Thursday, July 9, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - अंतिम भाग

10 तारीख को हमें इलाहाबाद से वापस आना था, मन कर रहा था कि काश कुछ दिन और रुक पाते। सुबह आठ बजे हमारी ट्रेन थी, गौरव हमें स्टेशन तक छोड़ने आया। हमने आते वक्त वो खूबसूरत केथेड्रल देखा जो स्टेशन के नजदीक ही है। हमने इलाहाबाद हाईकोर्ट भी देखा और उसके सामने फोटो खिचाया। हमें बड़ी मुश्किल से पुलिसवालों से मनुहार कर वहां पर फोटो खिंचाने की इजाजत मिली। वाकई इलाहाबाद हाईकोर्ट की इमारत अद्भुत है, हम उसकी भव्यता का अंदाजा लगाते रहे और सोचते रहे कि क्या वाकई हम उसी इमारत के सामने खड़े है जिसने इंदिरा गांधी की सत्ता को हिला कर रख दिया था।

डीडी न्यूज में काम कर रहे मेरे दोस्त नितेंद्र सिंह की याद बरबस आ गई जिसने कई बार इलाहाबाद के जगराम चौराहा का जिक्र हमारे सामने किया था। रास्ते में ही जगराम चौराहा दिखा, हमने वहां चाय पी। वो किसी जगराम नामके किसी कारोबारी के नाम पर था, जिनकी पिछली पांच पीढ़ियों से वहां दुकान थी। हमें फोटो खींचते देख दुकान मालिक ने शुरु में पूछताछ की, बाद में उसने हमारा काफी सहयोग किया। नितेंद्र सिंह की जुबान में मिठास अब हमारी समझ में आ गई थी। हम उसके मुंह से सिविल लाईन और जगराम चौराहा का जिक्र इतनी बार सुन चुके थे, जितना हमने कनाट प्लेस के बारे में नहीं सुना था। खैर संगम से आते वक्त ही शाम को हमने सिविल लाईंस भी देखा था। इतना खुला इलाका आजकल बनाना मुश्किल है। पापा ने फोन कर कहा कि वहां के कॉफी हाउस की बात ही कुछ और है, लेकिन वो हम देख नहीं पाए।

हमारे पास वक्त की कमी थी जिस वजह से हम बहुत कुछ और नहीं देख पाए। हम हरिवंशराय बच्चन का घर नहीं देख पाए जहां अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ था। हम कटरा के पास से गुजरे जरुर लेकिन वहां हम वहां चाय लस्सी नहीं पी पाए-जिस कटरे पर राही मासूम रजा ने कटरा बी आरजू लिखा था। हम युनिवर्सिटी के अंदर बहुत घूम नहीं पाए जो अपने सुनहरे अतीत के लिए मशहूर है। हम उन जगहों पर जाना चाहते थे जहां पर महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, निराला, और बड़े-2 साहित्यकार रहते थे। हम उन इलाकों में घूमना चाहते थे जहां मेरे कई दोस्तों और सीनीयर्स की प्रेम कहांनियां परवान चढ़ी थी।
इलाहाबाद से मेरे परिवार का थोड़ा व्यक्तिगत नाता भी रहा है। मेरे पापा ने अपने जीवन का अहम हिस्सा यूपी के एक बड़े नेता और वहां के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा के साथ बिताया था। वे उनके राजनीतिक सलाहकार थे। इस नाते मेरे पापा इलाहाबाद और यूपी के चप्पे से परिचित थे। बचपन से जो बातें मैं इलाहाबाद के बारे में सुनता आ रहा था, वो सब सामने थी। शायद ये भी एक वजह हो कि इलाहाबाद यात्रा को मैनें इस स्तर पर जिया था। ये मेरे लिए महज किसी छोटे से शहर की यात्रा भर नहीं थी-ये मेरे लिए मेरे अतीत के साथ मेरा साक्षात्कार भी था।

