे न मिले हों! अध्यात्म और मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो कुछ लोग पोजिटिव इनर्जी लेकर आते हैं और आपको एक पोजिटिव फीलींग से भर देते हैं जबिकि दूसरी तरफ कुछ लोग हमेशा निगेटिव इनर्जी ही छोड़ते रहते है। वे हमेशा दुख ही बांटते रहते हैं और सामने वाले को भी दुखी कर जाते हैं। दरअसल, निगेटिव इनर्जी बांटने वाले को लोग पसंद नहीं करते और उनसे बचना भी चाहिए। वे दुनिया की ऐसी भयावह तस्वीर आपके सामने खींचते हैं कि आपका आत्मविश्वास तो कमजोर होता ही है साथ ही आप भी निगेटिविटी से भर जाते हैं। ऐसे लोगों को लोग पसंद नहीं करते हैं और उनसे कन्नी काटने की कोशिश करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आसपास रहने वाले ऐसे लोगों को आप आसानी से पहचान सकते हैं। आप उनके कुछ बयानों पर महज गौर करते रहिए। मेरा टाईम ही खराब है... मैं ये नहीं कर सकता...ये कैसे हो सकता है...पूरी दुनिया स्वार्थी हो गई है...ये कुछ ऐसे बयान है जो बताते हैं कि सामने वाले की सोच कैसी है। ऐसे लोग अक्सर निंदा पुराण में भी खासी दिलचस्पी रखते हैं। इसको जानने का दूसरा तरीका ये भी है आप ये गौर करिये कि सामने वाला बंदा जिन-जिन लोगों का जिक्र कर रहा है वो उसके कैरेक्टर के किन पहलूओं को उजागर कर रहा है। अक्सर ऐसा होता है कि कुछ लोगों को दुनिया के किसी भी इंसान में कोई अच्छाई नहीं दिखाई देती। ऐसे लोगों से भी बचने की जरुरत है।&lt;br /&gt;दरअसल, ये दुनिया अच्छाई और बुराई का मिला-जुला रुप है। पोजिटिव सोच वाले लोग अक्सर लोगों की अच्छाईयों की बात करते हैं, वे उनमें कुछ सीखने लायक चीज खोजते हैं। जबकि निगेटिव सोच वाले लोग अपने दिमाग का पोजिटिव रिशेप्टर ही बंद करके रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, पोजिटिव इनर्जी वाला इंसान ही लीडरशिप एबलिटी पाल सकता है। वो उम्मीदें जगाता है, सपने दिखाता है और उसे पूरा करने का रोडमैप तैयार करता है। ऐसा ही इंसान टैलेंट को पहचान सकता है और उसे बढ़ावा भी दे सकता है। लेकिन यहां एक सवाल ये भी है कि मान लीजिए कोई निगेटिव इनर्जी से भर ही गया है तो क्या किया जाए ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निगेटिविटी के कई कारण हो सकते हैं। व्यक्ति विशेष का पारिवारिक-सामाजिक माहौल, उसकी अपब्रिंगिग और उसको मिलने वाला गाईडेंस का इसमें रोल तो होता ही है, लेकिन उससे भी बड़ा रोल होता है उसे अपने जिंदगी में मिलने वाली नाकामयाबियों का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर नाकामयाबी को लोग एक चुनौती की तरह नहीं लेते-वे उसे जिंदगी का अंत मान लेते हैं। दरअसल, ये दुनिया हमारी बदौलत नहीं चलती, हां हम उसे थोड़ा बेहतर बनाने में अपना योगदान जरुर दे सकते हैं। निगेटिविटी से भरे लोगों को चाहिए की वे हमेशा इनगेज रहें। खालीपान, निगेटिव उर्जा को और भी ज्यादा बढ़ाता है। निगेटिविटी से भरे लोग समाज से कटने लगते हैं, उन्हे लगता है कि उनके पास बांटने को कुछ भी नहीं है। जबकि ऐसे वक्त लोगों को नए-नए लोगों से मेलजोल की सबसे ज्यादा जरुरत होती है।&lt;br /&gt;ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलने और बात करने पर कई तरह के अनुभव, विचार और मौके सामने आते हैं। सच्चाई तो ये है कि कोई काम तभी हो पाता है जब दो आदमी मिलते हैं। ऑनलाईन या टेलीफोनिक मीटींग्स से ज्यादा जरुरी वन-टू वन मीटिंग होता है क्योंकि तभी लोग आपकी पूरी परसनाईल्टी से वाकिफ हो पाते हैं।&lt;br /&gt;इसके अलावा, दुनिया के कामयाब लोगों की बायोग्राफीज भी निगेटिव उर्जा से मुक्त होने में मददगार साबित होती है जिन्होंने खाक से उठकर आसमान को छुआ है। परिवार के लोगों और दोस्तों का प्रोत्साहन ऐसी दशा में बहुत मददगार साबित होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो चलिए, हम आज ही तय करें कि अपने को पोजिटिव इनर्जी से भरपूर बना लें। अगर हमें सुबह-सुबह चिड़ियों की चहचहाहट, खेतों में काम करते किसानों की मुस्कुराहट और मेहनतकश लोगों के चेहरों में कोई उम्मीद नजर आती है तो यकीन मानिए कि हम पोजिटिव इनर्जी से लवरेज हैं। बस हमें करना ये है कि इस पोजिटिव इनर्जी को बांटने में कोई कंजूसी नहीं करनी है। फिर देखिए जिंदगी किस तरह आगे बढ़कर आपका हाथ थाम लेती है! &lt;/p&gt;&lt;p&gt;(यह लेख आई नेक्स्ट में छप चुका है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4666438312158551584?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4666438312158551584/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4666438312158551584' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4666438312158551584'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4666438312158551584'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='बी हैप्पी...बी पोजिटिव...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-104091101533126611</id><published>2010-06-22T22:18:00.000-07:00</published><updated>2010-06-22T22:23:58.626-07:00</updated><title type='text'>भोपाल नरसंहार पर...काफी देर बाद...</title><content type='html'>&lt;p&gt;&lt;strong&gt;एक शहर को&lt;/strong&gt; जिंदा गैस चैंबर में भून डालने के बाद भी  कुछ सवाल जिंदा हैं। न्यूज चैनल स्टूडियों में बैठे देश के दोनों बड़े दलों  के प्रवक्ता या तो जनता की असहायता के प्रतीक लगते हैं या फिर अपनी  हरमजदगी के विज्ञापन करते मॉडल। सवाल ये भी नहीं है कि ओबामा ने ब्रिटिश  पेट्रोलियम से 20 अरब डॉलर की रकम कैसे निचोड़ ली या फिर हमारी सरकार ने  इतने कम पैसे पर कैसे यूनियन कार्बाइड को क्लीन चिट दे दी। किसी सरकारी  लालबुझक्कड़ ने कहा कि भोपाल के न्यायाधीश ने अपने फैसले के दिन महज  नियम-कायदों के हिसाब से ही अभियुक्तों को इतनी कम सजा दी। मानो इसका तो  कुछ किया ही नहीं जा सकता। सरकार ने हमेशा की तरह जनता के आक्रोश को देखते  हुए एक ग्रुप ऑफ मिनिस्टर बना दिया, जो अनंत काल में अपना फैसला सुनाएगी।  तब तक शायद एंडरसन भी मर चुका होगा और महिंद्रा भी।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;अब चूंकि सरकार&lt;/strong&gt; को इस बात का बिलकुल डर नहीं है कि  5-10 लाख लोग दिल्ली की सड़कों पर उतर कर साउथ ब्‍लॉक को घेर सकते हैं या  इसमें कथित रूप से शामिल नेताओं और उनके नामलेवाओं को घर में घेरकर मारा जा  सकता है – तो सरकार क्यों कोई कार्रवाई करेगी। जब पिछले 26 साल से कोई  बड़ा आंदोलन नहीं हुआ तो अब खाक होगा। सरकार ये जानती है।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;लेकिन सवाल ये है&lt;/strong&gt; कि क्या भोपाल महानरसंहार के जिंदा  भारतीय दोषियों को सजा दिलाने के लिए संसद कानून में संशोधन नहीं कर सकती?  इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता को जब सुप्रीम कोर्ट में रद्द दिया गया था तो  याद कीजिए क्या हुआ था। इंदिरा गांधी जो खुद ही सरकार थी – उन्होंने  रातोरात संविधान में संशोधन कर अपने आपको उस फैसले से ऊपर कर लिया था। यानी  वैसे तो भारत की सरकार ‘महासरकार’ है लेकिन अमेरिका का मामला होता है तो  पिद्दी हो जाती है। लेकिन फर्ज कीजिए, सरकार हिंदुस्तान में सुकून की  जिंदगी जी रहे भोपाल नरसंहार के शरीफजादों को कोई सजा देती है, तो अमेरिका  को क्यों खुजली होगी? उसे तो सिर्फ एंडरसन से मतलब है, जिसका मामला उसने  रफा-दफा मान लिया है। लेकिन नहीं, सरकार महिंद्रा टाइप के भारतीय गुनहगारों  को कोई सजा नहीं देगी। आप और हम जब अपने-अपने ऑफिसों में महिंद्रा के  बंधु-बांधवों की कंपनियों में खट रहे होंगे तो लगभग पौरुषहीन हो चुका  महिंद्रा किसी कोमलांगी की बाहों में झूल रहा होगा और उसका पोता किसी  जेसिका लाल जैसियों की हत्या कर रहा होगा।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;मजे की बात ये है&lt;/strong&gt; कि आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद किसी  ने अभी तक अर्जुन सिंह या स्वर्गीय हो चुके राजीव गांधी या फिर बीच के  सालों में बीजेपी के कुर्सीधारी नेताओं की भूमिका की जांच करने की मांग  नहीं की है। क्यों न इन लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए। सारे लोग ‘बड़े  लोगों’ को बचाते हुए ही अभी तक बहस कर रहे हैं। हमें इस बात से कोई मतलब  नहीं है कि अर्जुन सिंह का सोनिया से ‘चुप्पी’ का डील कैसे फ्लॉप हुआ। हमें  सिर्फ इस बात से मतलब होनी चाहिए की अगर अर्जुन सिंह या राजीव गांधी दोषी  हैं तो फिर उनको सजा जरूर मिलनी चाहिए। हमें इस बात का जवाब चाहिए कि बीच  के दौर में वीपी सिंह से लेकर वाजपेयी सरकार तक ने उस अमेरिकी हत्यारे को  भारत न लाकर संविधान की किस धारा का उल्लंघन किया।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;कुछ लोगों की राय&lt;/strong&gt; में राजीव गांधी तो दिवंगत हो चुके  हैं, उनको जांच के दायरे में कैसे लाया जा सकता है? इसका जवाब ये है कि अगर  जांच के बाद राजीव गांधी दोषी पाये जाते हैं, उनको दिये गये तमाम  राष्ट्रीय सम्मान छीन लिये जाएं, जिनमें भारत रत्न भी शामिल है, और दूसरे  जिंदा लोगों के पेंशन और सम्मान छीने जा सकते हैं।&lt;/p&gt; &lt;p&gt;&lt;strong&gt;लेकिन मैं ये सवाल&lt;/strong&gt; किससे कर रहा हूं? जब देश का पक्ष  और विपक्ष ही इस नरमेघ में शामिल है तो फिर सवाल किससे और क्यों?&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-104091101533126611?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/104091101533126611/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=104091101533126611' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/104091101533126611'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/104091101533126611'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='भोपाल नरसंहार पर...काफी देर बाद...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-6192212554398087866</id><published>2010-02-13T08:54:00.001-08:00</published><updated>2010-02-13T08:58:11.659-08:00</updated><title type='text'>शिवसेना की गुंडई के वक्त धमाके का मुफीद वक्त</title><content type='html'>यूं, धमाकों को अहम या कम अहम धमाका तो नहीं कहा जा सकता लेकिन शनिवार को पूना में जर्मन बेकरी के बाहर हुआ धमाका ऐसा धमाका है जिसके बड़े मायने हैं। पिछले नवंबर में असम में भी धमाके हुए थे और इसमें कोई शक नहीं कि वो भी आतंकवादियों की ही करतूत थी। इस लिहाज से पूना में हुआ धमाका गृहमंत्री चिदंबरम की रिपोर्ट कार्ड में लाल निशान के तौर पर तो नहीं देखा जा सकता, लेकिन इसके बड़े मतलब जरुर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गृहमंत्रालय ने ये कबूल किया है कि ये धमाका कोई एक्सीडेंट नहीं था, बल्कि ये आतंकवादियों का किया हुआ धमाका था।  गणतंत्र दिवस के समय से ही इस तरह की खबरें फिजां में तैर रही थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने खुद कबूला था कि वो मुंबई हमलों जैसी घटनाओं के दुबारा न होने देने की गारंटी नहीं ले सकते। उसी वक्त हमारे रक्षामंत्री ए के एंटनी ने भी कुछ इसी तरह की आशंका जताई थी। पाकिस्तान लगातार मुबंई हमलों के आरोपियों के बारे में टालमटोल की नीति बरकरार रखे हुए है। भारत ने पिछले दिनों उससे समग्र वार्ता की पहल फिर से शुरु करने की पेशकश की, जिसे पाकिस्तानी हुक्मरानों ने अपनी विजय के तौर पर पाक जनता के सामने परोसा। जब वार्ता की औपचारिकताएं तय की जा रही थी, ठीक उससे पहले ये धमाका हुआ है। ऐसे में ये धमाका जिस बात की ओर इशारा करता है वो ये कि वार्ता से ठीक पहले वार्ता को रोकने की कोशिश जरुर की गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहम बात ये भी है कि धमाकों का जगह और इसकी तिथि बड़े शातिराना ढंग से चुनी गई। जिस जर्मन बेकरी में धमाका हुआ और उसमें कई विदेशियों के मारे जाने की भी खबरें हैं। ये बेकरी ओशो आश्रम के नजदीक  है जहां विदेशियों खासकर यूरोपियनों की खासी आदमरफ्त रहती है। ये धमाका इस ओर संकेत करता है कि इस धमाके के तार आतंकवाद के अंतराष्ट्रीय नेक्सस से जुड़े हो सकते हैं। ये धमाका उसी अंदाज में हुआ है जिस अंदाज में इन्डोनेशिया और मिश्र में हुए थे। अमेरिका के अफगानिस्तान और इराक में हमलों के बाद अंतराष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद का निशाना अमेरिकी और यूरोपीयन देशों के नागरिक होते रहे हैं। ये बात ओसामा बिन लादेन के कई कथित टेपों से जाहिर होती रही है। ऐसे में एक ही साथ इस धमाके से कई निशाना साधने की कोशिश की गई है। इतिहास के इस नाजुक मोड़ पर हिंदुस्तान दुर्भाग्य से अमेरिका-नीत पश्चिमी देशों की करतूतों का फल भी भुगतने पर मजबूर हो रहा है। असली चिंता यहां से शुरु होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी अहम बात इस धमाकों के टाईमिंग को लेकर है। एक ऐसे वक्त में जब महाराष्ट्र समेत पूरा देश ठाकरे परिवार की गुंडागर्दी को जबर्दस्ती झेलने और सहने के लिए मजबूर हो रहा है, बिलाशक ये वक्त धमाका करने वालों के लिए बड़ा ही मुफीद वक्त था। महाराष्ट्र की लगभग पूरी पुलिस शिवसैनिकों की गुंडागर्दी रोकने के लिए जब सिनेमाघरों के आसपास तैनात हो तो फिर क्या फर्क पड़ता है कि आपने एनएसजी के कितने हब मुल्क में बना लिए। ये ऐसा मुफीद वक्त है जिसे शिवसेना जैसी पार्टियों के रहते हमारे मुल्क के दुश्मन बार-बार पाएंगे और धमाके करते रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ा सवाल अब ये है कि इन धमाकों से भारत-पाक के बीच होनेवाली संभावित वार्ता पर क्या असर पड़ेगा। तकरीबन डेढ़ साल से दोनों मुल्कों के बीच जो बातचीत ठप्प पड़ी हुई है कहीं वो तो प्रभावित नहीं हो जाएगी। अगर ऐसा हुआ तो वाकई ये आतंकवादियों के मनसूबों को पूरा करने जैसा होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-6192212554398087866?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/6192212554398087866/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=6192212554398087866' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6192212554398087866'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6192212554398087866'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='शिवसेना की गुंडई के वक्त धमाके का मुफीद वक्त'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2245868202985971838</id><published>2010-01-18T10:21:00.000-08:00</published><updated>2010-01-18T10:24:22.657-08:00</updated><title type='text'>ज्योतिदा… ‘जीडीपी’ तुम्हे जरुर माफ नहीं करेगी...!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/S1Sm8Zdfn7I/AAAAAAAAATs/f3qIwdonqBg/s1600-h/jb-labour-conf.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5428147007445245874" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 267px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/S1Sm8Zdfn7I/AAAAAAAAATs/f3qIwdonqBg/s320/jb-labour-conf.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; देश के बड़े नेताओं में से एक ज्योति बसु चले गए...लेकिन वे हमारी पीढ़ी के ऊपर भी एक अमिट छाप छोड़कर गए। हम इतिहास के उस काल में जी रहे हैं जब नेहरु काल के साक्षी रहे एक-एक नेता धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं और देश की हुकूमत अब उन लोगों के हाथ आ रही है जो या तो आजादी के बाद पैदा हुए या जिन्होने उस के बाद होश संभाला था। राजनीति की हमेशा से अपनी नैतिकता रही है और असंभव को संभव बनाने की कला के रुप में ये हर घड़ी..हर मिनट अपना रुप बदलती रही है। ऐसे में ज्योति बसु का जाना निश्चय ही एक बड़ा खालीपन छोड़ जाता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आमतौर पर हमारी पीढ़ी ज्योतिदा को एक सौम्य, सुसंस्कृत और मितभाषी नेता के रुप में जानती रही है जिन्होने अपने होने का कभी ज्यादा विज्ञापन नहीं किया। उन्होने अपने लंबे शासनकाल का कोई गुरुर नहीं पाला जबकि अक्सर उनकी पार्टी इस दंभ से पीड़ित दिखी। ज्योतिदा भारतीय इतिहास के संभवत: ऐसे पहले नेता हुए जिन्होने इमानदारी से भूमिसुधार लागू किया और ग्रामीण बंगाल में सशक्तिकरण की एक ज्योति पैदा की। आज बंगाल में सबसे कम भूमिविवाद के मामले हैं और शायद इस वजह से भी वो अपराध सूंचकांक में निचले पायदान पर है। लेकिन वे भी समझ चुके थे कि जिस बंगाल को ‘80 के दशक में उनकी सख्त जरुरत थी वो 21 वीं सदी के शुरुआत में दूसरी चुनौतियों से रुबरु हो चुका था। वाम राजनीति और ट्रेड यूनियनों के सख्त साये में बंगाल..औद्योगिकरण की दौर में पिछड़ता गया और ‘सिटी ऑफ ज्वाय’ कहा जाने वाला कलकत्ता ‘दोयम दर्जे’ का होता गया। राजीव गांधी ने एक दफा कलकत्ता को मुर्दों का शहर तक कह डाला था-जिस पर बंगाली भद्रमानुषों ने आपत्ति जताई थी। अवसरों की तलाश में छटपटाता बंगाल का मध्यवर्ग...दिल्ली-बंबई के युवाओं की तुलना में असहाय महसूस करने लगा और यहीं से बंगाल की वाम राजनीति चरमराने लगी। जिस वाम ने कभी गांवो और किसानों की सशक्तिकरण के लिए सब कुछ किया था उसी के नौजवान होते बच्चे अब वाम सरकार से उदारीकरण के दौर में अपना सही मुकाम मांग रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या ज्योति बसु को हम या हमारा इतिहास सिर्फ इसी आधार पर आंकेगा कि उनके दौर में बंगाल की जीडीपी क्या थी? या फिर उस दौर की समग्र कसौटियों पर उनकी गणना की जाएगी?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें याद है कि बिहार के सुदूरवर्ती गांव में जब हम होश संभाल रहे थे...उसी वक्त लोगों का नौकरी की खोज में कलकत्ता जाना कम होने लगा था। ये ‘80 के दशक की बात होगी। ‘श्रम’ ने अपना रास्ता दिल्ली, पंजाब और बंबई की ओर मोड़ लिया था। ये तय होता जा रहा था कि बंगाल के पास अब देने को पैसे नहीं है। लेकिन हमारी पूरी पीढ़ी बंगालियों की बौद्धिकता, उनकी संस्कृति और साहित्य से गजब प्रभावित थी। हम अखबार देखते तो बंगाली के रुप में ज्योतिदा ही नजर आते-वे हमारे जन्म से लेकर पूरी जवानी तक हमें बंगाल के रुप में दिखे। हम उनके व्यक्तित्व के आईने में रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर..शरत और बंकिम तक को देखते। ये यकीन ही नहीं होता कि इस सौम्य और धवल व्यक्तित्व के साये में उनकी पार्टी ‘गुंडई’ भी करती होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये एक ज्वलंत प्रश्न है कि क्या बंगाल में सिर्फ मार्क्सबादियों की वजह से ही आर्थिक विकास रुक गया या इसके कुछ और भी कारण थे ? अगर ऐसा था तो फिर पूरा का पूरा उत्तरभारत क्यों विकास के पैरामीटर पर फिसड्डी नजर आता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, भारत के मौजूदा ढ़ांचे में आर्थिक विकास कई कारकों का नतीजा है। राज्यों की हालत केंद्र के सामने वैसे भी नगरपालिका से ज्यादा नहीं-इसले अलावा देश के अलग-अलग इलाकों की भौगोलिक बनाबट इसमें बड़ा रोल अदा करती है। एक लंबे वक्त तक केंद्र की कांग्रेस और भाजपा सरकारों के वक्त ज्योतिदा और उनकी पार्टी को ये मंजूर नहीं था कि विकास का वो ढ़ांचा स्वीकार किया जाए जो 11 फीसदी जीडीपी देती है। उन्होने साबुन और कॉस्मेटिक के क्षेत्र में निवेश को खारिज कर दिया लेकिन जब ‘सही निवेश’ की बारी आई तो हालात हाथ से निकल चुके थे। इतिहास कई बार बहुत देर से मौका देता है। बंगाल की बढ़ी हुई आबादी, ये विकल्प नहीं देती कि सिंगूर जैसी परियोजना लागू की जाए। ऐसे में ममता बनर्जी… ‘जनवाद’ और किसानों की स्वाभाविक नेता नजर आ रही है जो उस गठबंधन की सदस्य है जो वैश्विक पूंजीवाद का बेहतरीन दोस्त है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हां, एक बात जो तय है कि ज्योतिदा...वामपंथ को पूरी तरीके से आधुनिक पपिप्रेक्ष्य में नहीं ढ़ाल पाए। वे ट्रेड यूनियनों को एक हद से ज्यादा लगाम नहीं लगा पाए और कलकत्ता की छवि बिगड़ृती चली गई। शायद इसकी एक वजह ये भी हो कि उनकी और उनके पार्टी की पूरी उर्जा गैरकांग्रेस और बाद में गैर-भाजपावाद के विकल्प को तलाशने में ही लगी रही....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ज्योतिदा ने जिस बंगाल को छोड़ा वो सबसे कम भेदभाव वाला राज्य था। वो समाजिक सौहाद्र और भाईचारे का अद्भुद प्रतीक बन गया। बंगाल की मौजूदा पीढ़ी अपने दिल्ली और बंगलोर के समकक्षों की तुलना में भले ही ज्योतिदा की नीतियों की आलोचना करे...लेकिन ये ज्योति बसु की नीतियों का ही नतीजा था कि उत्तरभारत में शायद पहली बार किसी राज्य में शताब्दियों से चले आ रहे समाजिक-आर्थिक भेदभाव का अंत हो सका। आज का बंगाल अगर एक साथ उड़ान भरने को व्याकुल दिख रहा है तो ये ज्योतिदा के ही नीतियों का परिणाम था-हां ज्योतिदा को जीडीपी का इतिहास जरुर माफ नहीं करेगा। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2245868202985971838?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2245868202985971838/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2245868202985971838' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2245868202985971838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2245868202985971838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/01/blog-post_18.html' title='ज्योतिदा… ‘जीडीपी’ तुम्हे जरुर माफ नहीं करेगी...!'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/S1Sm8Zdfn7I/AAAAAAAAATs/f3qIwdonqBg/s72-c/jb-labour-conf.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2109591491587421748</id><published>2010-01-13T11:37:00.000-08:00</published><updated>2010-01-13T11:42:21.739-08:00</updated><title type='text'>जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है...