आखिर जब हम ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हुए तो हम भावुक हो गए। इस शहर के साथ हमारा क्या नाता था जिसने हमें बांध कर रख लिया। हम अपने मन को बार-2 तसल्ली देते रहे कि हमें यहां फिर से आना है। राजीव ने तो यहां तक कहा कि हमारी शादी इलाहाबाद में ही होनी चाहिए, ताकि आना-जाना बना रहे। शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि इस शहर का अगर कोई ग्रामदेवता है तो वो कामदेव ही होगा। वाकई हमें इलाहाबाद ने मोह लिया।...(अंतिम)

Tuesday, July 7, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 8

आनंदभवन से छूटते ही हमने रिक्शा ली, और चल पड़े संगम की तरफ...उस संगम की तरफ जिसके बारे में बचपन से सुनता आ रहा था। जिस संगम का नाम सुनते ही मेरी दादी की आंखों में चमक आ जाती थी, जिस संगम के बारे में मां ने आते वक्त फोन पर खासतौर पर डुबकी मार लेने को कहा था। रास्ते भर हमें संगम के बारे में कई तरह के खयालात आते रहे। यही संगम हमारे भारतीय गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतीक है। मुन्नवर का वो शेर भी याद आया, “तेरे आगे अपनी माँ भी मौसी जैसी लगती है, तेरी गोद में गंगा मैया अच्छा लगता है।“ हम उन तमाम कहानियों, उपन्यासॉं और कविताओं के बारे में सोचते रहे जिसने संगम की तश्वीर मेरे जहन में उकेरी थी।
मैं उसी संगम की ओर जा रहा था जहां बिन बुलाए कुंभ के मौके पर दसियो करोड़ लोग आ जुटते हैं! इलाहाबाद कितना सस्ता लगा, किसी से हमने पूछा कि संगम कितना दूर है-पता चला 5 किलोमीटर के आसपास है। लेकिन रिक्शावाले ने सिर्फ 20 रुपया मांगा। मेरे साथ राजीव का चचेरा भाई मनीष था। रिक्शावाला रास्ते भर बताता गया कि यहीं वो जगह है जहां कुंभ का मेला लगता है। हम उस मैदान को आंखों मे भरते गए और तमाम मीडीया कवरेज को याद करते गए जो हमने बचपन से देखा था। संगम की तरफ जानेवाली सड़क बहुत प्यारी थी। रिक्शावाला बताता गया कि संगम के पास ही अकबर का किला है और एक बहुत ही प्रसिद्ध हनुमानजी का मंदिर भी है। कहते हैं कि किला बनवाते वक्त हनुमानजी की मूर्ति मिली थी जिसे लोगों ने लाख वहां से हटाना चाहा वो हिली तक नहीं। बहरहाल, हम इन्ही सब बातों पर चर्चा करते हुए संगम जा रहे थे कि एक पैदल चल रहे बुजुर्गबार ने कहा कि बेटा जब गंगा मैया बुलाती है तभी लोग संगम आ पाते हैं।