</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/S04h0Ti5_OI/AAAAAAAAATk/G6xux_Q7yDc/s1600-h/2010010850410101.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5426311783511620834" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 227px; CURSOR: hand; HEIGHT: 242px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/S04h0Ti5_OI/AAAAAAAAATk/G6xux_Q7yDc/s320/2010010850410101.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;प्रतिभा कटियार&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अभी-अभी कैलेंडर बदला है. अभी-अभी हमने पिछले बरस के अचीवमेंट्स का बहीखाता बंद किया है. अभी तक हमारे चेहरों पर सक्सेस की मुस्कुराहटें कायम हैं. जश्न दर जश्न...टीआरपी दर टीआरपी...सर्कुलेशन दर सर्कुलेशन... बेहद झूठी, खोखली सफलताओं के शोर में हमारी रूहें तबाह हो चुकी हैं. खाल को खुरचो तो फिर खाल ही निकलती है...खून नहीं...दर्द नहीं...कहकहे...कयामत बरपाने वाली हंसी. तमिलनाडु वाली वो खबर जैसे जेहन में कैद है अब तक. वो सड़क पर पड़ा कराह रहा था...तड़प रहा था...खून ही खून...दर्द ही दर्द. चिल्लाता, कराहता वह सब इंस्पेक्टर हमारे कहकहों के शोर में दम तोड़ गया. सत्तानशीनों के काफिले गुजरते गये...लेकिन किसी के कानों में उसकी आवाज नहीं गयी. कोई नहीं रुका...कोई नहीं. मरना उसकी नियति थी. वो मर गया. हमारे पास चैनल बदलने के ऑप्शन थे. लाफ्टर शो थे, सीरियल, एमटीवी...रजाइयां नींदें...सवेरा और जिन्दगी...उसके पास नहीं था कुछ भी. उसके परिवार के पास भी कुछ नहीं था. सोचती हूं तो क्या वो इंस्पेक्टर ही मरा था सड़क पर जिंदगी मांगते हुए. वो जिंदगी जो उसकी थी. जिसे किसी की भी एक छोटी सी पहल से सहेजा जा सकता था. नहीं, वो इंस्पेक्टर नहीं मरा था, वो हमारी मौत थी. हमारी आत्माओं की मौत. ढूंढिये तो हमारे शरीरों में बहता हुआ खून सफेद हो चुका है. कहकहों के शोर में तकलीफें गुम हो चुकी हैं. हममें से कितने लोग हैं जो सिर्फ सांस भर नहीं ले रहे बल्कि जी रहे हैं. मंजूनाथ जी रहा था...चंद्रशेखर भी जीना चाहता था...और भी बहुत सारे नाम हैं. जो सचमुच जीना चाहते हैं लेकिन हम उन्हें जीने नहीं देते. वे दम तोड़ देते हैं इसी तरह सड़कों पर, गलियारों में, घरों में, कैम्पस में. ऐसे किसी भी व्यक्ति की मौत हर उस व्यक्ति की मौत भी होती है जो कहीं जिंदा है अब तक अपनी आत्मा के साथ. सवाल किससे करें. जवाब कौन देगा. हम आतंकवादियों से लडऩे की बात कर रहे हैं (सिर्फ बात). वो तो खुले दुश्मन हैं. उनके इरादे पता हैं हमें. तरीके भी. लेकिन क्या होगा उन दुश्मनों का जो हमारे ही भीतर छुपा बैठा है. जो हमारी आत्माओं में दीमक की तरह लग गया है. किस उल्लास में डूबे हैं हम. क्या सचमुच उल्लास का, सुख का कोई कारण है? जीडीपी ग्रोथ बढ़ रही है और हम अंदर ही अंदर खोखले हो रहे हैं. हमारे बच्चे खुदकुशी कर रहे हैं. हमारे रिश्ते हमसे मुंह चुरा रहे हैं. हमारे अपने हमारी ओर हसरत से देखते हुए दम तोड़ रहे हैं और हम खुश हैं. क्या हर पल अपनी आत्मा के मरने की आवाज सचमुच किसी को सुनाई नहीं देती. क्या यह एक बड़े जनआंदोलन का वक्त नहीं है. जिस समाज में निदोर्षों को किसी भी पल मौत का खौफ सता रहा हो, उस समाज में कहकहों के सहारे जीने की कोशिश को क्या कहा जाये. यह तो कुछ ऐसा ही है कि घर चाहे जैसा हो दरवाजे पर मखमल के पर्दे $जरूर लटकाना. हमारी लहूलुहान आत्माओं पर, किसी के दुख से विचलित होने की, आंखों की कोरें नम होने की इंसानी जरूरतों पर पर्दा डाल रहे हैं ये सक्सेस आंकड़े, ये ग्लैमर, ये शोर, कहकहे. गालिब याद आते हैं कि रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल...जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है...&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2109591491587421748?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2109591491587421748/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2109591491587421748' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2109591491587421748'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2109591491587421748'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/01/blog-post_13.html' title='जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या है...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/S04h0Ti5_OI/AAAAAAAAATk/G6xux_Q7yDc/s72-c/2010010850410101.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2377777050567378137</id><published>2010-01-10T09:11:00.000-08:00</published><updated>2010-01-10T09:12:16.206-08:00</updated><title type='text'>हम कहां जा रहे हैं....?</title><content type='html'>तमिलनाडु में हाल ही में एक सब-इस्पेंक्टर की मंत्रियों के सामने बेरहमी से हत्या और उसे बचाने में अधिकारियों के द्वारा दिखाई गई अनिच्छा ऐसी पहली घटना नहीं हैं जो हमारी बढ़ रही संवेदनहीनता की तरफ इशारा करती है। ऐसी घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं जिसमें कहीं किसी मीडियाकर्मी ने किसी को महज इसलिए नहीं बचाया कि उसे बेहतरीन स्टोरी मिल रही थी। रोडरेज की घटनाएं हों या फिर नजदीकी रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार की खबर-अब ये खबरें हमारी संवेदना को नहीं झकझोड़ती। ऐसा लगता है कि हम इन घटनाओं के प्रति  इम्यून होते जा रहे हैं। 6 महीने की अवोध वालिका से लेकर 80 साल की बुजु्र्ग महिला तक सुरक्षित नहीं। ऐसे में सवाल ये है कि एक मुल्क के तौर पर हम विकास के जिस स्टेज से गुजर रहे हैं, क्या वाकई वो डेवलपमेंट कहे जाने लायक है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, हम ऐसे नकली विकास और जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों में उलझे हुए हैं कि हमें पता ही नहीं है कि देश की जनता किन हालातों में जी रही है। हम खुश है, हमारी सरकारें खुश हैं कि 10 फीसदी ग्रोथ हो रहा है लेकिन आए दिन बेगुनाह मारे जा रहे हैं-लेकिन उस सबसे से इस ग्रोथ पर थोड़े ही कोई असर होता है। सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ अंधे विकास से हमें कुछ मिलने वाला है? हमने मानवीय मूल्यों का विकास नहीं किया है। हमने पश्चिम के उस विकास मॉडेल को अपना लिया है जिसमें पैसा कमाना ही सबसे बड़ी काबिलियत है। हमने नैतिकता की छद्म परिभाषा गढ़ ली है जिसमें किसी लड़की अपनी मर्जी से शादी करना तो खाप पंचायतों के दायरे में आता है लेकिन किसी बेगुनाह इंस्पेक्टर का मारा जाना नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप गौर कीजिए, उन मामलों पर जिनमें मानसिक दवाब के तहत बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं-इसलिए की उनके मां-बाप उन्हे आईआईटी में जाने का दवाब डाल रहे है। हमारे देश में इतनी कम सुविधाएं पैदा की गई है कि कुछ मलाईदार जगहों के लिए लोग आपस में मर रहे हैं या मार रहे हैं। ये केंद्रीकृत विकास हमें कहीं का नहीं छोड़ रही। हम ऐसे हिंदुस्तान में जी रहे हैं जहां छोटे शहर से आनेवालों से उनकी आईडेटिटी पूछी जा रही है और गांव वाले सिर्फ भेड़बकरियों की तरह हैं!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात, हमारे नैतिक मूल्यों से जुड़े हैं। हम लालची और व्यक्ति केंद्रित होते जा रहे हैं और इसे पेशेवराना अंदाज कहा जा रहा है। इसकी तारीफ की जा रही है-बच्चों को यहीं सिखाया जा रहा है।&lt;br /&gt; तो फिर रास्ता क्या है? हमें सोचना होगा कि हम किधर जा रहे हैं। सरकार और वुद्धजीवियों का रोल यहां अहम हो जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2377777050567378137?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2377777050567378137/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2377777050567378137' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2377777050567378137'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2377777050567378137'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/01/blog-post_10.html' title='हम कहां जा रहे हैं....?'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4126237751440521125</id><published>2010-01-01T05:18:00.000-08:00</published><updated>2010-01-01T05:20:43.388-08:00</updated><title type='text'>क्यों न दर्ज हो तिवारी के खिलाफ मुकदमा?</title><content type='html'>किसी बड़े बुद्धिजीवी की उक्ति है- हम कई औरतों से इसलिए प्रेम करते हैं क्योंकि दुनिया में बुद्धिमान लोगों की भारी कमी है...और इश्वर ने हमें इस विशेष काम के लिए भेजा है कि बुद्धिमान लोगों की आपूर्ति बनी रहे। एन डी तिवारी को बुद्धिजीवी के खांचे में रखने से बहुतों को एतराज होगा लेकिन एन डी ने इस उम्र में युवाओं को जरुर चुनौती दे दी है वे उनकी उर्जा और प्रतिभा का मुकाबला करें। यूं हमारी जनता शासक वर्ग के ऐसे मामलों को 'देवलोक' का मामला मानती रही है और उनके किसी कृत्य के लिए किसी 'खाप' पंचायत का इंतजाम अभी तक नहीं किया गया है। लेकिन सवाल ये है कि क्या एन डी तिवारी को महज उम्र और 'सार्वजनिक जीवन' में उनके 'योगदान'(!) की वजह से छोड़ देना चाहिए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पक्ष-विपक्ष के नेताओं को मिलाकर तिवारी जैसे बिगड़ैल सांढ़ों का तंत्र इतना ताकतवर है कि वो किसी भी संपादक को वो चीज  दे सकता है जो उसे अपने पूरे करियर में लालाओं ने नहीं दी होगी। इसलिेए उनसे किसी भी तरह की उम्मीदे पालना बेकार है। हां, गैरपरंपरागत मीडिया ने जरुर तिवारी के खिलाफ बोलना जारी रखा है। वो तो भला हो यू-ट्यूब का कि 'नारायण' के 'रासलीला' का आनंद जनता लाईव ले सकी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या तिवारी को महज राज्यपाल पद से हटा दिया जाना उनकी(या उसकी?) सजा है? तिवारी ने क्या गुनाह किया कि उसके पीछे लोग बल्लम-बर्छे लेकर पिल पड़े? दो वयस्क व्यक्तियों का आपसी सहमति से संबंध कैसे आपराधिक हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन तिवारी ने आपराधिक गलती की है--&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1. राजभवन सेक्स कांड के बारे में कहा गया है कि तिवारी को ये महिलाएं इसलिए मुहैया कराई गई कि उन्होने खदानों के ठेके दिलवाने का भरोसा दिलाया था। अगर वाकई ऐसा था तो तिवारी पर भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज होना चाहिए और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।&lt;br /&gt;2. तिवारी जिस पद पर बैठे थे वहां वे प्रत्य़क्ष या अप्रत्यक्ष रुप से कई लोगों को उपकृत या उपेक्षित कर सकते थे। ऐसे में अगर ये महिलाएं तिवारी के पास किसी दवाब बस भेजी गई या हमबिस्तर हुई तो तिवारी पर बलात्कार के एंगिल से जांच होनी चाहिए।&lt;br /&gt;3. तिवारी ने ऐसा कर के राजभवन की गरिमा को ठेस पहुंचाया है जिसको बरकरार रखने की बात उन्होने अपने पद की शपथ लेते समय कही थी। ऐसा करके उन्होने संविधान का उल्लंघन किया है और इसके लिए सिर्फ उन्हे पद से हटाया जाना काफी नहीं। एक उच्च कार्यालय में बैठने लायक विश्वसनीयता की उन्होने हत्या की है।&lt;br /&gt;4  इस एंगिल से भी जांच होनी चाहिए कि क्या एक साथ कई महिलाओं के साथ संबंध बनाना अप्राकृति यौनाचार की श्रेणी में आता है या नहीं? क्या भारतीय दंड विधान में ऐसा प्रावधान है जो इसे कानूनन सही मानता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिवारी को जो सजा मिली है वो सिर्फ पॉपुलर सेंटीमेंट्स को तुष्ट करने के लिए मिली है न कि उनके वास्तविक अपराधों के लिए। यहां सवाल नैतिकता का बिल्कुल नहीं है-सवाल इसका है कि उन्होने संविधान का शपथ लेकर उसकी धज्जियां उड़ाई है और सत्ता के शीर्षस्थलों में से एक राजभवन में भ्रष्टाचार के साथ रंगरेलियां की है। एन डी तिवारी एक बड़े अपराधी हैं और उनके कारनामों की जांच होनी चाहिए और जबजक वे पाकसाफ नहीं करार कर दिए जाते उनसे तमाम सरकारी सुविधाएं और उनका पेंशन छीन लिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ये लेख 'जनतंत्र'  पर आ चुका  है- http://janatantra.com/2010/01/01/sushant-jha-on-n-d-tiwari-sex-scandal/&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4126237751440521125?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4126237751440521125/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4126237751440521125' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4126237751440521125'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4126237751440521125'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='क्यों न दर्ज हो तिवारी के खिलाफ मुकदमा?'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-6997858033630088818</id><published>2009-12-28T05:22:00.000-08:00</published><updated>2009-12-28T05:30:27.634-08:00</updated><title type='text'>सबा सौ साल की कांग्रेस के जश्‍न में वेबसाइट का खलल</title><content type='html'>इसे अगर आप लापरवाही कहते हैं तो ये एक गंभीर किस्म की लापरवाही है। देश पर हुकूमत करनेवाली कांग्रेस के वेबसाईट में अगर इस तरह की गलतियां है तो ये वाकई दुर्भाग्यजनक है। कांग्रेस पार्टी की &lt;a style="color: rgb(255, 0, 0);" href="http://www.aicc.org.in/new/past-president-detail.php?id=56"&gt;ऑफिसियल वेबसाईट&lt;/a&gt; बताती है कि कि राजीव गांधी सक्रिय राजनीति में सन्1983 में अपने भाई संजय गांधी की मौत के बाद  आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब ये बात सिंधु सभ्यता के स्क्रिप्ट की तरह इतनी पुरानी भी नहीं कि लोग न जानते हों। संजय गांधी की मौत विमान दुर्घटना में 1980 में हुई और राजीव गांधी 81 में ही कांग्रेस महासचिव बन गए। वे उसी साल फरवरी 1981 में अमेठी से लोकसभा के सदस्य चुन लिए गए। लेकिन कांग्रेस की साईट कहती है कि राजीव गांधी सन् 1983 में अपने भाई संजय गांधी की दुखद मृत्यु के बाद सक्रिय राजनीति में आए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात साईट बताती है वो ये कि उसके अतीत के अध्यक्षों में जवाहरलाल नेहरु नामका कोई व्यक्ति कभी अध्यक्ष नहीं हुआ। साईट में आप हिस्ट्री वाले लिंक पर जाएं फिर उसमें से उसके पूर्व अध्यक्षों का लिंक क्लिक करे तो डॉ मुख्तार अंसारी(1927) के बाद सीधे ये &lt;a style="color: rgb(255, 0, 0);" href="http://www.aicc.org.in/new/past-president.php"&gt;साईट&lt;/a&gt; बल्लभभाई पटेल(1931) पर आ जाती है, वो जवाहरलाल नेहरु को भूल जाती है जिन्होने लगातार 1929 और 30 में पार्टी की अध्यक्षता की थी। जिन्होने अपने पिता से अध्यक्षता का चार्ज लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साईट में चूंकि पहले ही मोतीलाल नेहरु का जिक्र कर दिया गया है तो ये बात फिर भी क्षम्य है कि उनकी 1928 की अध्यक्षता का जिक्र नहीं है। लेकिन जिस जवाहरलाल नेहरु को अपनी अध्यक्षता के दरम्यान लाहौर अधिवेशन में तिरंगा फहराने और पूर्ण स्वराज्य की घोषणा करने का श्रेय जाता है-पार्टी उन्हे ही भूल गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं, कांग्रेस की ऑफिसियल साईट में इस आपराधिक लापरवाही से आम जनता के स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता लेकिन देश पर हुकूमत करने वाली पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल जरुर उठता है। सवाल ये भी उठता है कि एक माध्यम के रुप में पार्टी इंटरनेट को कितने हल्के रुप में लेती है। ये उस पार्टी की वेबसाईट है जो हिंदुस्तान में कंम्प्यूटर क्रान्ति लाने का दंभ भरती है-लेकिन अपने उसी नेता के बारे में तथ्यात्मक गलतबयानी करती है जो इसका सूत्रधार माना जाता है। दूसरी बात ये कि जिस नेहरुजी को देश और दुनिया का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक विचारों का पोषक मानता है उन्ही के खानदान द्वारा संचालित पार्टी एक आधुनिक प्रचार माध्यम पर अपने पितृपुरुष को भूल जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं, एक विचार ये भी है कि हमारे राजनेता या कई दूसरे पेशे के लोग भी पढ़ाई-लिखाई या भाषाई-तथ्यात्मक शुद्धता को बेवकूफों का शगल समझते हैं। शायद राहुल गांधी या खुद कांग्रेस अध्यक्ष भी कभी अपना वेबसाईट नहीं देखते। या हो सकता है कि कांग्रेस के किसी घनघोर उदारवादी (रिफॉर्मिस्ट?) मैनेजर ने ये काम किसी एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया हो जिसे इस बात से कोई मतलब नहीं कि नेहरुजी नामका जीव भी इस धरा पर कभी अवतरित हुआ था। क्या फर्क पड़ता है कि राजीव गांधी ‘83 मे राजनीति में आए थे या ‘81 में? क्या फर्क पड़ता है कि साईट में कुछ गलतियां दिख रही हैं...जनता तो वोट देकर फिर भी चुन ही रही है न!  आमीन!&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-6997858033630088818?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/6997858033630088818/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=6997858033630088818' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6997858033630088818'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/6997858033630088818'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/12/blog-post_28.html' title='सबा सौ साल की कांग्रेस के जश्‍न में वेबसाइट का खलल'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3019645114917654144</id><published>2009-12-11T23:47:00.001-08:00</published><updated>2009-12-11T23:49:20.409-08:00</updated><title type='text'>तेलंगाना के बहाने.....</title><content type='html'>तेलंगाना की केंद्र द्वारा एक तरह से स्वीकृति ने छोटे राज्यों के पैरोकारों में एक नया उत्साह भरा है। पूरे देश से इस तरह की मांग उठ रही हैं जिनमें से कई तो बहुत पुरानी है या फिर जिनका कुछ आधार भी बनता है। लेकिन कुछ लोगों द्वारा इसका विरोध इस अंदाज में किया जाता है मानो छोटे भौगोलिक-सांस्कृतिक या क्षेत्रीय अभिव्यक्तियों को बोलने का हक ही नहीं है। ये विरोध कई बार सामंती अंदाज ले लेता है मानो वे शासक हों और मांग करनेवाला शासित। बहरहाल, मीडिया के कुछ लालबुझक्कड़ इस चिंता में दुबले होते जा रहे हैं कि देश का क्या होगा या फिर कौन सा शहर किस राज्य की राजधानी बनेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे लचर तर्क ये दिया जा रहा है कि खर्चे बढ़ जाएंगे और भ्रष्टाचार की गंगोत्री खुल जाएगी जब ये छोटे राज्य राजनीतिक अस्थिरता के शिकार होंगे। ये मानकर चला जाता है कि स्थिर सरकार भ्रष्ट नहीं होती और वहां सबकुछ ठीकठाक होता है या फिर बड़े राज्य हमेशा से स्थिर होते हैं या फिर उनके नेता बड़े ही पवित्र। यहां पिछले दो दशकों से यूपी जैसे बड़े राज्यों की अस्थिरता आंखें खोलने वाली है जहां पिछले पचास साल से स्थिर सरकार होने के बावजूद हरियाणा, केरल या गोवा जैसा विकास सपना ही है। कहने को तो बिहार, बंगाल में भी पिछले सालों दो दशकीय या फिर तीन दशकीय महा-स्थिरता रही है लेकिन विकास के मामले में ये फिसड्डी ही रहे। दूसरी तरफ हरियाणा, गोवा, मिजोरम जैसे राज्य आयाराम-गयाराम के नायाब उदाहरण हैं लेकिन वहां के लोग एक यूपी या बिहार जैसे तथाकथित बड़े रुप से महान राज्यों को लोगों को अपने यहां कर्मचारी तो रख ही सकते हैं। यूं, यहां जापान या इटली का उदाहरण देना ठीक नहीं होगा लेकिन सनद के लिए कहा जा सकता है कि पिछले 50 सालों में वहां तकरीबन 50 सरकारें आईं और गईं लेकिन वहां के विकास पर कोई फर्क नहीं पड़ा। तो कुल मिलाकर मामला बड़ा होने या स्थिर होने का नहीं विकास करने की मानसिकता और विकास के हालात होने का है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेताओं ने अपने-अपने हिसाब से स्टैंड लिया है। बीजेपी का एजेंडा संघ का है जो छोटे राज्यों को केंद्र की मजबूती मानती है। कांग्रेस का कोई एजेंडा नहीं-हालात इसका एजेंडा है, यूं इसे छोटे राज्यों से परहेज नहीं है। बड़ी पार्टी है, आराम से दुकानदारी चलाती रह सकती है। क्षेत्रीय पार्टीयां सहूलियत के हिसाब से रुख अपनाती है-लालू को तेलंगाना से कोई परहेज नहीं-उनका क्या जाता है-जबकि यहीं लालू झारखंड बनते वक्त अपने लाश पर झारखंड बनाने की बात करते थे। माया ने बुंदेलखंड का एजेंडा राहुल गांधी की गोदी में डाल दी है कि देते रहो पैकेज-अब राज्य मांग रही हूं। दूसरी तरफ ये कि उसे लगता है कि बुंदेलखंड और हरितप्रदेश में दलितों का अनुपात अच्छा है तो क्या बुराई है। मारे जाएंगे मुलायम जो फिरोजाबाद और कन्नौज के नेता बनकर रह जाएंगे-वहां से भी उनकी जमीन खिसक रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं ऐसा हमेशा नहीं होता कि छोटे राज्य विकसित ही हो जाएं लेकिन वे बड़े राज्यों से बेहतर तो हैं ही। कुलमिलाकर बड़े राज्य नेताओं-ब्यूरोक्रेटों को बड़ा संसाधन हड़पने का मौका देते हैं जबकि छोटे राज्यों में छोटा संसाधन और जनता की पैनी नजर का खतरा होता है। यहां झारखंड का उदाहरण देकर विषयांतर किया जा सकता है लेकिन यहां तो हरेक तर्क के दर्जन भर से ज्यादा प्रति तर्क दिए जा सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो कुल मिलाकर मामला इन टुच्चे स्वार्थो के बीच न फंसे इसके लिए फिर से राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन करना जरुरी हो गया है। जो उचित मांगों पर एक खास समय सीमा में अपनी रिपोर्ट दे और देश में एक बार में दो-चार या पांच राज्य बनाए जाएं। राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हर 50 साल पर किया जाए और बेहतर प्रशासन, क्षेत्रीय अभिव्यक्ति और देश की मजबूती के लिए नए राज्यों को बनाने की प्रक्रिया शुरु हो। नए राज्य देश से अलग इकाई नहीं होने जा रहे जैसा कुछ टीवी एंकरों की जुबान से भयानक रुप से ध्वनित होता लगता है-ये देश को ही मजबूती प्रदान करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3019645114917654144?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3019645114917654144/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3019645114917654144' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3019645114917654144'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3019645114917654144'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='तेलंगाना के बहाने.....'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2965855778625351030</id><published>2009-11-22T05:59:00.000-08:00</published><updated>2009-11-22T06:07:17.817-08:00</updated><title type='text'>मंहगाई पर बोलना गुनाह है।</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5406929076568005970" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 226px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SwlFWRaRHVI/AAAAAAAAATY/yh9BUAWq5ls/s320/123.bmp" border="0" /&gt;सीएनबीसी के सैकड़ों पत्रकार सड़क पर आ गए, लेकिन कोई चूं तक नहीं बोला। बोलना भी नहीं चाहिए, क्योंकि लाखों लोग हर रोज जब नौकरी से निकाल दिए जाते हैं तब तो कोई नहीं बोलता-भला सीएनबीसी के लोगों में कौन से सुरखाब के पर लगे थे। यूं हमारी मीडिया कभी-कभी दूसरे समूहों में हो रही छंटनी पर खबरें दिखा या छाप देती हैं लेकिन वो खबर तभी बन पाती है जब उससे बड़े खातेपीते और बड़बोले तबको का हित प्रभावित होता हो। जेट एयरवेज की छंटनी को याद कीजिए वो इसलिए खबर बन पाई थी क्योंकि नेताओं, कारोबारियों और अपार्टमेंट-कोठियों में रहनेवालों की फ्लाईट छूट रही थी और मीटिंग्स कैंसिल होनेवाली थी जिससे इस ‘देश’ का बहुत बड़ा नु्कसान होता। अब मान लीजिए की डीटीसी बसों के कर्मचारियों की छंटनी हो जाए तो भला क्यों दिखाएगी मीडिया?  हां, ये कर्मचारी हड़ताल कर दें तो बात अलग है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;तो फिर इस देश में बोलेगा कौन? जब सबने बोलना ही बंद कर दिया है तो फिर बोलेगा कौन? आपको नहीं लगता कि ये स्पेस कोई और हड़प सकता है जो बोलने से आगे जाकर बंदूक की भाषा भी बोल सकता है। चलिए इसे भी यूटोपिया मान लेते हैं, आखिर हमारी लाखों की सेना और पूरा तंत्र उन्हे कुचल करने के लिए काफी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर, देखने में आया है कि लोगों की नौकरी और महंगाई पर बोलने के लिए कोई नहीं बचा। नेताओं की जुबान को लकवा मार गया है। यह देश पक्ष-विपक्ष विहीन देश हो गया है जहां दलालों, माफियाओं, सेटरों और फिक्सरों का बोलवाला है। इधर चीनी की कीमत 40 पार गई तो मैंने आजतक किसी भी माननीय का बाईट नहीं सुना। दूसरी तरफ किसानों का दिल्ली में जिस दिन आन्दोलन हो रहा था उस दिन ऐसे-ऐसे लोगों का बाईट टीवी पर देख रहा था जो कारपोरेट सेक्टर के दलाल हैं। इन्हे कुछ दिनो तक लाईजनर कहते थे लेकिन आजकल कंसलटेंट कहा जाने लगा है। यहां मकसद किसानों के आन्दोलन की आलोचना नहीं है लेकिन उसमें घुसे नेताओं की नीयत जरुर संदेहों के घरे में है। ये लोग वहां इसलिए थे कि वहां हजारों की भीड़ थी। आजतक इनमें से किसी भी नेता को हमने अलग से चीनी के मुद्दे पर नहीं सुना, और न ही इन्होने कभी महंगाई पर बोला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिताजी से कल फोन पर बात हो रही थी। उन्होने कहा कि अभी अगर कोई मंहगाई के मुद्दे पर संसद में किसी मंत्री को कुर्सी फेंककर मार डाले तो वो बड़ा नेता बन सकता है। मंहगाई के मुद्दे पर किसी विमान का अपहरण कर भी सुर्खी बटोरी जा सकती है। इस 120 करोड़े के देश में लोग तो हाड़तोड़ मेहनत करते हैं लेकिन उससे उपजने वाला पैसा कहां जाता है कि ये नहीं मालूम। वो पैसा हमें न तो स्कूलों में दिखता है न ही सड़कों पर। बस लोग धकियाए जा रहे हैं, पीटे जा रहे हैं और उनकी कटोरियों से दाल और कपों से चाय कम होती जा रही हैं। फिर इस सिस्टम का मतलब क्या है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मेहरबानों...कदरदानों ज्यादा मुद्दों और जनहितों की बात करोगे तो लेफ्टिस्ट करार कर दिए जाओगे, सरकार आतंकवादी करार दे सकती है और तुम्हारे दोस्त तुम्हे पागल। वे तुम्हे अपनी पार्टी में बुलाने से मना कर सकते हैं, तुम्हारा फोन अटेंड करना बंद कर सकते हैं सबसे बड़ी बात तो ये कि आप एक लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां हाल ही में जनता ने एक स्थिर सरकार के लिए वोट किया है। फिर क्या फर्क पड़ता है कि चीनी 40 पार गई है !&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SwlEGDWLYfI/AAAAAAAAATI/kykgxFRgqx0/s1600/123.bmp"&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2965855778625351030?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2965855778625351030/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2965855778625351030' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2965855778625351030'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2965855778625351030'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/11/blog-post_22.html' title='मंहगाई पर बोलना गुनाह है।'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SwlFWRaRHVI/AAAAAAAAATY/yh9BUAWq5ls/s72-c/123.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2672427043156285059</id><published>2009-11-15T21:44:00.001-08:00</published><updated>2009-11-15T21:44:49.963-08:00</updated><title type='text'>हिंदी को गाय और ब्राह्मण की तरह पवित्र मत बनाईये</title><content type='html'>मेरे एक वरिष्ट फिरोज नकबी का मानना है कि देश में हिदी की दुर्दशा तभी से शुरु हुई जब आजादी के बाद इसे पवित्रतावादियों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। महात्मा गांधी चाहते थे कि देश में हिंदुस्तानी का विकास हो जिसमें लिपि तो देवनागरी हो लेकिन उसमें उर्दू और दूसरी भाषाओं के शब्द भी लिए जाएं। कुछ लोगों ने ये भी कहा कि हिंदी को देवनागरी और फारसी दोनों ही लिपिय़ों में लिखने की आजादी दी जाए। लेकिन कुछ अति पवित्रतावादियों के चक्कर में हिंदी को वो स्वरुप नहीं मिल पाया। इसमें हिंदी भाषा के कट्टरपंथी भी थे और उर्दू के भी। हिंदी वाले अपनी संस्कृतनिष्ट पहचान के लिए मरे जा रहे थे जबकि उर्दू वालों को लग रहा था कि उनकी भाषा ही खत्म हो जाएगी। पवित्रतावादियों को ये ख्याल नहीं था कि जब भाषा ही नहीं बच पाएगी तो उसका विकास कहां से होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाहाबाद में उस जमाने में इस उद्येश्य से एक हिंदुस्तानी अकादमी की भी स्थापना की गई जिसमें अपने जमाने के जानेमाने विद्वान प्रोफेसर जामिन अली और डा अमरनाथ झा का अहम योगदान था। इस संस्था को महात्मा गांधी का भी आशीर्वाद मिला हुआ था। लेकिन हिंदुस्तानी अकादमी अकेली क्या करती। वो भाषाई कट्टरपंथियों के सामने टिक नहीं पाई। आज हालत ये है कि हिंदुस्तानी अकादमी के साईट पर जाएं तो वहां भी संस्कृतनिष्ठ हिंदी का ही बोलवाला दिखता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज अगर हिंदुस्तानी भाषा का वो प्रयोग कामयाब हो गया होता तो देश में हिंदी एक बड़े क्षेत्र की भाषा बन चुकी होती। 2001 की जनगणना के मुताबिक जो हिंदी महज 45 लोगो की जुबान है वो अपने साथ मराठी, गुजराती, बंगाली, उडिया और असमी को भी जोड़ सकती थी और वो तकरीबन 70 फीसदी लोगों की भाषा होती। इसका इतना बड़ा साईकोलिजकल इम्पैक्ट होता कि हिंदी-विरोधी आंदोलन की इस देश में कल्पना नहीं की जा सकती थी। गौरतलब है कि मराठी की अपनी लिपि नहीं है और वो देवनागरी में ही लिखी जाती है। इसके अलावा गुजराती भी देवनागरी से मिलती जुलती है। पंजाबी, बंगला, उडिया और असमी के इतने शब्द हिंदी से मिलते जुलते हैं कि उन्हे आसानी से हिंदी का दर्जा दिया जा सकता था-बशर्ते हम लचीला रुख अपनाते। (ये ऐसे ही होता जैसे अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा आदि हिंदी की क्षेत्रीय भाषा या बोलियां बनकर रह रही हैं-ये अलग विमर्श है कि खड़ी हिंदी के विकास ने उन भाषाओं पर क्या असर डाला है!) लेकिन अफसोस, पवित्रतावादियों ने सब गुर-गोबर कर दिया। जो हिंदी वास्तविक संपर्क की भाषा बन सकती थी वो सिर्फ आमलोगों के संपर्क की भाषा बनी-बड़े लोग, सत्ताधीश और कारोबारियों ने अंग्रेजी अपना लिया। हिंदी और गौर-हिंदी के चक्कर में अंग्रेजी दबे पांव आ गई और इसने सबको खत्म कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूं, ऐसा जनता के स्तर पर नहीं हुआ। आम जनता हिंदुस्तानी ही बोलती रही लेकिन ये सिस्टम उसे संस्कृतनिष्ठ हिंदी सिखाने पर अमादा थी और अभी भी है। आप सरकारी विज्ञप्तियों को ध्यान से पढ़ें तो आप माथा पीट लेंगे-शायद हजारी प्रसाद द्विवेदी भी जिंदा होते तो न पढ़ पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भला हो टीवी, सिनेमा और मीडिया का जिसने आम आदमी के बीच हिंदुस्तानी का प्रचार किया। औसत हिंदुस्तानी को इस भाषा से कोई परहेज नहीं लेकिन हमारे सरकारी कूढ़मगजों के दिमाग में कौन ये बात घुसाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात ये कि आज भले ही हिंदी अपने तरीके से अपना बिस्तार और विकास कर रही है लेकिन तथाकथित हिंदीवादियों और राज ठाकरे में उस स्तर पर अभी भी कोई फर्क नहीं है। हिंदीवादियों ने कभी भी हिंदी में कायदे के अनुवाद की कोशिश नहीं की। जो लोग हिंदी की मर्सिया गाते फिरते हैं उनसे कोई पूछे कि उन्होने विज्ञान, प्रबंधन और मेडीसीन के कितने पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया है। आज हालत ये है कि हिंदी में ढ़ंग की किताबे उपलब्ध नहीं है जो रोजगार में सहायक हो। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? हमारी सरकार, भाषावादी या फिर ये बाजार?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाजार को दोष देना बेवकूफी है। बाजार ने कभी भाषा का विरोध नहीं किया। बल्कि उसने माल बेचने के लिए हमेशा उसका उपयोग ही किया है। आज हिंदी सीखने के लिए अगर दूसरे प्रदेशों के लोगों में भी इच्छा जगी है तो इसके पीछे भी बाजार ही है। आज कारपोरेट बोर्ड रुम में भी हिंदी घुस गई है तो जाहिर है इसके पीछे बाजार है। मूल गलती हिंदी-वादियों की जो हिंदी को गाय, गंगा और ब्राह्मण की तरह पवित्र बनाए रखना चाहते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2672427043156285059?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2672427043156285059/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2672427043156285059' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2672427043156285059'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2672427043156285059'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/11/blog-post_15.html' title='हिंदी को गाय और ब्राह्मण की तरह पवित्र मत बनाईये'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-8830536602418760906</id><published>2009-11-11T04:56:00.000-08:00</published><updated>2009-11-11T04:59:30.310-08:00</updated><title type='text'>मायावती को खुश नहीं होना चाहिए</title><content type='html'>उपचुनाव के नतीजों की व्याख्या खंगालने बैठा तो नेट पर खास हाथ नहीं लगा। इधर टीवी वाले तो ऐसे ही हैं। हर जगह सिर्फ हेडलाईन बनाने की होड़ थी कि बब्बर को शेर कैसे लिखा जाए और कांग्रेस का ‘राज’ अच्छा लगेगा या हाथी की चिंघाड़। बहरहाल इन सबसे उलट ये कहीं नहीं मिल पा रहा था किस पार्टी को कितने फीसदी वोट मिले या किसने किसका वोट खाया और पहले किसको कितना मिला था। मेहनत का काम है, तुरत-फुरत तो हो भी नहीं सकता। दिमाग खपाना पड़ता है और वो भी अगर कनिष्ठ किस्म के गैरराजनीतिक मिजाज वाले स्टाफ को कहा जाए तो स्टोरी की मां-बहन एक हो जाए। लखटकिया सैलरी लेनेवाले हुक्मरान कहते हैं कि राजनीति बिकती नहीं-कौन माथापच्ची करे।(ये अलग विमर्श हो सकता है कि माथा बचा भी है या नहीं) दूसरी तरफ राजनीतिक खबरों का मतलब हमारे यहां राज ठाकरे, अमर सिंह टाईप के नेताओं की बाईट या फिर कैची हेडलाईन लगाना हो गया है। खासकर टेलिविजन चैनलों में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर हमारे एक मित्र ने कहा कि अमां यार सारी खबर ये टीवी वाले दे देंगे तो पत्रिकाएं कैसे चलेंगी। ये तो उनका काम है कि आराम से विश्लेषण करती रहें। फ्रंटलाईन या इस तरह की पत्रिकाओं का काम है यह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, यूपी उपचुनाव के नतीजे बताते हैं कि विधानसभा में माया सबपर भारी पड़ी। उधर उसने फिरोजाबाद में अपने उम्मीदवार को ढ़ीला कर दिया और राज बब्बर जीत गए। कांग्रेस खुश है। शायद माया ने सोचा होगा कि पहले सपा को निपटाना जरुरी है। जनता में मैसेज यहीं गया है कि सपा साफ हो रही है। कांग्रेस का साईकोलिजकल ग्राफ बढ़ा है। लेकिन ये भी महज खुशखबरी ही है। कांग्रेस अपने कद्दावर नेताओं का सीट हार गई। पंडरौना में विधायक से सांसद बने आरपीएन सिंह की मां तीसरे नंबर पर रही, तो उधर झांसी में राहुल के प्रदीप जैन अपना उम्मीदवार नहीं जितवा पाए। इसका क्या मतलब लगाया जाए? हां, कांग्रेस को थोड़ी तसल्ली इस बात से मिली की उसने लखनऊ पश्चिमी सीट बीजेपी से छीन ली जो वो पिछले तकरीबन 20 साल से दबाए बैठी थी। भला हो टंडन के कोप का कि बीजेपी उम्मीदवार खेत रहे-टंडन अपने दुलारे के लिए टिकट जो चाहते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ जानकार कहते हैं कि भले ही माया ने सपा को निपटा दिया हो लेकिन इसका खामियाजा उसे अगले विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है। अब लोगों के दिमाग में साईकोलोजिकली कांग्रेस नंबर-2 हो गई है। अगर कांग्रेस इस रफ्तार को बरकरार रखती है तो अब माया विरोधी मतों का ध्रुबीकरण कांग्रेस के इर्द-गिर्द होगा। मुसलमान वैसे ही मूड बना चुका है, अब पंडितों में भगदड़ मचेगी। फिर तो कांग्रेस मजबूत होगी ही, बीएसपी का ग्राफ नीचे आएगा-क्योंकि ये संवर्णों का वोट ही था जिसने बीएसपी को 24 फीसदी से उछाल कर 33-34 फीसदी कर दिया था। गौर करने लायक बात ये है कि मुलायम का आधार व्यापक है। मुलायम और कल्याण मिलकर पिछड़ों की एकमात्र पार्टी है। ऐसे में ये हो सकता है कि लड़ाई सिमटकर कांग्रेस-सपा में हो जाए और बहनजी तीसरे नंबर पर पहुंच जाएं। ये बिल्कुल हो सकता है कि बसपा कांशीराम के जमाने में चली जाए। आमीन।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-8830536602418760906?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/8830536602418760906/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=8830536602418760906' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8830536602418760906'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8830536602418760906'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='मायावती को खुश नहीं होना चाहिए'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-8368395154527036100</id><published>2009-10-27T06:54:00.000-07:00</published><updated>2009-10-27T06:57:41.959-07:00</updated><title type='text'>अंग्रेजी शिक्षा और दलित</title><content type='html'>संजीव एड एजेंसी में काम करता है। बोल रहा है कि उसका सीईओ भी कभी-कभी हिंदी बोल लेता है या अक्सर हिंग्लिश बोल रहा होता है।  उस दिन रतन टाटा भी नैनो मसले पर पीसी में बोल रहे थे। लेकिन कैसे बोल रहे थे? वे अटक-अटक कर बोल रहे थे। सुना कि फिल्म जगत में अधिकांश नए कलाकारों को देवनागरी में स्क्रिप्ट पढ़ने में दिक्कत होती है, उन्हे रोमन अंग्रेजी में लिखकर दिया जाता है। शुरु में ये बाते बचकानी लगती थी, लगता था कि कोई मजाक तो नहीं रहा। लेकिन दिल्ली आने के बाद लगा कि नहीं ये हकीकत है। मेरे कई दोस्तों ने कहा कि यार हिंदी पढ़ने में दिक्कत होती है। माफ कीजिए वे उत्तरभारत के ही थे। इधर रवीशजी ने पोस्ट लिखा कि चंद्रभान प्रसाद अंग्रेजी देवी की मूर्ति लगवा रहे हैं ताकि दलित भी अंग्रेजी में पढ़कर ऊंची जगह जाए। मुझे तकनीकी तौर पर इसमें कोई दिक्कत नजर नहीं आती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने मोहल्लालाईव(&lt;a href="mailto:mohallalive.com/2009/10/27/sushant-jha-writeup-on-hindi-english-debate/"&gt;mailto:mohallalive.com/2009/10/27/sushant-jha-writeup-on-hindi-english-debate/&lt;/a&gt;) पर एक लंबा सा पोस्ट लिखा जिसमें कई लोगों को मेरे हिंदी विरोध या इसके प्रति हिकारत की गंध नजह आई। लेकिन सवाल ये है कि क्या अंग्रेजी की तारीफ हिंदी विरोध है ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी इस देश में क्यों नहीं रोजगार, कामकाज और रिसर्च की भाषा बन पाई और क्यो वह एक संपर्क की भाषा बनकर रह गई-ये अलग विमर्श हैं। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि हिंदी प्रेम दिखाने के लिए उसे सीने में चिपकाए रखा जाए, बस, आटो, बेडरुम और वाथरुम में भी विलाप किया जाए। भाषा की चिंता और उसके लिए उपाय खोजना अलग चीज है, मौजूदा दौर में व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाना अलग चीज है। हिंदी के एक बड़े पैरोकार डा राम मनोहर लोहिया तो अंग्रेजी के बड़े विद्वान थे, उन्हे जर्मन भी उतनी ही आती थी-लेकिन सिर्फ हिंदी प्रेम की वजह से उन्होने अपने आपको हिंदी तक सीमित नहीं रखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी को अगर वाकई रोजगार से जोड़ना है तो जो चीजें व्यावहारिक हैं उन्हे अमल में लाना होगा। हमारे देश में कितने हिंदी प्रेमी हैं जिन्होने तकनीक, प्रबंधन, प्रशासन के किताबों का हिंदी में अनुवाद किया है या मौलिक रुप से लिखा ही है? सिर्फ मन से हीन भावना हटा लेने और भाषा-संस्कृति की दुहाई देने से हिंदी कैसे अंग्रेजी के समकक्ष आ सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग चीन, कोरिया और जापान का उदाहरण देते हैं उन्हे भारत और उन देशों के हालातों को समझना होगा। उन देशों की राष्ट्रीयता का एक बड़ा आधार वहां की भाषा है जो वहुसंख्य जनता बोलती और लिखती है। क्या हिंदी के साथ ऐसी स्थिति थी या है? मौजूदा हिंदी तो सिर्फ हिंदी पट्टी में ही पिछले डेढ-दो सौ सालों में अपने असितित्व में आई है, पूरे देश की बात तो अलग है। आजादी के बाद हिंदी इस देश की संपर्क भाषा बन सकती थी लेकिन उसके लिए तत्कालीन हालात अनुकूल नहीं थे। ऐसे में वो जगह अंग्रेजी ने ले ली। अब अगर अंग्रेजी में सारे कारोबार, रिसर्च और प्रशासन का काम हो रहा है तो ये बिल्कुल उचित है कि उसके पढ़ाई की समुचित व्यवस्था की जाए। ऐसा नहीं हो सकता कि देश का एक वर्ग अंग्रेजी पढ़कर अच्छी-2 नौकरी करता रहे और दूसरा वर्ग मातृभाषा पढ़ते हुए ही जिंदगी गुजार दे। अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त करना हर देशवासी, खासकर गरीबों का मौलिक अधिकार होना चाहिए। चंद्रभान प्रसाद इस मायने में सही हैं कि दलितों को अंग्रेजी पढ़नी ही चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-8368395154527036100?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/8368395154527036100/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=8368395154527036100' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8368395154527036100'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8368395154527036100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='अंग्रेजी शिक्षा और दलित'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-2571614822177757414</id><published>2009-09-24T08:27:00.000-07:00</published><updated>2009-09-24T08:28:00.071-07:00</updated><title type='text'>दून-लंदन में पढ़ा शख्स कोबाद गांधी भी हो सकता है, राहुल गांधी ही नहीं...</title><content type='html'>टीवी पर कोबाद गांधी की खबर आ रही थी। आफिस में साथ करनेवाले एक मेरे मित्र ने उसे धोखे से राहुल गांधी समझ लिया। वजह ? वजह ये कि वो गांधी भी दून और लंदन में पढ़ा था। मतलब ये कि अधिकांश लोग यहीं सोचते हैं कि एक नक्सली दून और लंदन में कैसे पढ़ सकता है ?  उसे तो फटेहाल या दीनहीन होना चाहिए। पेट की भूख ही किसी को नक्सली बना सकती है ! क्या वाकई ऐसा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वदीपक मेरे मित्र है, एक टीवी चैनल में काम करते है। हमारी सप्ताहिक मुलाकातों में अक्सर इस विषय पर गंभीर बतकुट्टौवल होती है कि वाकई नक्सलवाद या अतिवामपंथ का हमारे देश में कोई भविष्य है। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि वामपंथ ही अप्रसांगिक हो गया है। इसकी वजह वे ये गिनाते हैं कि सोबियत ढ़ह गया, चीन बदल गया और अपने यहां बंगाल में उसका किला कमजोर पड़ गया है। तो क्या यहीं वामपंथ की प्रसांगिकता या परिभाषा है। विश्वदीपक कहता है कि अगर नक्सली समस्या पर हम दिल्ली के पाश इलाके के किसी फ्लैट में बहस कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि वो हमारे ड्राईंग रुम में घुस गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तर्क मुझे परेशान कर देता है, लेकिन वाकई इस तर्क में दम है। उसका ये भी कहना है कि वो कौन सी वजहें है जिस वजह से अचानक ग्रामीण विकास मंत्रालय पिछले कुछ सालों में ‘एलीट’ मंत्रालय बन गया है, और राहुल गांधी ‘नरेगा’ की माला जप रहे हैं? इसकी ये वजह नहीं कि देश के संभ्रान्त शासक वर्ग का हृदय परिवर्तन हो गया है, बल्कि इसकी वजह दांतेवाड़ा और लातेहार की गरजती बंदूके हैं जिससे हिंदुस्तान का सत्ताधारी एलीट घवरा गया है। ये नक्सलवाद की पहली विजय है। वो दिल्ली की सत्ता पर भले ही कब्जा न कर सके लेकिन उसके संघर्षों ने लुटियंस जोन में बैठों शासकों को प्रतीकात्मक रुप से ही बदलने को जरुर मजबूर कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ आंकड़ों पर गौर करने की जरुरत है। देश में पिछले 60 साल में साक्षरता बढ़ी है, आमदनी बढ़ी है, लोगों का जीवनस्तर बढ़ा है। ये आंकड़े खुशफहमी पैदा करते हैं। लेकिन सवाल को जरा पटल दीजिए। क्या पिछले साठ साल में सकल निरक्षरों की तादाद में कमी आई है ? क्या गरीबों की सकल तादाद में कमी आई है, भले ही फीसदी में कमी जरुर आ गई हो ?  