बहरहाल हम 15 मिनट के बाद संगम के घाट पर थे। हमें मल्लाहों ने घेर लिया, हर किसी में होड़ लग गई कि वो हमें अपने नाव पर ले चले। हमने सख्त बार्गेन की। हम कई बार रुठे, हमने कहा कि हम संगम में नहाने नहीं आए, हम तो यूं ही घूमने आए हैं। पंडों के एजेंट ने अलग घेरा कि कहीं पिंडदान कराने तो हम नहीं आए। आखिरकार हमने एक नाव किराये पर ली जिसने तीन सौ रुपये में हमें संगम तक ले जाने और ले आने का करार किया।
दरअसल, हर साल संगम की जगह बदलती रहती है और इस वर्ष यह ठीक नदी के किनारे से लगभग 1 किलोमीटर आगे है। वो मल्लाह हमें पूरे रास्ते भर अपनी कहानी सुनाता रहा। उसने बताया कि ये उसके पुरखों का पेशा है, वो निषाद था। उसने कहा कि भगवान रामचंद्र को जिस निषादराज ने नदी पार कराई थी वो उसके ही पूर्वज थे। उस मल्लाह ने देश भर में चल रही राजनीतिक हलचलों की हमें जानकारी दी-लेकिन बड़े दुख के साथ उसने ये भी बताया कि अब उसके बच्चे इस पेशें में नहीं आना चाहते।
हम संगम पहुंचे, वहां के पंडे ने घेर लिया। उसकी मल्लाह से पहले से ही सांठगांठ थी। उसने गंगा मैया की आरती और पूजा के नाम पर कुछ अनुष्ठान करवाए और न करवाने की सूरत में कई आशंकाएं जताई। उसने प्यार और दुलार भी दिखाया और अज्ञात की आशंका से भी डराया। अंत में उसने ब्रह्मास्त्र छोड़ा कि बाबू, बार-2 कोई संगम थोड़े ही आता है। उसने दावा किया कि हम बिहार के जिस इलाके से आते हैं उसका वो खानदानी पंडा है!
बहरहाल हमने संगम में डुबकी लगाई। हमने अपने परिवार और दोस्तों के नाम की डुबकी ली। एक डुबकी हमने उस लड़की के नाम भी ली जिसे हम अपना खास दोस्त कहते हैं। हमने देखा कि संगम में पूरा हिंदुस्तान डुबकी ले रहा है। वहां असम, बंगाल, उड़ीसा और आंध्रप्रदेश के लोग थे। हमने मन ही मन सोचा कि क्या ये विशुद्ध धार्मिक आस्था है जिस वजह से हम संगम में नहा रहे हैं या कुछ और है। मन में अभी भी अनिश्चय है, लेकिन इतना तो तय है कि गंगा के प्रति जो आस्था और सम्मान बचपन से है ये स्नान उसी का एक रुप था। यूं हमने पहले भी पटना और विंध्याचल में गंगा स्नान किया था। लेकिन संगम की बात ही कुछ और थी। हमारे मिथिलांचल में गंगा के दक्षिण का स्नान यानि पटना की गंगा को मान्यता नहीं है, ये कैसी विचित्र बात है।
संगम में पानी कम होता है, ऐसा सिर्फ नहाने वालों की सुविधा के लिए नहीं कि उस जगह का चयन कर लिया गया-बल्कि इसके पीछे कारण है कि जब यमुना, गंगा में मिलती है तो अपने साथ काफी मिट्टी, कंकर-पत्थर आदि ले आती है, जिस वजह से वो जगह ऊंचा हो जाता है। ऐसा दूसरी नदियों के साथ भी होता है। संगम में हमें वो यमुना मिल ही गई, जिसे हम रास्ते भर तलाश करते आए थे। हमने नहाते वक्त नेहरुजी की गंगा पर लिखा हुई वो उक्ति याद की, ‘अपने उद्गम से सागर तक और प्राचीनकाल से आज तक गंगा भारतीय सभ्यता की कहानी कहती है।‘ । आखिर गंगा हमारे देश की सभ्यता- संस्कृति के आईना के साथ-साथ ही यहां कि जीवनदायिनी भी तो है।
संगम की गंगा हमें गंदी नहीं लगी। पटना में तो यह काफी संकड़ी हो गई है। हमें राम तेरी गंगा मैली के कई दृश्य़ बार-2 याद आए। हमने वहां पर अदृश्य सरस्वती के बारे में सोचा कि वो कौन सी ऐतिहासिक-भौगोलिक परिस्थितियां रही होगी जब सरस्वती विलुप्त हो गई होगी। इस मायने में संगम का स्नान हर इंसान के लिए एक सबक होनी चाहिए कि कैसे प्रकृति से छेड़छाड़ हमारी जिंदगी, हमारी नदियां और हमारे पर्यावरण के लिए घातक साबित हो सकती है। हमने सोचा कि अगर सरकार संगम के नजदीक एक गंगा संग्रहालय बनाए और उसमें उन चीजों को संयोजित किया जाए जो गंगा और प्रकृति के बारे में हमारी जागरुकता बढ़ाने वाली हो तो कितना अच्छा हो।