देश की एक बड़ी आबादी निरक्षर है, गरीबी रेखा से नीचे है और स्तरीय मानकों पर उसके जीवन जीनें की दूर-2 तक अभी कोई संभावना नहीं है। हालत इतनी खराब है कि देश के उद्योगपतियों को सिर्फ जीवनयापन की कीमत पर सस्ते मजदूर मिलते हैं और देश के कई अंबानी दुनिया के रईसों में शुमार हो गए हैं। वे इसलिए अमीर नहीं हुए कि उन्होने किसी इनोवेटिव उत्पाद का आविष्कार किया हो और दुनिया के बाजारों में भर दिया हो। ये नितांत सस्ते श्रम का मायाजाल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी हालत में अगर 70-80 करोड़ लोग एक स्तरहीन जिंदगी जी रहे हैं और गुस्सा, खींझ, बीमारी, कुपोषण और निरक्षरता की हालात में फंसे हैं तो क्या ये हालात नक्सलवादी आंदोलन के लिए उपजाऊ जमीन मुहैया नहीं कराती ? गृहमंत्रालय के आंकड़े बता रहे हैं कि देश के तकरीबन एक चौथाई जिले माओवादियों के असर में है या उनका वहां कुछ प्रभाव है।  ऐसे में अगर प्रधानमंत्री तक बार-बार चिंता जाहिर करते हैं कि माओबादी सबसे बड़ा खतरा है तो वे मजाक नहीं कर रहे होते-उनकी जुबान से एक अज्ञात भय झलकता है। वक्त आ गया है हम इस समस्या को वास्तविकता के स्तर पर झेंले न कि सिर्फ लफ्फाजी करके। अगर हम दून और लंदन में पढ़े हर आदमी को राहुल गांधी समझने की गलती करेंगे तो नक्सली वाकई राजधानी तक आ जाएंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-2571614822177757414?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/2571614822177757414/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=2571614822177757414' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2571614822177757414'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/2571614822177757414'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/09/blog-post_24.html' title='दून-लंदन में पढ़ा शख्स कोबाद गांधी भी हो सकता है, राहुल गांधी ही नहीं...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3661094508300440099</id><published>2009-09-23T04:35:00.000-07:00</published><updated>2009-09-24T06:47:39.880-07:00</updated><title type='text'>कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएं...</title><content type='html'>रायबरेली के फिरोज भाई बड़े दिलदार इंसान हैं। वे गालिब से लेकर माईकेल जेक्सन तक की बात करते हैं। हाल ही में उन्होने एक हिंदी का एक गजल सुनायी। ये गजल इलाहाबाद में रहनेवाले उनके एक मित्र एहतेराम इस्लाम ने लिखी थी जिसे मैं अपने ब्लाग पर बांटने का लोभ नहीं छोड़ पा रहा...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सीनें में धधकती हैं आक्रोष की ज्वालाएं...हम लांघ गए शायद सतोष की सीमाएं..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पग-पग पर प्रतिष्ठित हैं पथभ्रष्ट दुराचारी....इस नक्शे में हम खुद को किस बिन्दु से दर्शाएं....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बांसों का घना जंगल, कुछ काम न आएगा, हां खेल दिखाएंगी कुछ अग्नि शलाकाएं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीरानी बिछा दी है मौसम के बुढ़ापे ने, कुछ गुल न खिला बैठें यौवन की निराशाएं...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तस्वीर दिखानी है भारत की तो दिखला दो, कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएं...&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये गजल कुछ वामपंथी तेवर लिए हुए है, लेकिन मौजूदा दौर में लोगों की छटपटाहट और व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश को बखूबी बयां कर रही है। खासकर तब, जब गरीबों के लिए इंदिरा आवास की कीमत पचीस हजार रुपये आंकी जाती हो और देश के महानगरों में कोठियों की कीमत तीन सौ करोड़ तक पहुंच गई हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3661094508300440099?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3661094508300440099/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3661094508300440099' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3661094508300440099'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3661094508300440099'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/09/blog-post_23.html' title='कुछ तैरती पतवारें, कुछ डूबती नौकाएं...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-7741734940083133378</id><published>2009-09-22T06:01:00.000-07:00</published><updated>2009-09-22T06:09:38.443-07:00</updated><title type='text'>बिहार उपचुनाव के नतीजे और निहितार्थ</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SrjMgAeiyRI/AAAAAAAAAS4/r6AzvuDdUpc/s1600-h/nitish-kumar-bihar-cm_1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5384278204777416978" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 251px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SrjMgAeiyRI/AAAAAAAAAS4/r6AzvuDdUpc/s320/nitish-kumar-bihar-cm_1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बिहार विधानसभा का हालिया उपचुनाव बहुत से लालबुझक्कड़ों के लिए नीतीश कुमार के अवसान का पैगाम लेकर आया। लेकिन लालू के चेहरे पर खुशी का अतिरेक नहीं था। लालू जानते हैं कि नीतीश, डैमेज कंट्रोल में माहिर है। इसलिए उन्होने गंभीरता से बयान दिया, कम से कम उनके चेहरे से यहीं लगा। हाल के दिनो में बिहार की जनता में ये मेसेज गया है कि नीतीश कुमार कुछ अहंकारी टाईप के हो गए है। हलांकि इस संदेश को फैलाने में जितनी विपक्ष की भूमिका नही थी उससे ज्यादा नीतीश के मंत्रियों की थी जिनका कहना था कि मुख्यमंत्री उपलब्ध ही नहीं होते। देखा जाए तो ये आरोप पूरी तरह से गलत भी नहीं है। नीतीश के समर्थकों का कहना है कि मंत्री और पार्टी के विधायक इसलिए नाराज है कि उन्हे मनमानी की छूट नही है। दूसरी तरफ विरोधियों का कहना है कि नीतीश ने सारे अधिकार अपने हाथ में रख लिए हैं। लेकिन जो भी हो अगर चुनाव किसी चीज का आईना है तो ये उपचुनाव ये साबित नहीं कर सकता कि नीतीश का जनाधार ढ़लान पर है क्योंकि हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे बड़ी बात ये कि ये चुनाव पटना की गद्दी के लिए नहीं था। इस चुनाव से मुख्यमंत्री का फैसला होनेवाला नही था। इसलिए स्थानीय स्तर के मुद्दे हावी हो गए और ये चुनाव पंचायत चुनाव सरीखा हो गया। ये बात लालू और पासवान भी जानते हैं कि साल भर बाद होनेवाले विधानसभा चुनाव में उनका मुकाबला एक व्यक्तित्व से कुशल प्रशासक बन गए नीतीश कुमार से होनेवाला है जिसके बरक्श जनता लालू-पासवान के 15 सालों की जुगलबंदी को तौलेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर की पंक्तियां नीतीश कुमार का आनलाईन पीआर लग सकती है लेकिन जमीनी हकीकत यहीं है। नीतीश कुमार ने बिहार के समाजिक ‘ मेल्टिंग पाट’ में कई प्रयोग किये है। अतिपिछड़ों की गोलबंदी नीतीश के पक्ष में है(जिसकी आबादी करीब 38 फीसदी है) जबकि महादलितों के लिए कई योजनाएं बनाकर सरकार ने उन्हे अपने पक्ष में करने का कोशिश की है। लेकिन इसके नतीजे में कई जगहों पर कई मजबूत जातियों की जुगलबंदी और समीकरण पनप गए हैं जिस वजह से पिछले उपचुनाव में उनकी पार्टी को कई जगह पर नुकसान हुआ है। अतिपिछड़ाबाद और अति-महादलितवाद कई लोगों को नाराज भी कर गया है-ये बात नीतीश भी जानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन उससे भी बड़ी बात ये कि जेडी-यू ने राजद के कई नेताओं को टिकट देकर अपने बनते हुए मजबूत वोट बैंक को नाराज कर दिया। श्याम रजक और रमई राम की हार तो यहीं कहानी कह रही है। तीसरी और अहम बात ये कि सरकार की दो समर्थक जातियां-ब्राह्मण और राजपूत- सरकार से नाराज दिखती हैं। ये नाराजगी पिछले लोकसभा चुनाव के वक्त ही शुरु हुई थी-लेकिन अब जाकर आकार लेने लगी है। इसकी ऐतिहासिक-भौगोलिक वजहें भी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीतीश कुमार से सरकारी कर्मचारी नाराज हैं। क्योंकि उन्होने हड़ताल का कड़ाई से सामना किया और काम का दवाब बढ़ गया हैं। भष्टाचार पर थोड़ा सा अंकुश लगा है, मास्टरजी को स्कूल जाना पड़ता है। इसकी वजह सिर्फ नीतीश कुमार नहीं है, केंद्र की तरफ से भी ढ़ेर सीरी योजनाओं के लिए ढ़ेर सारा पैसा आने लगा है-जिस वजह से कर्मचारियों को कम से कम आफिस में तो रहना ही पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सारी तस्वीरे क्या कहती है ? जनता को इन सब चीजों से कोई ऐतराज नहीं। वो उसके घाटे का सौदा नहीं। सामान्य तौर पर सूबे की कानून व्यवस्था ठीक हुई है, सड़के चमकने लगी है और गांवो में बिजली की तार दिखती है। लोगबाग नीतीश की आलोचना नहीं करते। एंटी इन्कम्बेंसी अभी तक नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीतीश, गलतियों को स्वीकार करने और उससे सबक सीखने में माहिर है। बड़ी बात ये कि जनता का बड़ा वर्ग उनके साथ है। ब्रांड नीतीश बहुत दिनों में बना है, वो इतने कम दिनों में खत्म नहीं हो सकता। इसलिए ये मानना कि उपचुनाव के नतीजे बिहार की जनता का लालू-पासवान के लिए मुहब्बत का पैगाम है-जल्दबाजी के सिवा कुछ नहीं। अगला चुनाव भी नीतीश बनाम अन्य ही होगा-जैसा बिहार में इससे पहले का दो चुनाव था। लालू बनाम अन्य तो अभी नहीं दिख रहा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-7741734940083133378?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/7741734940083133378/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=7741734940083133378' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7741734940083133378'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7741734940083133378'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/09/blog-post_22.html' title='बिहार उपचुनाव के नतीजे और निहितार्थ'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SrjMgAeiyRI/AAAAAAAAAS4/r6AzvuDdUpc/s72-c/nitish-kumar-bihar-cm_1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-8596982329155949112</id><published>2009-09-18T00:15:00.000-07:00</published><updated>2009-09-18T00:19:07.957-07:00</updated><title type='text'>मोदी आज सठिया गए...</title><content type='html'>वैसे तो मोदी के कई फैसले पहले से ही इशारा कर रहे थे कि वे सठिया चुके हैं लेकिन आज अखबारों से पता चला कि वे वाकई सठिया गए हैं। वैसे सुना कि जब नेता सठियाता है तो क्रिकेट संस्थानों पर कब्जा कर लेता है। मोदी ये हाल ही में काम कर चुके हैं। लालू और पवार भी सठियाए थे तो उन्होने बिहार और देश स्तर के क्रिकेट संस्थाओं पर कब्जा कर लिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे एक थ्योरी ये भी है कि नेता सठियाता है तो दंगे करवाने लगता है। 90 के दशक में लालकृष्ण आडवाणी सठियाए थे तो बाबरी-अयोध्या दंगा हुआ था। उससे भी पहले सुना कि आजादी से पहले एक बार जिन्ना सठियाए थे तो देश भर में यादगार दंगे हुए थे। उस हिसाब से मोदी बहुत पहले सठिया चुके हैं, वैसे सर्टिफिकेट पर आज सठियाए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुजुर्गों का कहना है कि नेता जब सठिया जाता है तो वो संत किस्म का हो जाता है। सुना कि वो अपने पाप का घड़ा भरकर पूण्य लूटने निकल जाता है। जिन्ना भी पाकिस्तान के जन्म के बाद वहां कि नेशनल एसेंबली में उदारवादी भाषण देते हुए पाए गए। आडवाणी ने जिन्ना के मजार पर पर सजदा किया, लालू ने मांसाहार छोड़ दिया और पवार ने विदेशी मूल की महिला का विरोध करना छोड़ दिया। हो सकता है कि मोदी भी कुछ ऐसा ही करें। वैसे मोदी ने रतन टाटा से आशीर्वचन (नैनो) लेकर संत-त्व तरफ एक कदम बढ़ा ही दिया है। उनका अगला कदम देव-त्व की तरफ होगा जिसके लिए वे अपने वरिष्ठ आडवाणी की तरह बुजुर्ग नहीं होना चाहते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-8596982329155949112?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/8596982329155949112/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=8596982329155949112' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8596982329155949112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8596982329155949112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html' title='मोदी आज सठिया गए...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4672767227990856894</id><published>2009-09-16T22:35:00.000-07:00</published><updated>2009-09-17T01:03:24.092-07:00</updated><title type='text'>एक सनसनी जो बनते-बनते रह गई...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SrHtKBqULAI/AAAAAAAAASw/cEHkTg37P6o/s1600-h/12.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5382343786184846338" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SrHtKBqULAI/AAAAAAAAASw/cEHkTg37P6o/s320/12.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;em&gt;&lt;strong&gt;“लाख अन्यायपूर्ण और अनुचित आलोचनाओं के बावजूद सोनिया गांधी ने जिस गरिमा और गंभीरता के साथ सत्ता की कामना का वलिदान किया वो अपने आप में एक मिसाल है। वो एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिज्ञ हैं जिन्हे ग्रामीण और शहरी संभ्रान्त वर्ग समान रुप से पसंद करता है। हमारे देश में ऐसे बहुत कम लोग हैं जिन्होने महाद्वीपों, सभ्यताओं और भाषाओं के बंधन को इतनी आसानी से पार किया है और जिनको दुनिया गंभीरता से सुनती है। सोनिया गांधी का दिल हमेशा गरीबों, कमजोरों और सुविधाविहीन लोगों की भलाई के लिए धड़कता है”&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;पाठक इन शब्दों को पढ़कर परेशान या गुमराह न हों, न ही इन पंक्तियों के लेखक का कांग्रेसीकरण हो गया है। ये शब्द हैं इनफोसिस के अध्यक्ष नारायण मूर्ति के। अपने पाठकों की याददाश्त के लिए बताते चलें कि ये वहीं नारायण मूर्ति हैं जिनका नाम एक दौर में राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए लंबे समय तक हवा में रहा था। माफ कीजिएगा, जरा हिंदी कठिन लिखी हुई है, क्योंकि ये पीटीआई की खबर का शब्दश: अनुवाद है जो नारायणमूर्ति की पांडित्यपूर्ण अंग्रेजी में दिया गया था। मौका था 15 सितंबर 2009 को मैसूर में इनफोसिस के दूसरे ग्लोबल एजुकेशन सेंटर के उद्धाटन का जो सोनिया गांधी के हाथों संपन्न हुआ था। लेकिन खबर ये नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक उसी दिन मैसूर से तकरीबन 2500 किलोमीटर उत्तर में पंजाब के शहर लुधियाना में सोनिया गांधी के बेटे और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी यूथ कांग्रेस के एक ट्रेंनिंग कैम्प का उद्धाटन करते हैं। इस कैम्प में य़ुवा कांग्रेसियों को चार दिन का ट्रेनिंग दिया जाना है कि तृणमूल जनता(ग्रासरुट मासेज) तक कैसे पहुंचा जाए और कांग्रेस को कैसे सत्ता की स्वभाविक पार्टी बनाए रखा जाए। इस कैम्प को साफ्ट स्किल का ट्रेंनिंग देने के लिए बंगलूरु से एक कंसलटेंसी को बुलाया जाता है जिसका नाम है- इस्टिट्यूट आफ लीडरशिप एंड इस्टिट्यूशनल डेवलपमेंट। इस फर्म के साईट पर जाएं तो पता चलता है कि इसके डाईरेक्टर का नाम है- डा जी के जयराम। डा जयराम इंफोसिस लीडरशिप इस्टिट्ट्यूट के प्रमुख रहे हैं। इस फर्म को एक ट्रस्ट चलाती है जिसकी एक ट्रस्टी है रोहिणी निलकेणी। रोहिणी निलकेणी, नंदन निलकेणी की पत्नी है। अब ये बताना कोई जरुरी नहीं है कि ये वहीं नंदन निलकेणी हैं जिन्हे सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली यूपीए सरकार ने अपने सबसे बड़ी महात्वाकांक्षी परियोजना यूनिक आईडेंटीफिकेशन कार्ड का अध्यक्ष बनाया हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब यहां दो अनुमान तो लगाए ही जा सकते हैं। अगर बीजेपी के धुरंधर, डा कलाम जैसे वैज्ञानिक को राष्ट्रपति बनाकर ‘सेक्युलर’ होने का भी तमगा हासिल कर सकते हैं तो भला कांग्रेस क्यों नहीं डा नारायण मूर्ति को राष्ट्रपति बनाकर अपना आधुनिकतावादी चेहरा दिखा सकती ? बिल्कुल दिखा सकती है, माना कि पिछले बार वाम एक महिला के नाम पर अड़ गया था-अब क्या परेशानी है ? नारायणमूर्ति ने अपने आपको निष्ठावान तो कमसे कम साबित कर ही दिया है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस खबर का मकसद न तो नारायण मूर्ति की पहुंच का मर्सिया पढ़ना है न ही उनकी गरिमा और अहमियत को ठेस पहुंचाना। इस खबर का मकसद सनसनीखेज पत्रकारिता करनेवाले भाई बंधुओं को आईना दिखाना है कि असल सनसनी तो यहां थी जिसमें वे चूक गए। खैर, हमारे देश में लकीर पीटने का भी रिवाज रहा है, सो वो अभी भी इस पर अमल कर सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4672767227990856894?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4672767227990856894/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4672767227990856894' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4672767227990856894'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4672767227990856894'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='एक सनसनी जो बनते-बनते रह गई...'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SrHtKBqULAI/AAAAAAAAASw/cEHkTg37P6o/s72-c/12.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4478091549680117505</id><published>2009-08-28T06:23:00.000-07:00</published><updated>2009-08-28T06:39:53.445-07:00</updated><title type='text'>बीजेपी का सतरंगी झगड़ा...कितना संगीतमय है!</title><content type='html'>आखिरकार मोहन भागवत दिल्ली आ ही गए। आना ही था। सुदर्शन भी पिछली बार चेन्नई में डेरा डाल आए थे जब आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाना था। हां, इतना तय है कि आडवाणी के जाने के बाद बीजेपी के आगामी नेता इतने बौने होंगे कि संघ प्रमुख उन्हे नागपुर से फोन पर ही निपटा देंगे। संघ सुप्रीमों का दिल्ली आना मायने रखता है। मजाल है कि कोई भाजपाई चूं भी बोल सके। सबको टिकट लेना है, पद पाना है जिसपर मुहर नागपुर ही लगाता है। कुल मिलाकर संघ प्रमुख हमारे यहां की एक बड़ी पार्टी-बीजेपी- के खुमैनी हैं जो चुनाव लड़नेवाले उम्मीदवारों को योग्यता का सर्टिफिकेट देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन खेल मजेदार है, टीवी के लायक बिकाऊ भी। उधर जसवंत  को भाजपा ने निकाला तो वाजपेयी के तमाम पुराने ‘खास’ गोलबंद हो गए। नया गोला ब्रजेश मिश्रा और यशवंत सिंहा ने दागा। उनका कहना है कि आडवाणी को ये बात मालूम थी कि आतंकियों को छोड़ा जाना तय हुआ था। ये कैबिनेट का सामूहिक फैसला था। मामाला वैसा ही लग रहा है जैसा राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में आडवाणी पर आरोप लगाते थे। अब निकालते रहो कितने को पार्टी से निकालते हो। बीजेपी आलाकमान शौरी को पार्टी से नहीं निकाल पाया, उधर खंडूरी और वसुंधरा अभी तक आंखे दिखा रहे हैं। पहली नजर में बात तो सही लगती है कि पार्टी की हार के लिए प्यादे ही कैसे जिम्मेवार हैं जबकि लड़ाई तो प्रधानमंत्री बनने की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है वाजपेयी  के तमाम पुराने यार ( या शागिर्द?) एक हो गए हैं। ब्रजेश, जसवंत, खंडूरी ये तो बानगी है। वाजपेयी ने जब जसवंत को मुलाकात का वक्त दिया तभी लग रहा था कि खेल अभी बाकी है।&lt;br /&gt;आडवाणी खेमा के सारे चुप हैं। वे हवा  का रुख देख रहे हैं। क्या बैकय्या, क्या जेटली और क्या अनंतकुमार। सुषमा का पता  नहीं चल पा रहा वो अब किस  खेमे में है। कई लोग खेमाविहीन  होने की जुगत में है। राजनाथ के मन की बात किसी को पता  नहीं- कि वो आडवाणी के आदमी है या असंतुष्टों का। लगते तो आडवाणी के हैं लेकिन संघप्रमुख के सामने जुबान नहीं खुलती-किसी की नहीं खुलती। आडवाणी को बचाने के लिए कहते हैं कि हार का ठीकरा मेरे सिर। लेकिन राजनाथ का कद इनता बड़ा नहीं कि ठीकरा उनके सिर फूटने की हामी भरे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजेपी में कांग्रेस के उलट सब कुछ रहस्य ही रहस्य है। कांग्रेस में ही एक ही पथ है जिसका नाम 10 जनपथ है। बीजेपी में कई पथ हैं। यूं ज्यादातर नागपुर को जाती है लेकिन कुछ सड़कें इधर यू-टर्न मार आडवाणी के घर की तरफ मुड़ जाती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जसवंत की विदाई  से ठीक एक दिन पहले संघप्रमुख  का इंटरव्यू आता है। उधर  चिंतन बैठक है, आडवाणी एंड  कंपनी पर आरोपों की बौछार  होनी है और बीच में जसवंत  सिंह आउट। क्या ये आडवाणी खेमा मुद्दा को डाईवर्ट कर रहा  था जो चिंतन में उठना था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर सयानों का कहना है कि जसवंत की विदाई संघ के इशारे पर हुई है और संकेत आडवाणी को सेफ पैसेज देने की है। मतलब ये तुमने भी तो पिछले के पिछले साल जिन्ना को देवता बताया था। लेकिन उधर फिर एक पेंच हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुदर्शन कहते हैं कि जिन्ना भले मानूस  थे। अब यहीं सुदर्शन, आडवाणी को जिन्ना मसले पर अध्यक्ष पद से हटा चुके थे। लेकिन अब ये कैसा जिन्ना प्रेम? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर जिस दिन  भागवत ने कहा कि एक नहीं दो नहीं 10-15 काबिल नेता हैं  तो जोशी ने हां में हां  मिलाई कि 10-15 ही क्यों 70-75 हैं। एक मतलब ये भी है कि उपर में  जो पूरी टीम बैठी है उसे  ही साफ कर दो। लाओ नीचे से नेता और पुनर्गठन करो। शौरी भी यहीं बोल रहे। तो क्या इस खेमें को संघ की सरपरस्ती हासिल है ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये मानने  का दिल फिर नहीं करता।  क्योंकि जसवंत ने जो बड़ा पाप किया वो ये कि उन्होने  जिन्ना को महान नहीं बताया-बल्कि  सरदार पटेल की आलोचना की।  उस पटेल की जिसे संघ वाले नेहरु के बरक्श अपना मानते आए हैं। तो फिर  होगा क्या? इतना तो तय है कि आडवाणी एंड कंपनी को जाना होगा। संघ को उनका विकल्प नहीं मिल रहा। कोई ऐसा नाम जिस पर एका हो सके और जनता में भी जिसकी स्वीकार्यता ज्यादा हो। जाहिर है, कई डार्क होर्स इंतजार में बैठे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4478091549680117505?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4478091549680117505/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4478091549680117505' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4478091549680117505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4478091549680117505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/08/blog-post_28.html' title='बीजेपी का सतरंगी झगड़ा...कितना संगीतमय है!'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-1493167485714139349</id><published>2009-08-07T07:08:00.000-07:00</published><updated>2009-08-07T07:12:59.610-07:00</updated><title type='text'>हमें आगे कौन पढ़ाएगा सरकार...?</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Snw2TIOus0I/AAAAAAAAAO8/RkL_SXCH4MU/s1600-h/13.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5367224558173467458" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 212px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Snw2TIOus0I/AAAAAAAAAO8/RkL_SXCH4MU/s320/13.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;सुमन कहती है कि फरक्का में वो सब कुछ है जो एक छोटे शहर में होना चाहिए, मसलन अच्छी सड़के, अच्छे स्कूल-डीपीएस भी है-और अच्छे अस्पताल। लेकिन नहीं है तो सिर्फ कोई भी कालेज। मैं भौचक्का हूं। मैं उससे कुछ और जानना चाहता हूं। वो आगे बताती है कि फरक्का में वाटर आथरिटी है, एनटीपीसी है, एनएचपीसी है, भेल है सब है। उसकी टाउनशिप है, गतिशील बाजार है और शान्ति है। लेकिन ऊपर बताया गया सारा कुछ केंद्रीय सरकार का है। मै पूछता हूं कि तो फिर बंगाली भद्रमानूष राईटर्स बिल्डिंग में क्या करते है। सुमन के पास इसका कोई जवाब नहीं है, वो बताती है कि किसी को कालेज की पढ़ाई करनी है तो या तो मालदा जाना होगा या फिर जंगीपुर(प्रणव बाबू का क्षेत्र-हलांकि वहां भी कोई बढ़िया इंतजाम नहीं है) जो 2 घंटे का रास्ता है। सारे संस्थान कलकत्ता में ही सिमट गए। यानी अच्छे नामों और अच्छे शक्ल-सूरतों वाली वामपंथी सरकार ने फरक्का नामके जगह के लिए पिछले 30 सालों में एक कालेज खोलने की कोई जरुरत नहीं समझी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जरुरत बिहार में नीतीश कुमार और उनसे पहले के किसी सरकार ने भी नहीं समझी। शिक्षा पर भले ही लंबी चौड़ी तकरीरें हों और तमाम योजनाओं का पिटारा खोला-दिखाया जाए लेकिन हकीकत यहीं है कि बिहार जैसे प्रान्त में हाईस्कूल कम से कम 5 किलोमीटर के दायरे में है। अगर कालेज की बात की जाए तो नजदीकी कालेज कम से 10 किलोमीटर में एक है जिसमें परंपरागत विषय ही उपलब्ध है। पता नहीं, बिहार सरकार, ईसा के किस सन में इस वैचारिक लकबे से ग्रस्त हुई। वो कौन से महानुभाव थे-उन्हे खोजकर बिहार रत्न की उपाधि देनी चाहिए-जिन्होने 5 किलोमीटर के दायरे में हाईस्कूल खोलने पर पाबंदी लगवा दी। आज हकीकत ये है कि बिहार में लड़कियां-खासकर के ग्रामीण इलाकों की लड़किया किसी तरह घिसट-2 कर हाईस्कूल की शिक्षा प्राप्त करती है। जहां तक कालेज जाने का प्रश्न है तो ज्यादातर ल़डकियों के सपने कालेज की दूरी देखकर ही दम तोड़ जाते हैं। कालेज का एजुकेशन सिर्फ शादी के लिए किया जाता है, ताकि अच्छा दूल्हा मिल सके। इसकी खानापूर्ति प्राईवेट से इक्जाम देकर किया जाता है। पता नहीं, नीतीश कुमार को ये बात मालूम है कि नहीं-कपिल सिब्बल की चिंताओं में तो इतनी दूर की बात आ भी नहीं पाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे नहीं मालूम देश के दूसरे हिस्सों की हालत क्या है। जहां तक यूपी की बात है तो लगता है कि वहां बिहार से ज्यादा शिक्षण संस्थान उपलब्ध हैं-चाहे विश्वविद्यालय हों या फिर हाईस्कूल। जहां तक मैने अनुभव किया है देश के दक्षिणी राज्य बीमारू सूबों से इतर कई दूसरे राज्य भी अपने बच्चों को बेहतर पढ़ा-लिखा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्व शिक्षा अभियान के तहत भारत सरकार बड़े पैमाने पर शिक्षा के लिए धन दे रही है। खासकर प्राईमरी शिक्षा के लिए सरकार ने लाखों पंचायत शिक्षकों को बहाल कराया है। लेकिन हमारे यहां उच्च माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा को भगवान के भरोसे छोड़ दिया गया है। बिहार जैसे सूबों की बात करे तो एक औसत परिवार का बच्चा दसवीं के बाद क्या करेगा-इसका कोई मुकम्मल इंतजाम न तो नीतीश कुमार के पास है न ही कपिल सिब्बल के पास। सरकार एक औसत बच्चे को उसके घर के पास-कम से कम-10 किलोमीटर के दायरे में कालेज देने में नाकाम रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा तरीका ये है कि वो बच्चा 10+2 करने के बाद बंगलोर या पूना चला जाए जहां उसे लगभग 8 लाख रुपये खर्च करने के बाद इंजिनीयरिंग या दूसरी कोई पेशेवर डीग्री मिल जाएगी। ऐसे कितने परिवार है, जो इतना खर्च कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो हम कर क्या रहे हैं। हम लाखों बच्चों को स्कूल से निकाल कर दिल्ली-मुम्बई की सड़कों पर फैक्ट्री, दूकानों और घरों में नौकर बनने के लिए भेज रहे हैं-जहां कोई न कोई राज ठाकरे उसे गाली देने के लिए तैयार बैठा है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-1493167485714139349?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/1493167485714139349/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=1493167485714139349' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/1493167485714139349'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/1493167485714139349'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='हमें आगे कौन पढ़ाएगा सरकार...?'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Snw2TIOus0I/AAAAAAAAAO8/RkL_SXCH4MU/s72-c/13.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-8098035630413434736</id><published>2009-07-16T01:29:00.000-07:00</published><updated>2009-07-31T04:17:19.880-07:00</updated><title type='text'>पोलिटिकल लाईजनर-2</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sl7lGVmtYEI/AAAAAAAAAOc/qitQBZ5sUWo/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5358972503658946626" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 213px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sl7lGVmtYEI/AAAAAAAAAOc/qitQBZ5sUWo/s320/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; एमपी साहेब (पूर्व) टहल रहे हैं। इस महीने कोई लाईजनिंग नहीं हो पाई, कोई पार्टी नहीं फंसा। विवेकजी भी तो आजकल कम आ रहे हैं साउथ एवेन्यू। लगता है सुरेन्दर बाबू के यहां ज्यादा उठते बैठते हैं आजकल। हां, आदमी थोड़ा कमा लेता है तो कम भाव देता है वक्त-वक्त की बात है। लेकिन एक बात है कि विवेकजी पार्टी तुरंत खोज लेते हैं। अब ऊ ससुरा जो लोन लेने आया था 50 करोड़ का विवेकजी ही तो लाए थे। अब पार्टी नहीं लाते कहीं से उ बैंक के जीएम से दोस्ती का अचार डालते। वैसे मांगिए जाकर किसी से 50 हजार रुपये भी...अठन्नी नहीं देगा। रिश्ते को बिजनेस में ढ़ालिए, तभी कुछ निकलता है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एमपी साहेब(पूर्व) को तो ये धंधा ही समझ में नही आता था पहले। दो टर्म तो धंधे की बारीकी समझने में लग गया। और इधर ऐसे-2 लोग हैं जो नेता को झोला लेकर चलते थे और करोड़पति बन गए-ऊ भी दांए बांए से। एमपी साहेब संसद जाते और पिछले बैंक पर उंघते रहते। ऊ कौन तो आया था अमेरिका का राष्ट्रपति बिल क्लिंटन...पार्टी अध्यक्ष ने कहा कि सबको मौजूद रहना है। पीएम ने कहा है कि ज्यादा से ज्यादा मुंडी दिखना चाहिए। ससुरा क्या-2 अंग्रेजी में बोलता रहा, कुछ भी पल्ले नहीं पड़ा एमपी साहेब(पूर्व) को। ऊ तो पार्टी अध्यक्ष ने कहा कि सिर गिनेगें पार्लियामेंट में इसलिए चले गए थे नहीं तो कौन जाता जम्हाई लेने।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अब करें तो करें क्या। ससुरा सांसद निधि तो 2 करोड़ ही है। कितना बचेगा। मान लीजिए 30 फीसदी कमीशन ठेकेदार दे भी दे तो कितना होता है पांच साल में 3 करोड़। फिर दिल्ली में रहना है, स्टेटस है। साला 3-4 लाख का तो मंथली खर्चा है। इससे क्या खाक बचेगा। हां इधर इसका एक तरीका निकाला है। अपने भाई या भतीजे को ही ठेका देते हैं। ज्यादा बचता है। घर का माल घर में। परिवार वाले भी खुश। एक दिन फ्रस्ट्रेड थे-बोले कि हम करेंगे क्या बताईये। साली डाईरेक्ट गवर्नेंस में हमारा कोई रोल है नहीं-महीना में 5 दिन क्षेत्र को देते हैं अब साल भर का करेंगे हम। तो दो टर्म के बाद समझ में आया कि लाईजिनिंग की जा सकती है। इस बीच कई कमेटियों में थे। फाईनेंस कमेटी में थे तभी बैंकर सब से दोस्ती हुई थी। उसी के कमाई पर तो साऊथ एक्स में फ्लैट...खैर छोडिए भी इन बातों को...।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इधर साथ वाले क्षेत्र का एमपी मानव संसाधन में राज्यमंत्री लग गया। एक स्कूल का काम था मध्यप्रदेश में। मिशन का था। विवेकजी ही तो लाए थे। ससुरा एक ही बार में मान गया कि 10 लाख दे देंगे। समझ में ही नहीं आया कितना बड़ा पार्टी है। उससे कम से कम 25 लाख तो दूहा ही जा सकता था। लेकिन एमपी साहेब ने सारा माल गोल कर दिया...विवेकजी को 1 लाख ही दिया। खैर आज के दिन में विवेकजी इतने पर थोड़े मानेंगे। ऊ भी का कहा उन्होने मालूम है...विवेकजी.. का बताएं...सारा पैसा मंत्रिया खा गया...हम का कहते...चलिए पार्टी को जोड़ के रखिए..आगे भी काम देगा&lt;strong&gt;...(जारी)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-8098035630413434736?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/8098035630413434736/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=8098035630413434736' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8098035630413434736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8098035630413434736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/2_16.html' title='पोलिटिकल लाईजनर-2'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sl7lGVmtYEI/AAAAAAAAAOc/qitQBZ5sUWo/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-1465041114572657308</id><published>2009-07-13T07:31:00.000-07:00</published><updated>2009-07-31T04:14:13.278-07:00</updated><title type='text'>पोलिटिकल लाईजनर-1</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SltF7PC4JuI/AAAAAAAAAN0/hJEjij1y05c/s1600-h/chess.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5357953065640535778" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SltF7PC4JuI/AAAAAAAAAN0/hJEjij1y05c/s320/chess.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;वह सियासत के लूडो (बिसात नहीं) का उस्ताद था। लेकिन सांप सीढ़ी के खेल में 99 पर उसे सांप ने डस लिया तो वह 25 पर आ गया। 3 बार सांसद रहने के बाद फिलहाल वो बेरोजगार है। वो लाईजनर बन गया है। वैसे लाईजनर बनने के लिए सांसद होना कोई अनिवार्य योग्यता नहीं है। &lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ये लोकेशन है साउथ एवेन्यू का जहां सांसदों का आवास है। जहां राष्ट्रपति भवन का दक्षिणी गेट दिखता है। आप अगर उधर से गुजरे तो लगेगा कि प्रतिभा ताई अभी आपको बुला लेगी और कहेगी कि बबुआ चाय तो पीते जाओ। तो पूर्व सांसद टर्न्ड लाईजनर ने अभी तक सांसदों वाली कोठी हथिया कर रखा है। हुआ ये कि जनाव जब लोकसभा में थे तो आवास समिति के अध्यक्ष थे। जमकर सांसदों को उपकृत किया था, अब हारने के बाद नया आवास समिति का अध्यक्ष उन्हे उपकृत कर रहा है। उनके नाम वो बंगला एलाट है। &lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;शाम की बैठकी है। यहां सिर्फ पानी के साथ सिर्फ पनीली चाय मिलती है। हारे सांसद के घर ये उम्दा किस्म का स्वागत है। दिन भर महज 200 कप चाय बनती है उसी में सबका गुजारा होता है। आनेवाले सारे लोग लाईजनर ही हैं या भविष्य के लाईजनर है। सारे लोग संभावना तलाशने आते हैं। एक दूसरे को काटने आते हैं। सारे लोग सतर्क हैं, डरे हुए से कि कोई बेजा फायदा न उठा ले जाए। सांसद रह चुके लाईजनर ने कुछ नहीं कमाया है। उसके पास डिफेंस कालोनी में एक 3 करोड़ का फ्लैट है, बिहार में 2 पेट्रोल पंप है और उसने 4 बच्चों को फ्री में इंजिनियरिंग-मेडिकल में दाखिला दिलवाया है। हां, पटना में भी एक कोठी है। कैश है ही नहीं। दिन भर रोता रहता है।&lt;br /&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5357953195718687234" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 222px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SltGCzn7OgI/AAAAAAAAAN8/bdoG6qA7tns/s320/3430834508_12c64a94be.jpg" border="0" /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दूसरा लाईजनर आता है शाम के 6 बजे। सांवला रंग, उम्र 45 साल, झक्क सूट और लंबी गाड़ी। आते ही पहला कहता है-अरे बीरेंद्रबाबू कहां थे, दर्शन भी दुर्लभ हो गया।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरा-&lt;/strong&gt; अरे सर क्या बताएं, भतीजे के एडमिशन में लगा था, इतना महंगा हो गया है कि हमारे जैसे आदमी के बस की बात नहीं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;पहला-&lt;/strong&gt; कहां करवाया..&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरा-&lt;/strong&gt; सर, चेन्नई में एसआरएम में।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पहला-&lt;/strong&gt;वाह...कितना लगा....ऊ तो काफी चार्ज करता है...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरा-&lt;/strong&gt; अरे सर..पैसा तो सुनते हैं कि बहुत लेता है, एक आदमी था..थोड़ा कम लगा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पहला-&lt;/strong&gt; किसको बोले थे...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरा-&lt;/strong&gt; सर... मेरे परिचित है एक मुम्बई में...उसका परिचित है बंगलोर में..उसका दोस्त प्रिन्सिपल का साला है...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पहला-&lt;/strong&gt;ससुरा बड़ा घाघ है...इतना लंबा चेन बना दिया न...कि मेरा बाप भी नहीं पहुंच सकता...साले को मैं रग-2 जानता हूं। है कोई इसके डाइरेक्ट टच का ही...लेकिन मुझे नहीं बताना चाहता। जानता है न कि नाम खुल गया तो शुक्ला 4-5 एडमिशन तो यूं ही करवा लेगा। आखिरकार मानवसंसाधन राज्य मंत्री उसका लंगोटिया जो है। मादर....&amp;amp;^%$&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पहला-&lt;/strong&gt; और बताईये...&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरा-&lt;/strong&gt;सर सब आपकी कृपा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीन खत्म। दूसरा उठता है, और मोबाईल लेकर कैम्पस से बाहर जाने का बहाना करता है। उमेशबाबू जान जाते हैं उसी से बात करनी है। वो भी थोड़ी देर में एमपी(पूर्व) से आज्ञा लेते हैं। दोनों पान की दुकान पर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे उमेशबाबू...ई एमपी साहेब भी है न...साले बड़े पेटू हो गए है। शिकार सूंघते रहते हैं। उनके सामने जुबान खोलना..मतलब पार्टी खो देना। अब बताईये...घोड़ा घास से दोस्ती करेगा क्या&lt;strong&gt;....(जारी)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-1465041114572657308?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/1465041114572657308/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=1465041114572657308' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/1465041114572657308'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/1465041114572657308'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/1.html' title='पोलिटिकल लाईजनर-1'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SltF7PC4JuI/AAAAAAAAAN0/hJEjij1y05c/s72-c/chess.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-4844830868562429141</id><published>2009-07-09T06:42:00.000-07:00</published><updated>2009-07-09T13:34:08.396-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद - अंतिम भाग</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356561281733940354" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlZUGv9c1II/AAAAAAAAAM4/zPuAyFqS8yQ/s320/10062009246.jpg" border="0" /&gt;10 तारीख को हमें इलाहाबाद से वापस आना था, मन कर रहा था कि काश कुछ दिन और रुक पाते। सुबह आठ बजे हमारी ट्रेन थी, गौरव हमें स्टेशन तक छोड़ने आया। हमने आते वक्त वो खूबसूरत केथेड्रल देखा जो स्टेशन के नजदीक ही है। हमने इलाहाबाद हाईकोर्ट भी देखा और उसके सामने फोटो खिचाया। हमें बड़ी मुश्किल से पुलिसवालों से मनुहार कर वहां पर फोटो खिंचाने की इजाजत मिली। वाकई इलाहाबाद हाईकोर्ट की इमारत अद्भुत है, हम उसकी भव्यता का अंदाजा लगाते रहे और सोचते रहे कि क्या वाकई हम उसी इमारत के सामने खड़े है जिसने इंदिरा गांधी की सत्ता को हिला कर रख दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlX0APbrqOI/AAAAAAAAAMo/gzfUCxEzg_c/s1600-h/10062009261.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356455616806889698" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlX0APbrqOI/AAAAAAAAAMo/gzfUCxEzg_c/s320/10062009261.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;डीडी न्यूज में काम कर रहे मेरे दोस्त नितेंद्र सिंह की याद बरबस आ गई जिसने कई बार इलाहाबाद के जगराम चौराहा का जिक्र हमारे सामने किया था। रास्ते में ही जगराम चौराहा दिखा, हमने वहां चाय पी। वो किसी जगराम नामके किसी कारोबारी के नाम पर था, जिनकी पिछली पांच पीढ़ियों से वहां दुकान थी। हमें फोटो खींचते देख दुकान मालिक ने शुरु में पूछताछ की, बाद में उसने हमारा काफी सहयोग किया। नितेंद्र सिंह की जुबान में मिठास अब हमारी समझ में आ गई थी। हम उसके मुंह से सिविल लाईन और जगराम चौराहा का जिक्र इतनी बार सुन चुके थे, जितना हमने कनाट प्लेस के बारे में नहीं सुना था। खैर संगम से आते वक्त ही शाम को हमने सिविल लाईंस भी देखा था। इतना खुला इलाका आजकल बनाना मुश्किल है। पापा ने फोन कर कहा कि वहां के कॉफी हाउस की बात ही कुछ और है, लेकिन वो हम देख नहीं पाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे पास वक्त की कमी थी जिस वजह से हम बहुत कुछ और नहीं देख पाए। हम हरिवंशराय बच्चन का घर नहीं देख पाए जहां अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ था। हम कटरा के पास से गुजरे जरुर लेकिन वहां हम वहां चाय लस्सी नहीं पी पाए-जिस कटरे पर राही मासूम रजा ने कटरा बी आरजू लिखा था। हम युनिवर्सिटी के अंदर बहुत घूम नहीं पाए जो अपने सुनहरे अतीत के लिए मशहूर है। हम उन जगहों पर जाना चाहते थे जहां पर महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, निराला, और बड़े-2 साहित्यकार रहते थे। हम उन इलाकों में घूमना चाहते थे जहां मेरे कई दोस्तों और सीनीयर्स की प्रेम कहांनियां परवान चढ़ी थी।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlX0qKRLmNI/AAAAAAAAAMw/dz7UCUg_euU/s1600-h/S6301947.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356456336975173842" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlX0qKRLmNI/AAAAAAAAAMw/dz7UCUg_euU/s320/S6301947.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इलाहाबाद से मेरे परिवार का थोड़ा व्यक्तिगत नाता भी रहा है। मेरे पापा ने अपने जीवन का अहम हिस्सा यूपी के एक बड़े नेता और वहां के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा के साथ बिताया था। वे उनके राजनीतिक सलाहकार थे। इस नाते मेरे पापा इलाहाबाद और यूपी के चप्पे से परिचित थे। बचपन से जो बातें मैं इलाहाबाद के बारे में सुनता आ रहा था, वो सब सामने थी। शायद ये भी एक वजह हो कि इलाहाबाद यात्रा को मैनें इस स्तर पर जिया था। ये मेरे लिए महज किसी छोटे से शहर की यात्रा भर नहीं थी-ये मेरे लिए मेरे अतीत के साथ मेरा साक्षात्कार भी था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर जब हम ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हुए तो हम भावुक हो गए। इस शहर के साथ हमारा क्या नाता था जिसने हमें बांध कर रख लिया। हम अपने मन को बार-2 तसल्ली देते रहे कि हमें यहां फिर से आना है। राजीव ने तो यहां तक कहा कि हमारी शादी इलाहाबाद में ही होनी चाहिए, ताकि आना-जाना बना रहे। शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि इस शहर का अगर कोई ग्रामदेवता है तो वो कामदेव ही होगा। वाकई हमें इलाहाबाद ने मोह लिया।