हमने जिंदगी का पहला संगम स्नान कर लिया था। अब हम लौट रहे थे, एक सुकून के साथ, अपने भींगे बालों के साथ...एक आत्मविश्वास और श्रद्धा के साथ...कि हमने उस संगम में स्नान किया है जो हजारों साल से करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है, जो पूरे देश के लोगों की सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। हमारे मल्लाह ने हमसे फिर आने की गुजारिश की और हमारे लिए गंगा मैया से दुआ मांगी। हमने गैलन में गंगाजल लिया, ये मां का आदेश भी था। अकबर के किले की प्राचीर में सूरज डूब रहा था, यहीं सूरज मेरे गांव में भी डूब रहा होगा,जहां मेरी मां सोच रही होगी कि संगम में स्नान के बाद उसके बेटे की आस्था अपनी परंपरा और संस्कृति से डिगेगी नहीं।...(जारी)

Monday, July 6, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 7

अगले दिन जून की 9वीं तारीख थी, 8 जून की रात शादी थी, हम थककर चूर थे। हमारे पास एक ही दिन बचा था जिसमें हमें संगम, आनंद भवन और सिविल लाईंस जाना था। हम 12 बजे सोकर उठे और नहा धोकर आनंद भवन की ओर चले, हमने अपने आपको मामी की नजरों से बचा कर रखा जो कम से कम दो बार खाना के बुलावे के लिए झांक गई थी। हमने पहला काम ये किया कि लस्सी पी, और आनंद भवन गए। आनंद भवन देखने के बाद मुझे लगा कि प्रगतिशील सोच और शैक्षणिक-समाजिक जागरुकता इंसान को किस मुकाम तक ले जा सकती है। हम आनंद भवन देखते समय हर उस अध्याय, चर्चाओं, गोष्ठियों और अफवाहों को याद करते रहे जो नेहरु परिवार के बारे में बचपन से हम सुनते आ रहे थे, जो हमारी स्मृतियों में दर्ज था। शायद हम 10-15 साल पहले आनंद भवन देखते तो हम उसका इस तरह मनन नहीं कर पाते।

हमने नेहरु खानदान की शानो-शौकत देखी, उनकी लाईब्रेरी देखी उसमें रखी किताबों को देखा। हमने नेहरुजी का कोट, उनके जूते, उनका मोटर, उनका शेविंग बाक्स और हर उस चीज को देखा जिसका वे इस्तेमाल करते थे। हम उन अभागे और मूढ़ राजाओं के बारे में सोचते रहे जो धन दौलत में नेहरु परिवार से कहीं ज्यादा संपन्न था लेकिन जो इतिहास के कूड़ेदान में जाने के लिए अभिशप्त थे।

नेहरु परिवार के रहन सहन, जागरुकता और शिक्षा के प्रति उसके जूनून ने मुझे यकीन दिला दिया कि ये परिवार वाकई में आजाद भारत पर हुकूमत करने के लिए पूरी तरह तैयार हो रहा था। नेहरुजी और मोतीलाल का देश और दुनिया की समझ, उनका अंतराष्ट्रीय मामलों में पकड़ ये देखकर मैं नेहरुजी और इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व और उसके निर्माण के बारे में नई दृष्टोकोण से सोचने पर मजबूर हो गया। नेहरु परिवार का वंशबृक्ष बता रहा था इस परिवार में तकरीबन एक सदी पहले से ही अतर्जातीय और अंतर्धामिक विवाह होते आ रहे थे। बचपन से दिमाग में पल रहा एक किस्म का गैर-कांग्रेसवाद और खानदानवाद के खिलाफ रहनेवाली मानसिकता मानो थोड़ी संतुलित हो गई। मैं सोचता हूं कि आजादी के वक्त की सामंती जकड़न और तंग मानसिकता वाले मुल्क में नेहरुजी क्या वाकई बहुत उदार और लोकतांत्रिक किस्म के नेता नहीं थे ? क्या एक जाहिल और तंगनजर आदमी के हाथ ये वहुभाषी-वहुजातीय और वहुधार्मिक देश सुरक्षित रह सकता था ? ये अलग बात है कि एक मुद्दे के तौर पर मैं खानदानवाद का बहुत बड़ा विरोधी हूं और मुझे लगता है कि नेहरु परिवार के मौजूदा बारिस वौद्धिकता और दृष्टिकोण के मामले में अपनी पुरानी पीढ़ी के कतई बराबर नहीं है।