&lt;strong&gt;...(अंतिम)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-4844830868562429141?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/4844830868562429141/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=4844830868562429141' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4844830868562429141'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/4844830868562429141'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद - अंतिम भाग'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlZUGv9c1II/AAAAAAAAAM4/zPuAyFqS8yQ/s72-c/10062009246.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-7301599710117298749</id><published>2009-07-07T09:46:00.000-07:00</published><updated>2009-07-08T05:47:13.553-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद - 8</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355761190111638898" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN8bSZtdXI/AAAAAAAAAL0/2g3SfIn20v0/s320/09062009226.jpg" border="0" /&gt;आनंदभवन से छूटते ही हमने रिक्शा ली, और चल पड़े संगम की तरफ...उस संगम की तरफ जिसके बारे में बचपन से सुनता आ रहा था। जिस संगम का नाम सुनते ही मेरी दादी की आंखों में चमक आ जाती थी, जिस संगम के बारे में मां ने आते वक्त फोन पर खासतौर पर डुबकी मार लेने को कहा था। रास्ते भर हमें संगम के बारे में कई तरह के खयालात आते रहे। यही संगम हमारे भारतीय गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक है। मुन्नवर का वो शेर भी याद आया, “तेरे आगे अपनी माँ भी मौसी जैसी लगती है, तेरी गोद में गंगा मैया अच्छा लगता है।“ हम उन तमाम कहानियों, उपन्यासॉं और कविताओं के बारे में सोचते रहे जिसने संगम की तश्वीर मेरे जहन में उकेरी थी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मैं उसी संगम की ओर जा रहा था जहां बिन बुलाए कुंभ के मौके पर दसियो करोड़ लोग आ जुटते हैं! इलाहाबाद कितना सस्ता लगा, किसी से हमने पूछा कि संगम कितना दूर है-पता चला 5 किलोमीटर के आसपास है। लेकिन रिक्शावाले ने सिर्फ 20 रुपया मांगा। मेरे साथ राजीव का चचेरा भाई मनीष था। रिक्शावाला रास्ते भर बताता गया कि यहीं वो जगह है जहां कुंभ का मेला लगता है। हम उस मैदान को आंखों मे भरते गए और तमाम मीडीया कवरेज को याद करते गए जो हमने बचपन से देखा था। संगम की तरफ जानेवाली सड़क बहुत प्यारी थी। रिक्शावाला बताता गया कि संगम के पास ही अकबर का किला है और एक बहुत ही प्रसिद्ध हनुमानजी का मंदिर भी है। कहते हैं कि किला बनवाते वक्त हनुमानजी की मूर्ति मिली थी जिसे लोगों ने लाख वहां से हटाना चाहा वो हिली तक नहीं। बहरहाल, हम इन्ही सब बातों पर चर्चा करते हुए संगम जा रहे थे कि एक पैदल चल रहे बुजुर्गबार ने कहा कि बेटा जब गंगा मैया बुलाती है तभी लोग संगम आ पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN9SXBzjKI/AAAAAAAAAL8/brtONgSaprQ/s1600-h/50068125tDvHBV_ph.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355762136246357154" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 211px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN9SXBzjKI/AAAAAAAAAL8/brtONgSaprQ/s320/50068125tDvHBV_ph.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;बहरहाल हम 15 मिनट के बाद संगम के घाट पर थे। हमें मल्लाहों ने घेर लिया, हर किसी में होड़ लग गई कि वो हमें अपने नाव पर ले चले। हमने सख्त बार्गेन की। हम कई बार रुठे, हमने कहा कि हम संगम में नहाने नहीं आए, हम तो यूं ही घूमने आए हैं। पंडों के एजेंट ने अलग घेरा कि कहीं पिंडदान कराने तो हम नहीं आए। आखिरकार हमने एक नाव किराये पर ली जिसने तीन सौ रुपये में हमें संगम तक ले जाने और ले आने का करार किया। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दरअसल, हर साल संगम की जगह बदलती रहती है और इस वर्ष यह ठीक नदी के किनारे से लगभग 1 किलोमीटर आगे है। वो मल्लाह हमें पूरे रास्ते भर अपनी कहानी सुनाता रहा। उसने बताया कि ये उसके पुरखों का पेशा है, वो निषाद था। उसने कहा कि भगवान रामचंद्र को जिस निषादराज ने नदी पार कराई थी वो उसके ही पूर्वज थे। उस मल्लाह ने देश भर में चल रही राजनीतिक हलचलों की हमें जानकारी दी-लेकिन बड़े दुख के साथ उसने ये भी बताया कि अब उसके बच्चे इस पेशें में नहीं आना चाहते।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN-wycrb7I/AAAAAAAAAMM/ESJCtyv0wO4/s1600-h/S6302008.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355763758514532274" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN-wycrb7I/AAAAAAAAAMM/ESJCtyv0wO4/s320/S6302008.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हम संगम पहुंचे, वहां के पंडे ने घेर लिया। उसकी मल्लाह से पहले से ही सांठगांठ थी। उसने गंगा मैया की आरती और पूजा के नाम पर कुछ अनुष्ठान करवाए और न करवाने की सूरत में कई आशंकाएं जताई। उसने प्यार और दुलार भी दिखाया और अज्ञात की आशंका से भी डराया। अंत में उसने ब्रह्मास्त्र छोड़ा कि बाबू, बार-2 कोई संगम थोड़े ही आता है। उसने दावा किया कि हम बिहार के जिस इलाके से आते हैं उसका वो खानदानी पंडा है!&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN-FC3HkpI/AAAAAAAAAME/Ow1R7tq8yhY/s1600-h/untitled.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355763007006151314" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN-FC3HkpI/AAAAAAAAAME/Ow1R7tq8yhY/s320/untitled.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बहरहाल हमने संगम में डुबकी लगाई। हमने अपने परिवार और दोस्तों के नाम की डुबकी ली। एक डुबकी हमने उस लड़की के नाम भी ली जिसे हम अपना खास दोस्त कहते हैं। हमने देखा कि संगम में पूरा हिंदुस्तान डुबकी ले रहा है। वहां असम, बंगाल, उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के लोग थे। हमने मन ही मन सोचा कि क्या ये विशुद्ध धार्मिक आस्था है जिस वजह से हम संगम में नहा रहे हैं या कुछ और है। मन में अभी भी अनिश्चय है, लेकिन इतना तो तय है कि गंगा के प्रति जो आस्था और सम्मान बचपन से है ये स्नान उसी का एक रुप था। यूं हमने पहले भी पटना और विंध्याचल में गंगा स्नान किया था। लेकिन संगम की बात ही कुछ और थी। हमारे मिथिलांचल में गंगा के दक्षिण का स्नान यानि पटना की गंगा को मान्यता नहीं है, ये कैसी विचित्र बात है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;संगम में पानी कम होता है, ऐसा सिर्फ नहाने वालों की सुविधा के लिए नहीं कि उस जगह का चयन कर लिया गया-बल्कि इसके पीछे कारण है कि जब यमुना, गंगा में मिलती है तो अपने साथ काफी मिट्टी, कंकर-पत्थर आदि ले आती है, जिस वजह से वो जगह ऊंचा हो जाता है। ऐसा दूसरी नदियों के साथ भी होता है। संगम में हमें वो यमुना मिल ही गई, जिसे हम रास्ते भर तलाश करते आए थे। हमने नहाते वक्त नेहरुजी की गंगा पर लिखा हुई वो उक्ति याद की, ‘अपने उद्गम से सागर तक और प्राचीनकाल से आज तक गंगा भारतीय सभ्यता की कहानी कहती है।‘ । आखिर गंगा हमारे देश की सभ्यता- संस्कृति के आईना के साथ-साथ ही यहां कि जीवनदायिनी भी तो है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;संगम की गंगा हमें गंदी नहीं लगी। पटना में तो यह काफी संकड़ी हो गई है। हमें राम तेरी गंगा मैली के कई दृश्य़ बार-2 याद आए। हमने वहां पर अदृश्य सरस्वती के बारे में सोचा कि वो कौन सी ऐतिहासिक-भौगोलिक परिस्थितियां रही होगी जब सरस्वती विलुप्त हो गई होगी। इस मायने में संगम का स्नान हर इंसान के लिए एक सबक होनी चाहिए कि कैसे प्रकृति से छेड़छाड़ हमारी जिंदगी, हमारी नदियां और हमारे पर्यावरण के लिए घातक साबित हो सकती है। हमने सोचा कि अगर सरकार संगम के नजदीक एक गंगा संग्रहालय बनाए और उसमें उन चीजों को संयोजित किया जाए जो गंगा और प्रकृति के बारे में हमारी जागरुकता बढ़ाने वाली हो तो कितना अच्छा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने जिंदगी का पहला संगम स्नान कर लिया था। अब हम लौट रहे थे, एक सुकून के साथ, अपने भींगे बालों के साथ...एक आत्मविश्वास और श्रद्धा के साथ...कि हमने उस संगम में स्नान किया है जो हजारों साल से करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, जो पूरे देश के लोगों की सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। हमारे मल्लाह ने हमसे फिर आने की गुजारिश की और हमारे लिए गंगा मैया से दुआ मांगी। हमने गैलन में गंगाजल लिया, ये मां का आदेश भी था। अकबर के किले की प्राचीर में सूरज डूब रहा था, यहीं सूरज मेरे गांव में भी डूब रहा होगा,जहां मेरी मां सोच रही होगी कि संगम में स्नान के बाद उसके बेटे की आस्था अपनी परंपरा और संस्कृति से डिगेगी नहीं।&lt;strong&gt;...(जारी)&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-7301599710117298749?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/7301599710117298749/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=7301599710117298749' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7301599710117298749'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7301599710117298749'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/8.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद - 8'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlN8bSZtdXI/AAAAAAAAAL0/2g3SfIn20v0/s72-c/09062009226.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-1966817748761312204</id><published>2009-07-06T07:43:00.000-07:00</published><updated>2009-07-07T03:35:20.763-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद - 7</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355448353691958770" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 240px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlJf5z7CffI/AAAAAAAAAKE/tQeT20o0FPM/s320/09062009216.jpg" border="0" /&gt;अगले दिन जून की  9वीं तारीख थी, 8 जून की रात शादी थी, हम थककर चूर थे। हमारे पास एक ही दिन बचा था जिसमें हमें संगम, आनंद भवन और सिविल लाईंस जाना था। हम 12 बजे सोकर उठे और नहा धोकर आनंद भवन की ओर चले, हमने अपने आपको मामी की नजरों से बचा कर रखा जो कम से कम दो बार खाना के बुलावे के लिए झांक गई थी। हमने पहला काम ये किया कि लस्सी पी, और आनंद भवन गए। आनंद भवन देखने के बाद मुझे लगा कि प्रगतिशील सोच और शैक्षणिक-समाजिक जागरुकता इंसान को किस मुकाम तक ले जा सकती है। हम आनंद भवन देखते समय हर उस अध्याय, चर्चाओं, गोष्ठियों और अफवाहों को याद करते रहे जो नेहरु परिवार के बारे में बचपन से हम सुनते आ रहे थे, जो हमारी स्मृतियों में दर्ज था। शायद हम 10-15 साल पहले आनंद भवन देखते तो हम उसका इस तरह मनन नहीं कर पाते।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हमने नेहरु खानदान की शानो-शौकत देखी, उनकी लाईब्रेरी देखी उसमें रखी किताबों को देखा। हमने नेहरुजी का कोट, उनके जूते, उनका मोटर, उनका शेविंग बाक्स और हर उस चीज को देखा जिसका वे इस्तेमाल करते थे। हम उन अभागे और मूढ़ राजाओं के बारे में सोचते रहे जो धन दौलत में नेहरु परिवार से कहीं ज्यादा संपन्न था लेकिन जो इतिहास के कूड़ेदान में जाने के लिए अभिशप्त थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlIQ-k31JHI/AAAAAAAAAJ0/DrBEcjBnSqE/s1600-h/image001.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355361574132720754" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlIQ-k31JHI/AAAAAAAAAJ0/DrBEcjBnSqE/s320/image001.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;नेहरु परिवार के रहन सहन, जागरुकता और शिक्षा के प्रति उसके जूनून ने मुझे यकीन दिला दिया कि ये परिवार वाकई में आजाद भारत पर हुकूमत करने के लिए पूरी तरह तैयार हो रहा था। नेहरुजी और मोतीलाल का देश और दुनिया की समझ, उनका अंतराष्ट्रीय मामलों में पकड़ ये देखकर मैं नेहरुजी और इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व और उसके निर्माण के बारे में नई दृष्टोकोण से सोचने पर मजबूर हो गया। नेहरु परिवार का वंशबृक्ष बता रहा था इस परिवार में तकरीबन एक सदी पहले से ही अतर्जातीय और अंतर्धामिक विवाह होते आ रहे थे। बचपन से दिमाग में पल रहा एक किस्म का गैर-कांग्रेसवाद और खानदानवाद के खिलाफ रहनेवाली मानसिकता मानो थोड़ी संतुलित हो गई। मैं सोचता हूं कि आजादी के वक्त की सामंती जकड़न और तंग मानसिकता वाले मुल्क में नेहरुजी क्या वाकई बहुत उदार और लोकतांत्रिक किस्म के नेता नहीं थे ? क्या एक जाहिल और तंगनजर आदमी के हाथ ये वहुभाषी-वहुजातीय और वहुधार्मिक देश सुरक्षित रह सकता था ? ये अलग बात है कि एक मुद्दे के तौर पर मैं खानदानवाद का बहुत बड़ा विरोधी हूं और मुझे लगता है कि नेहरु परिवार के मौजूदा बारिस वौद्धिकता और दृष्टिकोण के मामले में अपनी पुरानी पीढ़ी के कतई बराबर नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आनंद भवन में अभी भी नेहरुजी का ड्राईंगरुम, कांग्रेस का दफ्तर, बापू का शयन कक्ष, इदिरा गांधी का जन्मस्थान और वो धार्मिक किताबें मौजूद है जो नेहरुजी की मां पढ़ा करती थी। नेहरुजी और बापू का इंदिराजी को लिखा पत्र और कई दूसरी चिट्ठियां, कई किताब देखने को मिले जो नेहरु जी ने लिखे थे। हां, एक बात जो मुझे पता नहीं थी वो ये कि आनंदभवन लगभग 20 सालों तक कांग्रेस का हेडक्वार्टर थी। आनंद भवन के बगल में स्वराज भवन भी है जो मोतीलाल नेहरु ने सर सैयद अहमदखान से खरीदा था। बाद में जब बच्चे पढ़ने के लिए विलायत चले गए तो मोतीलाल ने वो मकान कांग्रेस को दे दिया। आनंदभवन को इंदिरा गांधी ने शायद 70 के दशक में देश को समर्पति कर दिया, वहां मैने वो इकरारनामा भी देखा जिस पर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और संजय गांधी के दस्तख़त मौजूद थे।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlIRFcRaU1I/AAAAAAAAAJ8/zxSgkus9EB0/s1600-h/1797587683_88910da760.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355361692083180370" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 214px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlIRFcRaU1I/AAAAAAAAAJ8/zxSgkus9EB0/s320/1797587683_88910da760.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;आनंद भवन में नेहरुजी के वंशबृक्ष को दर्शाता एक फोटो फीचर भी है जिनमें नेहरु परिवार के दूर दराज के संबंधियों और उनके बच्चों के नाम लिखे हुए हैं। इसमे कई दुर्लभ फोटोग्राफ है, जो हमें आजादी के वक्त लेकर चले जाते हैं। स्वराज भवन में एक अस्पताल भी बना हुआ था जिसे शायद नेहरुजी की पत्नी ने आजादी की लड़ाई में घायल लोगों के खोला था। इस भवन में एक पुस्तक केंद्र भी है जिसमें नेहरुजी, बापू और कई दूसरी किताबें उपलब्ध हैं। मैने इसी केंद्र से गांधीजी का माई एक्सपेरिमेंट विथ ट्रूथ खरीदा। हमनें आनंदभवन के सामने कई एंगिल से फोटो खिचवाया, और इतिहास की गोद में लगभग 3 घंटे बिताए। कुल मिलाकर मुझे लगा कि आनंदभवन महज एक ईंट पत्थर की खूबसूरत इमारत नहीं है, बल्कि यह हमारे आजादी के इतिहास का सबसे बड़ा गवाह है।&lt;strong&gt;...(जारी)&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;आर्काइव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/6.html"&gt;तने मोह लिया इलाहाबाद &lt;/a&gt;- छ&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/5.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद - &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पांच&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/4.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - चार&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/3.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - तीन&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/2.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - दो&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/06/1.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - एक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-1966817748761312204?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/1966817748761312204/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=1966817748761312204' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/1966817748761312204'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/1966817748761312204'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/7.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद - 7'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SlJf5z7CffI/AAAAAAAAAKE/tQeT20o0FPM/s72-c/09062009216.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-768822864359195286</id><published>2009-07-04T13:49:00.000-07:00</published><updated>2009-07-05T20:51:14.349-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद - 6</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk_Aq5Qla0I/AAAAAAAAAJA/Wa6gDFZ66EY/s1600-h/DSC00359.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354710325124229954" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk_Aq5Qla0I/AAAAAAAAAJA/Wa6gDFZ66EY/s320/DSC00359.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; संगम और आनंद भवन का जिक्र करने के लिए मैं खुद ही ललचा रहा हूं। लेकिन शादी वाली रात की इतनी यादें हैं कि मैं किस्सागो बनता जा रहा हूं। वैसे संगम भी तो हम शादी के बाद ही देख पाए थे। बहरहाल, शादी के दौरान दुल्हन का गमगीन चेहरा मुझे भावुक कर गया। यों, माहौल आधुनिक था-दूल्हा-दुल्हन दोनों हिंदुस्तान के मशहूर मेडिकल कॉलेज से एमडी कर रहे थे। लेकिन पता नहीं क्यों-शादी के दरम्यान कई बार राजीव की मेमेरी बहन बाबुल का घर छोड़ने का गम छुपा नहीं पाई। कई बार उसकी रुलाई, हमें रुला गई। राजीव की मामी काफी हंसोड़ हैं, थोड़ी पारंपरिक सी दिखती हैं। वे शादी के माहौल को खुशनुमा बना रही थी। वे बीच-बीच में ऐसे लतीफे सुनाती कि दुल्हा-दुल्हन हंसते-2 लोट पोट हो जाते। उन्होने मंडप में ही अपनी बेटी से कहा-बेटा, तुम शादी के लिए परेशान हो रही थी, अब आया न मजा, इसे ही शादी कहते हैं। निवेदिता के गालों पर लाली दौड़ गई। मामी ने दूल्हे का परिचय जिस अंदाज में अपने तमाम ननद-ननदोसि और उनके बच्चों से कराया-वो काबिले तारीफ था, लगा मामी अमेरिका से तो नहीं आई हैं! &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk_CiYPOhSI/AAAAAAAAAJQ/GtHfp9utdZs/s1600-h/Untitled-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354712377844466978" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 188px; CURSOR: hand; HEIGHT: 235px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk_CiYPOhSI/AAAAAAAAAJQ/GtHfp9utdZs/s320/Untitled-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;शादी के मंडप के पास एक बड़ी ही गरिमामय महिला दिखीं। उनके व्यक्तित्व में गजब की आभा थी, गंभीरता थी उनमें नफासत और विद्वता का सम्मिश्रण था। हमनें दरयाफ्त की तो पता चला ये मोहिनी झा हैं जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील हैं। उनके पति अवधेश झा, युनिवर्सिटी में ही प्रोफेसर हैं और मिथिला समाज में भी सक्रिय हैं। बाद में पता चला कि मोहिनी झा, डॉ जयकांत मिश्र की भतीजी हैं। मैं फिर मैथिल नॉस्टेल्जिया में चला गया जिसका जिक्र मैनें पिछले पोस्ट में किया था। मुझे वो सूत्र मिलता नजर आ रहा था जिससे मैं उन लोगों के बारे में पता कर सकूं जिन्होने मैथिल मेधा का झंडा इलाहाबाद में गाड़ा था। लेकिन छुट्टी की कमी थी, अगले एक दिन में मुझे संगम और आनंद भवन जाना था, सो मैं उन लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। अलबत्ता राजीव ने जरुर उनके यहां चाय नाश्ता किया।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk_DOKVM0sI/AAAAAAAAAJY/oqfgYqPUE3o/s1600-h/DSC00394.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354713130025669314" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk_DOKVM0sI/AAAAAAAAAJY/oqfgYqPUE3o/s320/DSC00394.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; उस शादी में एक और लड़की मौजूद थी। संदर्भ से हटकर भी उसका जिक्र जरुरी लगता है। वो प्रोफेसर पिता की बेटी थी। उसके पिता ने अपनी पत्नी की मौत के बाद बच्चियों को छोड़ दिया, वो कहां गुम हुआ पता नहीं। लड़की को मामा ने पाला था, लेकिन अब वो दिल्ली में अपने मामा के घर बतौर नौकरानी जैसी थी। वो दिल्ली के एक हिंदी कॉल सेंटर में 3-4 हजार रुपये की नौकरी करती थी। जब वो इलाहाबाद वापस आती तो कंपनी उसके पैसे काट लेती थी। उसके पास पहनने को बहुत ज्यादा कपड़े और सैंडिल नहीं थे। वो मेंहदी, कढ़ाई सिलाई कढ़ाई और कई दूसरे कामों में माहिर थी। अपने अंतर्मन में तकलीफों के इतने बड़े समंदर के बावजूद वो ऊपर से खुश थी, बल्कि सबके आकर्षण का केंद्र भी बनी हुई थी। मजे की बात ये कि उसी लड़की ने आम पड़ोसने वाले लड़के को कहा था-आम खट्टे हैं। राजीव ने उस लड़की को दिल्ली में मदद का भरोसा दिलाया, मैं राजीव की इस भावना से जबर्दस्त प्रभावित हुआ। मुझे लगा कि जिंदगी जब मुस्कराती है तो मन में ऐसे ही निस्वार्थ मदद की इच्छा जगती है&lt;strong&gt;...