आनंद भवन में अभी भी नेहरुजी का ड्राईंगरुम, कांग्रेस का दफ्तर, बापू का शयन कक्ष, इदिरा गांधी का जन्मस्थान और वो धार्मिक किताबें मौजूद है जो नेहरुजी की मां पढ़ा करती थी। नेहरुजी और बापू का इंदिराजी को लिखा पत्र और कई दूसरी चिट्ठियां, कई किताब देखने को मिले जो नेहरु जी ने लिखे थे। हां, एक बात जो मुझे पता नहीं थी वो ये कि आनंदभवन लगभग 20 सालों तक कांग्रेस का हेडक्वार्टर थी। आनंद भवन के बगल में स्वराज भवन भी है जो मोतीलाल नेहरु ने सर सैयद अहमदखान से खरीदा था। बाद में जब बच्चे पढ़ने के लिए विलायत चले गए तो मोतीलाल ने वो मकान कांग्रेस को दे दिया। आनंदभवन को इंदिरा गांधी ने शायद 70 के दशक में देश को समर्पति कर दिया, वहां मैने वो इकरारनामा भी देखा जिस पर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और संजय गांधी के दस्तख़त मौजूद थे।
आनंद भवन में नेहरुजी के वंशबृक्ष को दर्शाता एक फोटो फीचर भी है जिनमें नेहरु परिवार के दूर दराज के संबंधियों और उनके बच्चों के नाम लिखे हुए हैं। इसमे कई दुर्लभ फोटोग्राफ है, जो हमें आजादी के वक्त लेकर चले जाते हैं। स्वराज भवन में एक अस्पताल भी बना हुआ था जिसे शायद नेहरुजी की पत्नी ने आजादी की लड़ाई में घायल लोगों के खोला था। इस भवन में एक पुस्तक केंद्र भी है जिसमें नेहरुजी, बापू और कई दूसरी किताबें उपलब्ध हैं। मैने इसी केंद्र से गांधीजी का माई एक्सपेरिमेंट विथ ट्रूथ खरीदा। हमनें आनंदभवन के सामने कई एंगिल से फोटो खिचवाया, और इतिहास की गोद में लगभग 3 घंटे बिताए। कुल मिलाकर मुझे लगा कि आनंदभवन महज एक ईंट पत्थर की खूबसूरत इमारत नहीं है, बल्कि यह हमारे आजादी के इतिहास का सबसे बड़ा गवाह है।...(जारी)

आर्काइव
तने मोह लिया इलाहाबाद - छ

तूने मोह लिया इलाहाबाद - पांच
तूने मोह लिया इलाहाबाद - चार
तूने मोह लिया इलाहाबाद - तीन
तूने मोह लिया इलाहाबाद - दो
तूने मोह लिया इलाहाबाद - एक

Saturday, July 4, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 6

संगम और आनंद भवन का जिक्र करने के लिए मैं खुद ही ललचा रहा हूं। लेकिन शादी वाली रात की इतनी यादें हैं कि मैं किस्सागो बनता जा रहा हूं। वैसे संगम भी तो हम शादी के बाद ही देख पाए थे। बहरहाल, शादी के दौरान दुल्हन का गमगीन चेहरा मुझे भावुक कर गया। यों, माहौल आधुनिक था-दूल्हा-दुल्हन दोनों हिंदुस्तान के मशहूर मेडिकल कॉलेज से एमडी कर रहे थे। लेकिन पता नहीं क्यों-शादी के दरम्यान कई बार राजीव की मेमेरी बहन बाबुल का घर छोड़ने का गम छुपा नहीं पाई। कई बार उसकी रुलाई, हमें रुला गई। राजीव की मामी काफी हंसोड़ हैं, थोड़ी पारंपरिक सी दिखती हैं। वे शादी के माहौल को खुशनुमा बना रही थी। वे बीच-बीच में ऐसे लतीफे सुनाती कि दुल्हा-दुल्हन हंसते-2 लोट पोट हो जाते। उन्होने मंडप में ही अपनी बेटी से कहा-बेटा, तुम शादी के लिए परेशान हो रही थी, अब आया न मजा, इसे ही शादी कहते हैं। निवेदिता के गालों पर लाली दौड़ गई। मामी ने दूल्हे का परिचय जिस अंदाज में अपने तमाम ननद-ननदोसि और उनके बच्चों से कराया-वो काबिले तारीफ था, लगा मामी अमेरिका से तो नहीं आई हैं!