(जारी)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#660000;"&gt;आर्काइव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/5.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद - &lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;पांच&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/4.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - चार&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/3.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - तीन&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/2.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - दो&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;a href="http://amrapaali.blogspot.com/2009/06/1.html"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;तूने मोह लिया इलाहाबाद&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt; - एक&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-768822864359195286?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/768822864359195286/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=768822864359195286' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/768822864359195286'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/768822864359195286'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/6.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद - 6'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk_Aq5Qla0I/AAAAAAAAAJA/Wa6gDFZ66EY/s72-c/DSC00359.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-8227022273396812892</id><published>2009-07-04T06:34:00.000-07:00</published><updated>2009-07-04T10:23:21.301-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद-5</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk93uLYyb0I/AAAAAAAAAIw/s6cJbJk1ccc/s1600-h/S6301874.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354630117181255490" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk93uLYyb0I/AAAAAAAAAIw/s6cJbJk1ccc/s320/S6301874.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इलाहाबाद का जिक्र संगम, आनंद भवन, युनिवर्सीटी और सिविल लाईंस के बिना अधूरा है। लेकिन शादी के भागमदौड़ में हम दरअसल विवाह वाले दिन के बाद ही आनंद भवन और संगम जा पाए। अभी हम शादी के जिक्र का मोह नहीं छोड़ पा रहे। &lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;बहरहाल, शादी के मौके पर हम जम कर सजे संवरे। हमने कई कोणों से अपने चेहरे को संवारा। युनिवर्सिटी कैम्पस की कई लड़कियां मौके पर मौजूद थी। दो बातें बार-2 हमारे जेहन में आती रही कि आखिर इलाहाबाद की लड़कियों में इतनी नैसर्गिक सुन्दरता क्यों है ? या फिर प्रोफेसरों की बेटियां ही ऐसी होती है ? हम अभी भी इस बात का मंथन कर रहे हैं। पता नहीं किस वास्तुशिल्पी ने इलाहाबाद को गढ़ा था, ये मासूमियत, ये नैसर्गिकता और ये मिठास इलाहाबाद में जितना था..उससे कम वहां की लड़कियों में नहीं था। खैर, हम भी थोड़े रौब में थे - आखिरकार अब बेरोजगार जो नहीं थे और मीडिया से भी थे। हम इस अहं पर मुस्करा रहे थे कि दुनिया की सारी बातें हमें मालूम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk93iFuztUI/AAAAAAAAAIo/6iiwdFGeweI/s1600-h/Jha+Ji.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354629909504570690" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 292px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk93iFuztUI/AAAAAAAAAIo/6iiwdFGeweI/s320/Jha+Ji.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हमने दुल्हे दुल्हन के बैठने के मंच के पास अपना फोटो सेशन करवाया। राजीव के मां-पापा, और उसकी आधा दर्जन मौसियों ने साथ फोटो खिचवाया-जो अभी-2 बनारस से लौटी थी। ये सदियों का मिलन लगता था, कुछ मौसियां नेहरुकालीन थी तो कुछ राजीव युग(राजीव गांधी के युग की और मेरे दोस्त ‘राजीव’ के युग की भी) की। वो हिंदुस्तान के अलग-2 शहरों से आई थीं और अपने बेटों की तारीफ में मशगूल थीं। वर्षों पुरानी निन्दाएं और आलोचनाएं उनकी बातचीत का अहम हिस्सा था। एक मौसी जिनका आध्यात्मिक विषयों में खासा दखल है, उन्होने हमें टीवी से आया जानकर आस्था चैनल पर उनके प्रस्तुत होने की संभावनाएं भी टटोल ली।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk95Me6s8NI/AAAAAAAAAI4/6M-OeIiHAWs/s1600-h/S6301901.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354631737331478738" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk95Me6s8NI/AAAAAAAAAI4/6M-OeIiHAWs/s320/S6301901.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; बहरहाल, शादी में वहीं हुआ जो अमूमन होता है। वरमाला की रस्म को ‘बिना न्यूज एलीमेंट के इंडिया टीवी के शो की तरह’ आधे घंटे तक ताना गया। कुछ चुटकुले हुए, फोटो सेशन हुआ। शादी में शामिल युवाओं-युवतियों के नैन मिले, संभावनाएं तलाशी गई और मोबाईल नंबर, मेल आई़डी का भी आदान प्रदान हो गया। मजे की बात ये कि इसमें हमारे आधुनिक होते बुजुर्गों की सहमति थी-उन्हे ये अंतर्जातीय विवाह के ‘सदमे’ का सुकूनभरा विकल्प लग रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाकई ये शादी यादगार थी। इलाहाबाद की सारी सड़कें मानों जौहरी विवाह स्थल की तरफ मुड़ गई थी। मामा के अतिथियों में युनिवर्सिटी के प्रोफेसर, कई भावी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वीसी, आला अफसरान और नेता शामिल थे। बिहार में बनने वाले नए केंद्रीय विश्वविद्यालय के वीसी प्रो. जनक पांडे का तो जलवा ही देखने लायक था। उनके आभामंडल में नहाने के लिए कई लोग आतुर दिखे।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk9avNiBTMI/AAAAAAAAAIg/LIBwqtSbNT4/s1600-h/S6301873.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354598249099513026" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk9avNiBTMI/AAAAAAAAAIg/LIBwqtSbNT4/s320/S6301873.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;ये शादी विशुद्ध मैथिल रीतिरिवाज से हुई। मामा के फ्लैट से लगा हुआ एक आंगननुमा जमीन है, जिसके चारो ओर पेड़ ही पेड़ लगे हुए थे। राजीव के नाना संस्कृत के बड़े आचार्य हुए थे, जिनका मुंगेर और भागलपुर के इलाके में खासी ख्याति थी। वाजपेयी सरकार में पीएमओ में ओसडी रहे और अभी जेडी-यू सांसद एन के सिंह के वे गुरु भी थे। जाहिर है, राजीव के मामा और उसके छहों मौसियों पर संस्कृत का बड़ा असर था। शादी के बीच में जब कोई रस्म होता और पौराणिक रीति थम जाता...तो राजीव की मौसियां और उसके मामा बड़े ऊंचे स्वर में संस्कृत के श्लोंकों का और वैदिक ऋचाओं का पाठ करने लगते। वे विभोर हो जाते। वड़ पक्ष के लोग ये देखकर दंग थे, उनकी समझ में नहीं आता कि वे क्या करें। लड़कियां जम्हाई लेने लगती, हम उस जम्हाई को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश करते ! ये वाकई एक अविस्मरणीय क्षण था, कि एक इंटरनेशनल रिलेशन का अंग्रेजीदां प्रोफेसर, जो जॉन हापकिन्स जैसे विश्वविद्यालयों में लेक्चर देता है, कैसे संस्कृत का इतना अच्छा ज्ञाता था। राजीव के स्वर्गीय नानाजी की छाप वहां चप्पे-2 पर मौजूद थी। राजीव की मौसियों का-जो पुरानी पीढ़ी की नुमांइदगी कर रही थीं- संस्कृत पर इतनी जबर्दस्त पकड़ देखकर हमें यकीन हो चला कि वाकई मैत्रेयी, गार्गी और अनुसुया इसी जमीन पर पैदा हुई हैं&lt;strong&gt;...(जारी)&lt;/strong&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-8227022273396812892?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/8227022273396812892/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=8227022273396812892' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8227022273396812892'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8227022273396812892'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/5.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद-5'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk93uLYyb0I/AAAAAAAAAIw/s6cJbJk1ccc/s72-c/S6301874.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-7356037247977578806</id><published>2009-07-03T06:12:00.000-07:00</published><updated>2009-07-06T13:46:39.499-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद - 4</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk4D82t4oFI/AAAAAAAAAII/djNJLsoefXY/s1600-h/prayag+stn.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354221351005102162" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk4D82t4oFI/AAAAAAAAAII/djNJLsoefXY/s320/prayag+stn.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इलाहाबाद का पुराना नाम प्रयाग भी है, लेकिन अब इलाहाबाद इतना अपना सा लगता है कि प्रयाग के नाम से पुकारने की मन में कभी कल्पना ही नहीं आई। यूं मेरी दादी इसे प्रयाग ही पुकारती थी। राजीव का बड़ा वाला ममेरा भाई जो बैंगलोर में कम्प्यूटर इंजिनीयर है, उसे शादी के दिन भी बार- बार ठंडा (कोक) की तलब लगती थी। वो गाड़ी निकाल कर हर दो घंटे में बाहर निकलता था। एक ऐसी ही तलब की पूर्ति के लिए वो हमें बाहर लाया, हमनें पाया कि हम प्रयागराज स्टेशन पर खडे हैं।पान वाले से उसका याराना था, उधारी भी चलती थी। हमनें ठंढ़ा पिया, प्रयागराज के नाम को गौर से देखा और अपनी दादी को एक बार फिर से याद किया। हम मुस्कराए, मन ही मन कहा-चलो नाम बदलने की सनक यहां के लीडरानों ने नहीं दिखाई। वैसे जरुरत भी नहीं है-प्रयाग हमारे जातीय स्मृति में बसा है तो इलाहाबाद ने दिल पर कब्जा कर लिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शादी में बारात दूर से आयी थी, सीतामढ़ी से। कुछ लोग दिल्ली से भी आए थे। दूल्हा डाक्टर था, यूं दुल्हन भी डाक्टर है-कोई दहेज नहीं, सादगी भरा विवाह। लड़के के गांव से कुछ बराती इसलिए भी आ गए थे कि संगम नहा लेंगे-मौका मिले न मिले। तो हुआ यूं कि बहुत सारे बराती सुबह ही उपस्थित हो गए थे, उनके खानेपीने की व्यवस्था और नहाने-घुमाने की जिम्मेवारी भी अघोषित रुप से आन पड़ी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk4EJoLTQ1I/AAAAAAAAAIQ/GE2LWSz-2rc/s1600-h/Dr_Sir_Ganganath_Jha_1871_1941.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354221570440250194" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 208px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk4EJoLTQ1I/AAAAAAAAAIQ/GE2LWSz-2rc/s320/Dr_Sir_Ganganath_Jha_1871_1941.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;राजीव के मामा डा एन के झा, जो इलाहाबाद युनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी हैं-उनके अतिथियों में काफी सारे प्रोफेसर लोग भी थे। उनके परिवार के लोग और इलाहाबाद का मैथिल समुदाय विवाह में बढ़चढ़कर मौजूद था। हम में से कई लड़के जो कुंवारे थे-बल्कि अधिकांश कुंवारे ही थे-सजधज कर मौजूद थे-उन्होनें पूरी दुनियां की शराफत अपने चेहरे पर ओढ़ रखी थी। विवाह योग्य कन्याओं की माताएं उन लड़को को अपने निगाहों से तौल रही थी वो उनके व्यक्तित्व से उनकी आमदनी और व्यवहार को थाह रही थी। एक लड़का जो लड़की वाले की तरफ से था वो आम परोस रहा था। एक लड़की को आम देने के बाद उसने पूछा कैसा है। लड़की ने कहा-खट्टा है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk4EQZuhUgI/AAAAAAAAAIY/xVSLhNYdTDc/s1600-h/AmarNath_Jha_1897_1955.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5354221686820524546" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 192px; CURSOR: hand; HEIGHT: 272px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk4EQZuhUgI/AAAAAAAAAIY/xVSLhNYdTDc/s320/AmarNath_Jha_1897_1955.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; इलाहाबाद से मिथिलांचल का पुराना नाता रहा है। सदियों से मिथिला के लोग अध्ययन अध्यापन और धार्मिक वजहों से इलाहाबाद आते रहे हैं। ये कहानियां हमने बचपन से सुन रखी थी। सुना वहां कोई दरभंगा कालोनी भी है। इलाहाबाद में जिन मैथिलों ने ख्याति प्राप्त की उनमें डा गंगानाथ झा, डा अमरनाथ झा और महामहोपाध्याय डा उमेश मिश्र का नाम अहम है। गंगानाथ झा तो इलाहाबाद युनिवर्सिटी के पहले वीसी भी रहे और लगातार तीन बार वीसी रहने के बाद उन्होने अपने बेटे डा अमरनाथ झा को चार्ज सौंपा था, जो दुनिया के एकेडिमिक इतिहास में शायद अभी तक एक नायाब रिकार्ड है (एक ऐसा ही रिकार्ड कलकत्ता युनिवर्सिटी में भी बनते-बनते रह गया था जहां के वीसी सर आशुतोष मुखर्जी के बेटे श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी वीसी बने थे लेकिन दोनों के बीच कुछ अंतराल था। जी हां..ये श्यामाप्रसाद मुखर्जी वहीं थे जिन्होने बाद में जनसंघ की स्थापना की थी) इलाहाबाद युनिवर्सिटी में जीएन झा और एएन झा के नाम पर काफी भव्य और मशहूर छात्रावास है जहां रहनेवालों की आंखों में अभी भी आईएएस बनने का सपना तैरता है। हाल ही में इलाहाबाद युनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे डा जयकांत मिश्र का निधन हुआ, वे महामहोपाध्याय उमेश मिश्र के पुत्र थे। जयकांत मिश्र के बारे में प्रेमचंद के पौत्र और दिल्ली युनिवर्सिटी में इंग्लिश के प्रोफेसर आलोक राय का कहना है पूरी दुनिया में शेक्सपीयर के साहित्य और रोमांटिश्जम पर व्याख्या करने वाला शख्श जयकांत मिश्र जैसा कोई नहीं था। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तो हम इन यादों और कहानियों के साथ इलाहाबाद में थे। हम उन लोगों को ढ़ूढ़ रहे थे जिनका गंगानाथ झा या जयकांत मिश्र से कुछ वास्ता रहा हो। राजीव के ममेरी बहन की शादी मेरे लिए सिर्फ एक शादी भर नहीं थी...मैं इतिहास में गोता लगाना चाहता था...और उस बहाने बहुत कुछ जानना चाहता था, जो सालों से सुनता आ रहा था &lt;strong&gt;(जारी)&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-7356037247977578806?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/7356037247977578806/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=7356037247977578806' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7356037247977578806'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7356037247977578806'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/4.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद - 4'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/Sk4D82t4oFI/AAAAAAAAAII/djNJLsoefXY/s72-c/prayag+stn.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3523487751759692423</id><published>2009-07-02T08:43:00.000-07:00</published><updated>2009-07-02T08:52:46.994-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद-3</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkzWLDKQi3I/AAAAAAAAAHw/6RbfIXEJRyw/s1600-h/ald.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353889542351915890" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 273px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkzWLDKQi3I/AAAAAAAAAHw/6RbfIXEJRyw/s320/ald.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;दरअसल हम इलाहाबाद जाते ही इसे घूम नहीं पाए थे।&lt;/strong&gt; इसकी वजह थी कि हम शादी वाले घर में गए थे, थोड़ा दिखाना भी था कि सिर्फ मेहमाननवाजी करने नहीं आए हैं। 7 जून की शाम को हम पहुंचे ही थे, 8 जून को शादी थी। दिन भर भागदौड़...उसी बीच में इलाहाबाद का दर्शन। संयोग था कि मामा का घर युनिवर्सिटी इलाके में ही था, उसकी मुख्य इमारत और सारे बड़े होस्टल पास ही थी। हमने उसे जी भर के देखा। हमने शादी के दिन तक आते जाते बाहर से आनंद भवन को देखा और कल्पना की कि नेहरुजी की जीवनशैली कैसी होगी। हमने रिक्शों से, गाड़ियों से और पैदल आते जाते हर लड़की को गौर से देखा और उसकी खूबसूरती को अपने आंखों में कैद करने की कोशिश की। हम उनकी आंखों में झांककर शहर और इस प्रदेश की कानून व्यवस्था का भी जायजा ले रहे थे। हमें इलाहाबाद की लड़कियां कई मापदंडों पर आगे नजर आई। उनके चेहरे का आत्मविश्वास, शहर का आत्मविश्वास बयां कर रहा था। उनकी आखों का नशा, शहर के नशे से कम नहीं था। उनकी आलस भरी चाल, शहर की चाल बता रही थी...अपने में खोई-2 सी...थोड़ी ऊंघती हुई सी। &lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkzWaK8n2WI/AAAAAAAAAH4/HQ8nHwVwTF8/s1600-h/2641720374_53d631e565.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353889802140244322" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkzWaK8n2WI/AAAAAAAAAH4/HQ8nHwVwTF8/s320/2641720374_53d631e565.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;हम शादी के दिन भी बार-2 कर्नलगंज जाते रहे। हमारी लस्सी पीने की तलब बार-2 हमें वहां खींच ले जाती थी। हमें कैमरे की बैटरी लेनी थी, लोगों ने कर्नल गंज का नाम सुझाया, हमें बाल बनवानी थी-हम भटक गए लेकिन जब सामने देखा तो वो कर्नलगंज ही था। मेरे एक दोस्त को हाजमे की दवा लेनी थी, लोगों ने तब भी कर्नलगंज ही सुझाया। हमने अपना तकिया कलाम बना लिया-सारे मर्ज़ की एक दवा....कर्नलगंज। शायद इसकी एक वजह ये भी थी कि हम कर्नलगंज के नजदीक ही ठहरे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम इलाहाबाद के लोगों की मीठी जुबान के कायल हो गए। हमें कई दफा अपनी मैथिली कम मीठी लगी। हमने रिक्शेवाले से बात की, हमने लस्सी वाले से बात की, पनवाड़ी से बात की हमने हर उस शख्स से बात की जिससे बात की जा सकती थी। इलाहाबाद के जुबान की मिठास अभी भी यादों में ताजा है। लस्सी वाले से बात की तो लगा कि किसी बेहद सुसभ्य और सुसंस्कृत नौजवान से बात हो रही है। हमने सिर्फ उसकी बात सुनने के लिए बार-बार लस्सी पी। रिक्शा वाला ऊंचाहार(रायबरेली) का रहनेवाला था। उसने जब अवधी में बात करनी शुरु की तो लगा कि काश हम भी ऐसा बोल पाते। वो नेहरु परिवार की तारीफ में भावविभोर हो गया। उसने बताया कि उसके आंगन की खटिया पर इंदिरा जी, राजीव जी और राहुल जी बैठ चुके हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkzWgPRWaDI/AAAAAAAAAIA/RySuC-1orkk/s1600-h/lassi.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353889906380138546" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 245px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkzWgPRWaDI/AAAAAAAAAIA/RySuC-1orkk/s320/lassi.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; संगम और आनंद भवन से पहले दो बाते और अहम हैं जो नहीं भूलाती। एक तो युनिवर्सिटी के इलाके में जगह-जगह किताबों की दुकान का होना और दूसरी दोपहर में इलाहाबाद का लगभग सो जाना। सड़क के किनारे आधी दाम के किताबों की दुकानें...नौकरियों के फॉर्म की दुकाने...और चाय के साथ अखबारों में लगभग खो गए से युवाओं के चेहरे....पटना याद आ गया। अपना महेंद्रू भी तो ऐसा ही है। लेकिन, पटना के महेंद्रू और इलाहाबाद के इन इलाकों में बहुत अंतर है। हमारा महेंद्रू भीड़भाड़ वाला इलाका है...थोड़ा कम साफ सुथरा... लेकिन इलाहाबाद खुला-खुला सा था। हम मन ही मन फिर भी तसल्ली देते रहे कि अपना पटना ज्यादा डॉक्टर, इंजिंनीयर या दूसरी कामयाबी पैदा करता है...लेकिन इलाहाबाद का शैक्षणिक ढ़ांचा और युवाओं का जुनून देखकर दिल इस बात को नहीं मान पा रहा था। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;जो बात सबसे दिलचस्प थी वो ये कि इलाहाबाद को सही में किसी ने ऊंघता हुआ शहर कहा है। दिन के दो बज रहे थे, हमें लस्सी की तलब लगी थी। हम फिर से कर्नलगंज में थे...राजीव के भाई को बाल बनवाना था(शादी के माहौल में उसे कई लड़कियों पर अपना इम्प्रेसन भी देना था), हम सैलून की तलाश में गए। उधर लस्सी वाला भरी दुपहर में तान के सो रहा था। हमने उसे जगाया, उसने कहा कि बगल के दुकान में पी लीजिए। हमें ताज्जुब हुआ। कई जगह ऐसा हुआ। लगा कि ये शहर 1 बजे से चार बजे तक बंद तो नहीं रहता। दिल्ली होता तो दुकानदार नोट छाप रहे होते। पता नहीं ये बात पूरे इलाहाबाद में है या फिर हमें ही इसका एहसास हुआ ?&lt;strong&gt; (जारी)&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3523487751759692423?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3523487751759692423/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3523487751759692423' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3523487751759692423'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3523487751759692423'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/3.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद-3'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkzWLDKQi3I/AAAAAAAAAHw/6RbfIXEJRyw/s72-c/ald.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-8041559727295124236</id><published>2009-07-01T08:34:00.000-07:00</published><updated>2009-07-01T08:43:22.746-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद-2</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkuCI8g_kBI/AAAAAAAAAHY/Az3pV-ljEvE/s1600-h/Rail_Station,_Allahabad.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353515672255041554" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkuCI8g_kBI/AAAAAAAAAHY/Az3pV-ljEvE/s320/Rail_Station%252C_Allahabad.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;इलाहाबाद शुरु हो चुका था। हम रास्ते भर कल्पना करते आए थे कि यमुना कहीं हमारे बाजू से गुजरती होगी, दिख ही जाएगी। यमुना नहीं दिखी, वो तो संगम के पास दिखी। हमारा भौगोलिक ज्ञान थोड़ा दुरुस्त हुआ। बहरहाल, राजीव का ममेरा भाई यानी गौरव हमे रिसीव करने आया था। पुरानी मारुती थी, शादी का घर था-वो हमें लेने के साथ-साथ पानी भी लेने आया था। हमने स्टेशन पर पानी पिया, पान खाया, उसे निहारा और पटना स्टेशन से तुलना की। (ये हमारी बीमारी है कि हम हर शहर की तुलना पटना से करने लगते हैं) इलाहाबाद का स्टेशन अच्छा लगा, अपना सा। बहुत भीड़भाड़ नहीं, कूड़े कचरे भी कम था, लोगों की चाल में कोई बैचेनी…कोई हड़बड़ी नहीं। ये शहर का पहला एहसास था।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkuCpZYLn7I/AAAAAAAAAHo/eeuwWT8O5Do/s1600-h/2.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353516229758525362" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 300px; CURSOR: hand; HEIGHT: 224px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkuCpZYLn7I/AAAAAAAAAHo/eeuwWT8O5Do/s320/2.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; हमने शहर के चक्कर लगाए। पानीवाले से पानी के चार बोतल लिए(बोतल कहना उचित नहीं-वो 20 लीटर वाले को क्या तो कहते हैं)। गौरव ने बताया कि संगम यहां से नजदीक है, दिल फिर से एक बार धड़का। मां ने फोन पर बताया था कि संगम में जरुर डुबकी मार लेना। शहर की सड़के अच्छी थी, कहीं गड्ढें नहीं। हरियाली ऐसी की लगा कि काश..आंख में रिकार्डिंग की सुविधा होती।जैसा सुना था...कि यूपी उल्टा प्रदेश है-वैसा तो लगता नहीं। सोच ये भी रहा था कि क्या इन्ही सड़को पर एक मजदूरिन को देख कर निराला ने कविता लिखी होगी- वह तोड़ती पत्थर.....कहीं ये सड़क वहीं तो नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम थोड़े आशंकित भी थे कि शादी के घर में रहने-नहाने में दिक्कत होगी। फिर मामा के रुतबे का अंदाज भी था-कहीं बड़ा सा होटल ही बुक करवाया हो। हमें क्या, हम तो मेहमाननवाजी करेंगे, खाएंगे, घूमेंगे और मस्ती करेंगे। लेकिन मामा ने बढ़िया इंतजाम किया था। युनिवर्सिटी के इलाके में ही चैथम लाईंस मे उनका फ्लैट था। एक के बाद एक लगे हुए फ्लैट-जैसे पूरे हिंन्दुस्तान के युनिवर्सिटियों में होते हैं। एकदम शान्ति,लगा अगर पढ़ाकू हो तो पक्का नोबेल जीत लोगे। इनमें से कई फ्लैट खाली थे। मामा ने 5-6 फ्लैट बुक करवा लिए थे। सबमें टैंट हाउस का गद्दा, तकिया, बाल्टी,मग, साबुन और टूथपेस्ट रखे थे। पानी की कोई दिक्कत नहीं थी। गंगा वाटर का सप्लाई था, ठंढ़े पानी में हमने जमकर नहाया।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5353516079945384226" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 209px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkuCgrR8gSI/AAAAAAAAAHg/C0kb5ZVvMeY/s320/23.JPG" border="0" /&gt;हमने थोड़ा मेल मुलाकात करके, थोड़ी पेट पूजा करके... शहर देखने की ठानी। हलांकि इसे टुकड़े-टुकड़े में ही देख पाया लेकिन वो घड़ी अनमोल थी। हमें लस्सी पीने की याद आई। हमने रिक्शा लिया, उसने 10 रुपये में बहुत दूर तक घुमाया। हम कर्नल गंज गए...आनंद भवन के सामने से। तय किया कल इस पर धावा बोलना है। कैमरे की बैट्री को रात में फुलचार्ज पर डाल देंगे। हम कर्नल गंज गए,लस्सी पी, पान खाई और वहां की लड़कियों को देखा। लौटते हुए हमने युनिर्वसिटी की इमारत देखी, गंगानाथ झा और सुंदरलाल होस्टल देखा। हम दंग रह गए। हमने इश्वर से शिकायत की कि हमें इलाहाबाद में पैदा क्यों नहीं किया। &lt;strong&gt;(जारी)&lt;/strong&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-8041559727295124236?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/8041559727295124236/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=8041559727295124236' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8041559727295124236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8041559727295124236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/07/2.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद-2'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_s6LkDIqAAqw/SkuCI8g_kBI/AAAAAAAAAHY/Az3pV-ljEvE/s72-c/Rail_Station%252C_Allahabad.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-8166894251783977186</id><published>2009-06-30T07:53:00.000-07:00</published><updated>2009-07-02T09:03:21.903-07:00</updated><title type='text'>तूने मोह लिया इलाहाबाद- 1</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;कुछ दिन पहले इलाहाबाद गया था। बचपन से काफी सुना था इस शहर के बारे में। हम हिंदुस्तानियों खासकर उत्तर भारतीयों के मन में जिन दो शहरों के बारे में एक खास किस्म की नॉस्टल्जिया है उसमें इलाहाबाद और कलकत्ता का नाम अहम है। पता नहीं क्यों- आप इन दोनों की शहरों में भले ही न गए हों लेकिन एक गजब का अपनापन लगता है। जिन लोगों ने थोड़ा सा साहित्य बगैरह पढ़ा है उनके मन में लाहौर के बारे में भी यहीं अपनापन है। एक जादू है, सम्मोहन है, एक नशा है। शायद इसकी वजह ये हो कि अंग्रेजी राज में यहीं तीनों शहर पहले पहल शिक्षा-दीक्षा और प्रशासन के केंद्र बने और बाद में आजादी के दीवाने क्रान्तिकारियों का बड़ा जत्था भी यहीं से निकला। दोनों शहर बौद्धिक गतिविधियों के बड़े केंद्र रहे हैं। इलाहाबाद हमारी जातीय स्मृति में बुरी तरह समाया हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजीव की ममेरी बहन की शादी थी। राजीव का ममेरा भाई भी आईआईएमसी में हमारा जूनियर था। सो जाना अनायास ही हो गया। ट्रेन में जाते समय इलाहाबाद के बारे में तमाम स्मृतियां जो किताबों और लोगों की बातचीत के मार्फत हमारे दिमाग तक आई थी, सामने आती गई। लगा जैसे किसी फिल्म का फ्लैशबैक चल रहा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इलाहाबाद का मतलब मेरे लिए क्या था ? क्या ये वो शहर था जहां पंडित नेहरु और इंदिरा गांधी पैदा हुईं थी या महज संगम के घाट की वजह से इसे याद किया जाए। इलाहाबाद हिंदी साहित्य का गढ़ था, एक मायने में अभी भी है। जो लेखक या कवि इलाहाबाद में नहीं रहा, उसे एक तरह से मान्यता ही नहीं मिली। मन में हसरत थी कि देखें इसका सिविल लाईंस कैसा है जिसके बारे में शायद हमने कनाट प्लेस और मुम्बई के जुहू से भी ज्यादा सुन रखा था ! इलाहाबाद हाईकोर्ट की कल्पना इंदिरा गांधी वाले फैसले की याद दिलाती थी। कैसा है ये शहर...जिसके कण-कण में चिंगारी भरी हुई है। इसकी यूनिवर्सिटी बेमिशाल है, इसने सदी का सबसे लोकप्रिय अभिनेता पैदा किया है और इस जमीन ने एक नहीं दो नहीं तकरीबन आधा दर्जन प्रधानमंत्री साउथ ब्लॉक में भेजे हैं। कैसा होगा इलाहाबाद...जहां..फिराक गोरखपुरी पैदा होता है और कहता है कि मेरे अलावा अंग्रेजी सिर्फ राधाकृष्णन और मोतीलाल के बेटे को थोड़ी बहुत आती है !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये मेरी रोमांचक यात्रा थी। मैंने सुना था कि यहीं वो इलाहाबाद है जहां कुंभ के मेले में 10 करोड़ से ज्यादा लोग जमा हो जाते हैं। इतने लोग जितनी फ्रांस की आबादी नहीं है। ये कैसा शहर है जहां हर आदमी साहित्यिक किस्म का है। सुना ये भी था इलाहाबाद की सियासी जमीन बहुत संवेदनशील है। रवीन्द्र कालिया ने लिखा कि इलाहाबाद ने जिसे अपना लिया, पूरे मुल्क ने उसे अपना लिया। इलाहाबाद ने जिसे ठुकरा दिया पूरे मुल्क ने उसे ठुकरा दिया। ये वहीं इलाहाबाद था जहां हेमवती नंदन बहुगुणा को गंगा किनारे का एक छोरा हरा देता है। ये वहीं इलाहाबाद था जहां इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिशाली फौलादी सत्ता जस्टिस जगमोहन सिन्हा के कलम का शिकार हो जाती है। और मैं उसी शहर में जा रहा था...दिल की धड़कन तेज हो गई थी...बिल्कुल गाड़ी के रफ्तार की तरह&lt;strong&gt;....(जारी)&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-8166894251783977186?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/8166894251783977186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=8166894251783977186' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8166894251783977186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/8166894251783977186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/06/1.html' title='तूने मोह लिया इलाहाबाद- 1'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-7472685650811685232</id><published>2009-06-06T06:36:00.000-07:00</published><updated>2009-06-06T06:42:13.103-07:00</updated><title type='text'>दलित, समाज, सरकार और हकीकत-7</title><content type='html'>दलितों के विकास में एक अहम बात सरकार के बड़े स्तर पर नीति निर्धारण से भी जुड़ी हुई है। ये बात ऐसी है जो तत्काल अपना असर नहीं दिखाती लेकिन ये देश के दलितों और गरीबों के विकास और देश की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बहुत जरुरी है। और वो मुद्दा है केंद्र राज्य संबंध का, राज्यों का केंद्रीय करों में हिस्सेदारी बढ़ाने का और राज्यों को और भी ज्यादा स्वायत्तता देने का। हमारे सामने ये तथ्य है कि देश की राज्य सरकारें अपने बूते कोई भी आर्थिक संसाधन नहीं जुटा पाती, वे केंद्र के सामने व्यावहारिक रुप से एक नगरपालिका से ज्यादा कुछ भी नहीं है। तमाम बड़े टैक्स केंद्र सरकार उगाहती है और राज्यों के हिस्से सेल्स, मनोरंजन और जमीन के टैक्स ही बच पाते हैं, जो नाकाफी होते हैं। पिछले दशक तक केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी 26 फीसदी तक ही थी जिसे अब बढ़ाकर शायद 29.5 फीसदी कर दिया गया है। हम यहां देश में संसाधनों के विकेंद्रीकरण की तरफ इशारा करना चाहते हैं जो आम जनता और खासकर गरीबों-दलितों के लिए सबसे जरुरी चीज है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक तथ्य है कि आर्थिक केंद्रीकरण होने से देश में कुछ ही जगह पर कारोबार और विकास के टापू पनपते है जिसका सबसे ज्यादा फायदा खाते पीते वर्गों को होता है। हालात यह है कि आजादी के लगभग 60 साल बाद भी हमारे देश में शहरों की आबादी कुल आबादी की महज 30-32 फीसदी ही है और उसमें भी एक बड़ा हिस्सा स्लम में रहने को मजबूर है। हलांकि इसका सीधा कारण तीब्र औद्योगीकरण न होना प्रतीत होता है लेकिन ऐसा इसलिए हुआ है कि देश में सारे फैसले-खासकर-उद्योग धंधों से संबंधित-दिल्ली से ही लिए जाते हैं। देश का राजनीतिक-आर्थिक एलीट- जिसमें बड़े कारोबारी, दलाल(या सलाहकार ?), राजनीतिज्ञ से लेकर बड़े नौकरशाह तक शामिल हैं- नहीं चाहता कि संसाधनों वितरण नीचे तक हो। उसे केंद्रीकृत व्यवस्था आसान लगती है। अगर कोई इस एलीट वर्ग की तस्वीर उकेरना चाहे तो बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह निरंतर गतिशील है, बहुरुपिया है और वायरस की तरह रंग बदल लेता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले कुछ दशकों में अब जाकर सरकार ने औद्यौगिक नीति में थोड़ी सी ढ़ील दी है। दूसरी बात ये कि राज्यों के पास संसाधन इतने कम हैं कि वो कोई बड़े संरचनात्मक प्रोजेक्ट शुरु नहीं कर पाते। इससे देश में कुछ ही जगह शहरीकरण हो पाया है। हम देश के हर हिस्से को उत्पादक नहीं बना पाए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इसका दलित हितों से क्या ताल्लुक है ? इस बात का दलित हितों से ये ताल्लुक है कि अगर देश में समान और विकेंद्रीकृत विकास होता है तो एक गरीब आदमी भी कम आमदनी में अपने घर के नजदीक रह सकता है और बचत कर सकता है। एक गरीब आदमी के बच्चे को भी घर के नजदीक युनिवर्सिटी      और इंजिनीयरिंग कॉलेज मिले ये विकेंद्रीकरण का मतलब है। ऐसा क्यों है कि इस देश में सारे अच्छे कॉलेज दिल्ली-मुम्बई-पूना और बंगलूरु में ही है ? क्या महज सीटों में आरक्षण देकर एक गरीब के बच्चे को बंगलूरु के कॉलेज में पढ़ने भेजा जा सकता है जहां की फीस 5-8 लाख रुपये है ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है, बड़े शहरों का विकास देश के हित में कतई नहीं है-वे कूड़े के ढ़ेर और स्लम बस्तियों में तब्दील होते जा रहे हैं। वहां रहने का खर्च ज्यादा है, ऑफिस महंगे हैं, जमीन महंगी है और देश की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ समान और विकेंद्रितकृत विकास सभी को विकास का समान मौका देती है और अच्छी जीवनशैली प्रदान करती है। व्यापक अर्थों में ये गरीबों और दलितों के लिए फायदेमंद है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसा तभी हो पाएगा जब राज्यों को ज्यादा वित्तीय अधिकार दिए जाएं। राज्यों को कम से कम केंद्रीय करों में 40 फीसदी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए और कुछ करों की उगाही का भी अधिकार उन्हे मिलना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ ऐतिहासिक वजहों से अपने यहां केंद्र को इतना मजबूत बना दिया गया है कि ये बात अब बड़ी वाधा बन गई है। पंडित नेहरु ने जब संविधान सभा में अपने भाषण में ये बात कही थी तो हालात कुछ और थे-लेकिन अब हम एक परिपक्व और अपेक्षाकृत मजबूत देश बन गए हैं-हमें इस पर विचार करना चाहिए।(जारी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-7472685650811685232?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/7472685650811685232/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=7472685650811685232' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7472685650811685232'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/7472685650811685232'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/06/7.html' title='दलित, समाज, सरकार और हकीकत-7'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-3036273155524178378</id><published>2009-05-23T07:53:00.000-07:00</published><updated>2009-05-23T07:54:27.016-07:00</updated><title type='text'>दलित, समाज, सरकार और हकीकत-6</title><content type='html'>हाल के दिनों में साहित्य और दलित चिंतन में मौलिकता और उभार देखने को आया है। इस सिलसिले में ऐसे लेखकों को खारिज कर देने की प्रबृत्ति भी बढ़ी है जो गैर-दलित हैं। दलित लेखकों का एक वर्ग कहता है कि दलितों को सहानुभूति का लेखन नहीं बल्कि स्व-अनुभूति का लेखन चाहिए। एक ऐसा लेखन जो भोगे हुए यथार्थ पर आधारित हो। लेकिन ऐसा उचित नहीं जान पड़ता। कई दूसरे गैर-दलित लेखक भी हो सकते हैं जिन्होने दलितों जैसे कुछ हालात झेले हों। जातीय और समाजिक भेदभाव की बात अगर छोड़ दी जाए तो आर्थिक आभाव कमोवेश हरेक इंसान को समान रुप से प्रभावित करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरी बात ये है कि अगर कोई गैर-दलित लेखक दलित हितों के बारे में कोई मौलिक विचार पेश करता है तो उसे लेने में क्या बुराई है भले ही वो सहानुभूति ही क्यों न हो। हमें याद रखनी चाहिए कि अमेरिका में अश्वेतों के समर्थन में एक निर्णायक लड़ाई को अंजाम देने वाले शख्स का नाम एब्राहम लिंकन था जो श्वेत था। दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में दलितों के सबसे बड़े हितचिंतक, राजनीतिज्ञ  और विचारक बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर को भी एक महाराजा ने विदेश जाने में वित्तीय मदद की थी। कहने का मतलब ये कि नीयत अगर सही हो तो कोई काम बुरा नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलित लेखकों का एक वर्ग इस बात पर जोर दे रहा है कि अगर दलितों तरक्की करनी है तो उन्हे अंग्रेजी सीखनी होगी। ये बात सही है, और दलित ही नहीं- हर वर्ग के लिए सही है। लेकिन हमें याद रखनी चाहिए अग्रेजी सीखना एक क्रमिक प्रक्रिया है और इसके सहारे एक बड़े वर्ग के विकास का लंबे समय तक इंतजार नहीं किया जा सकता। इस वर्ग में दलित ही नहीं कई दूसरे वर्गों के लोग भी शामिल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के हिंदुस्तान में अंग्रेजी न जानने वाला तकरीबन हर हिंदुस्तानी कई स्तरों पर भेदभाव का शिकार है। तो क्या कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सकता जिससे अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी सम्मानजनक जिंदगी जीने का रास्ता खुलता हो ? जो लोग सिर्फ अंग्रेजी के सहारे विकास की बात करते हैं वे प्रकारांतर से उसी समाजिक समूहों के हाथ में पूरी शक्ति देने की वकालत करते हैं जिसमें दलितों मौजूदगी शून्य से ज्यादा नहीं है। दुर्भाग्य से ये विमर्श आजादी के बाद से ही चल रहा है लेकिन इससे निपटने का कोई रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए हाल ही का एक उदाहरण देना काफी है। ताजा लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जब अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने की बात की तो जिस तरह का हाय तौबा मचा उससे .यहीं लगता है कि प्रवुद्धजनों,, हालात और तंत्र में अग्रेजी ने किस कदर अपना जड़ जमाया है। भाषाई विमर्श दलित हितों से सीधे जुड़ा हुआ है। या तो पूरे हिंदुस्तान में सरकारी स्तर पर अंग्रेजी की संस्थागत और ठोस पढ़ाई की व्यवस्था की जानी चाहिए या फिर उच्च स्तर पर भी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए और नौकरियों में अंग्रेजी के आतंक को खत्म किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सवाल ये है कि निजी क्षेत्र क्यों अंग्रेजी छोड़ेगा और क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाएगा ? यहां फिर से सरकारी प्रोत्साहन की जरुरत है। सरकार को ऐसा कुछ करना होगा- चाहे वो प्रोत्साहनात्मक हो या निषेधात्मक- कि भाषाई आधार पर किसी से भेदभाव न किया जाए। सरकार क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भाषा में कामकाज करनेवाली कंपनी को प्रोत्साहित कर सकती है। इसके आलावा सरकार क्षेत्रीय भाषाओं में ज्ञान के कई विषयों की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन दे सकती है। हरेक भाषा में अनुवाद और मौलिक लेखन को प्रोत्साहित कर के सामग्री की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की आवश्यकता है जो हमारे नेतृत्व में नहीं दिखती।(जारी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6167611887407732252-3036273155524178378?l=amrapaali.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://amrapaali.blogspot.com/feeds/3036273155524178378/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6167611887407732252&amp;postID=3036273155524178378' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3036273155524178378'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6167611887407732252/posts/default/3036273155524178378'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://amrapaali.blogspot.com/2009/05/6.html' title='दलित, समाज, सरकार और हकीकत-6'/><author><name>sushant jha</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10780857463309576614</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6167611887407732252.post-1095791028453417067</id><published>2009-05-22T07:55:00.000-07:00</published><updated>2009-05-22T08:03:14.050-07:00</updated><title type='text'>दलित, समाज, सरकार और हकीकत-5</title><content type='html'>&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सवाल&lt;/span&gt; सिर्फ इतना ही नहीं है। आज के युग में जब अधिकांश नौकरियां निजी क्षेत्र से आ रहीं हैं तो दलितों के लिए यहां दोहरा संकट है। एक तो यहां आरक्षण नहीं है दूसरी बात ये अंग्रेजी एक बड़ी वाध्यता है। निजी क्षेत्र की अधिकांश अच्छी नौकरियों में अंग्रेजी का ज्ञान जरुरी है। यहां अगर सरकार और निजी क्षेत्र मिलजुल कर काम करे तो बात बन सकती है। इसका अच्छा उदाहरण मायावती का फॉर्मूला हो सकता था जिसमें एक खास फीसदी में दलितों को आरक्षण देने पर सरकार नजी क्षेत्रों को कुछ रियायते देती। लेकिन ये फॉर्मूला पूरे देश के स्तर पर लागू नहीं हो पाया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff9966;"&gt;दूसरी&lt;/span&gt; बात ये कि कई नौकरियां ऐसी हैं जहां तकनीकी दक्षता की ज्यादा जरुरत होती है और भाषाई ज्ञान कम चाहिए होता है। सरकार ऐसे क्षेत्रों को तलाश कर दलितों के बच्चों को वहां पढ़ा सकती है जिससे वो आसानी से नौकरी हासिल कर सकें। सरकार को ज्यादा से ज्यादा आईटीआई और वोकेशनल कोर्स के संस्थान खोलने चाहिए या फिर प्राइवेट क्षेत्र को इसमें पूंजी लगाने के लिए हौसलाआफजाई करनी चाहिए। हमारे देश में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी तो पैदा हो गई है लेकिन यहां जरुरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा छोटी नौकरियां पैदा की जाएं जिससे लाखों लोगों को खपाया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे यहां कृषि क्षेत्र को अभीतक पूरी तरह खंगाला नहीं गया है। जैसा कि मैंने हरियाणा में देखा-वहां की सरकार अब कृषि उत्पादन बढ़ाने की जगह कृषि विविधिकरण पर जोर दे रही है। चूंकि देश अब खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है इसलिए खेती को ऐसे दिशा में मोड़ने में जरुरत है कि कम जमीन में ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो सके। देश में अब फलों, सब्जियों और अन्य वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा देने की नीति 