शादी के मंडप के पास एक बड़ी ही गरिमामय महिला दिखीं। उनके व्यक्तित्व में गजब की आभा थी, गंभीरता थी उनमें नफासत और विद्वता का सम्मिश्रण था। हमनें दरयाफ्त की तो पता चला ये मोहिनी झा हैं जो इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील हैं। उनके पति अवधेश झा, युनिवर्सिटी में ही प्रोफेसर हैं और मिथिला समाज में भी सक्रिय हैं। बाद में पता चला कि मोहिनी झा, डॉ जयकांत मिश्र की भतीजी हैं। मैं फिर मैथिल नॉस्टेल्जिया में चला गया जिसका जिक्र मैनें पिछले पोस्ट में किया था। मुझे वो सूत्र मिलता नजर आ रहा था जिससे मैं उन लोगों के बारे में पता कर सकूं जिन्होने मैथिल मेधा का झंडा इलाहाबाद में गाड़ा था। लेकिन छुट्टी की कमी थी, अगले एक दिन में मुझे संगम और आनंद भवन जाना था, सो मैं उन लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। अलबत्ता राजीव ने जरुर उनके यहां चाय नाश्ता किया।

उस शादी में एक और लड़की मौजूद थी। संदर्भ से हटकर भी उसका जिक्र जरुरी लगता है। वो प्रोफेसर पिता की बेटी थी। उसके पिता ने अपनी पत्नी की मौत के बाद बच्चियों को छोड़ दिया, वो कहां गुम हुआ पता नहीं। लड़की को मामा ने पाला था, लेकिन अब वो दिल्ली में अपने मामा के घर बतौर नौकरानी जैसी थी। वो दिल्ली के एक हिंदी कॉल सेंटर में 3-4 हजार रुपये की नौकरी करती थी। जब वो इलाहाबाद वापस आती तो कंपनी उसके पैसे काट लेती थी। उसके पास पहनने को बहुत ज्यादा कपड़े और सैंडिल नहीं थे। वो मेंहदी, कढ़ाई सिलाई कढ़ाई और कई दूसरे कामों में माहिर थी। अपने अंतर्मन में तकलीफों के इतने बड़े समंदर के बावजूद वो ऊपर से खुश थी, बल्कि सबके आकर्षण का केंद्र भी बनी हुई थी। मजे की बात ये कि उसी लड़की ने आम पड़ोसने वाले लड़के को कहा था-आम खट्टे हैं। राजीव ने उस लड़की को दिल्ली में मदद का भरोसा दिलाया, मैं राजीव की इस भावना से जबर्दस्त प्रभावित हुआ। मुझे लगा कि जिंदगी जब मुस्कराती है तो मन में ऐसे ही निस्वार्थ मदद की इच्छा जगती है...(जारी)

आर्काइव
तूने मोह लिया इलाहाबाद - पांच
तूने मोह लिया इलाहाबाद - चार
तूने मोह लिया इलाहाबाद - तीन
तूने मोह लिया इलाहाबाद - दो
तूने मोह लिया इलाहाबाद - एक

तूने मोह लिया इलाहाबाद-5

इलाहाबाद का जिक्र संगम, आनंद भवन, युनिवर्सीटी और सिविल लाईंस के बिना अधूरा है। लेकिन शादी के भागमदौड़ में हम दरअसल विवाह वाले दिन के बाद ही आनंद भवन और संगम जा पाए। अभी हम शादी के जिक्र का मोह नहीं छोड़ पा रहे।

बहरहाल, शादी के मौके पर हम जम कर सजे संवरे। हमने कई कोणों से अपने चेहरे को संवारा। युनिवर्सिटी कैम्पस की कई लड़कियां मौके पर मौजूद थी। दो बातें बार-2 हमारे जेहन में आती रही कि आखिर इलाहाबाद की लड़कियों में इतनी नैसर्गिक सुन्दरता क्यों है ? या फिर प्रोफेसरों की बेटियां ही ऐसी होती है ? हम अभी भी इस बात का मंथन कर रहे हैं। पता नहीं किस वास्तुशिल्पी ने इलाहाबाद को गढ़ा था, ये मासूमियत, ये नैसर्गिकता और ये मिठास इलाहाबाद में जितना था..उससे कम वहां की लड़कियों में नहीं था। खैर, हम भी थोड़े रौब में थे - आखिरकार अब बेरोजगार जो नहीं थे और मीडिया से भी थे। हम इस अहं पर मुस्करा रहे थे कि दुनिया की सारी बातें हमें मालूम है।

हमने दुल्हे दुल्हन के बैठने के मंच के पास अपना फोटो सेशन करवाया। राजीव के मां-पापा, और उसकी आधा दर्जन मौसियों ने साथ फोटो खिचवाया-जो अभी-2 बनारस से लौटी थी। ये सदियों का मिलन लगता था, कुछ मौसियां नेहरुकालीन थी तो कुछ राजीव युग(राजीव गांधी के युग की और मेरे दोस्त ‘राजीव’ के युग की भी) की। वो हिंदुस्तान के अलग-2 शहरों से आई थीं और अपने बेटों की तारीफ में मशगूल थीं। वर्षों पुरानी निन्दाएं और आलोचनाएं उनकी बातचीत का अहम हिस्सा था। एक मौसी जिनका आध्यात्मिक विषयों में खासा दखल है, उन्होने हमें टीवी से आया जानकर आस्था चैनल पर उनके प्रस्तुत होने की संभावनाएं भी टटोल ली।
बहरहाल, शादी में वहीं हुआ जो अमूमन होता है। वरमाला की रस्म को ‘बिना न्यूज एलीमेंट के इंडिया टीवी के शो की तरह’ आधे घंटे तक ताना गया। कुछ चुटकुले हुए, फोटो सेशन हुआ। शादी में शामिल युवाओं-युवतियों के नैन मिले, संभावनाएं तलाशी गई और मोबाईल नंबर, मेल आई़डी का भी आदान प्रदान हो गया। मजे की बात ये कि इसमें हमारे आधुनिक होते बुजुर्गों की सहमति थी-उन्हे ये अंतर्जातीय विवाह के ‘सदमे’ का सुकूनभरा विकल्प लग रहा था।

वाकई ये शादी यादगार थी। इलाहाबाद की सारी सड़कें मानों जौहरी विवाह स्थल की तरफ मुड़ गई थी। मामा के अतिथियों में युनिवर्सिटी के प्रोफेसर, कई भावी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के वीसी, आला अफसरान और नेता शामिल थे। बिहार में बनने वाले नए केंद्रीय विश्वविद्यालय के वीसी प्रो. जनक पांडे का तो जलवा ही देखने लायक था। उनके आभामंडल में नहाने के लिए कई लोग आतुर दिखे।

ये शादी विशुद्ध मैथिल रीतिरिवाज से हुई। मामा के फ्लैट से लगा हुआ एक आंगननुमा जमीन है, जिसके चारो ओर पेड़ ही पेड़ लगे हुए थे। राजीव के नाना संस्कृत के बड़े आचार्य हुए थे, जिनका मुंगेर और भागलपुर के इलाके में खासी ख्याति थी। वाजपेयी सरकार में पीएमओ में ओसडी रहे और अभी जेडी-यू सांसद एन के सिंह के वे गुरु भी थे। जाहिर है, राजीव के मामा और उसके छहों मौसियों पर संस्कृत का बड़ा असर था। शादी के बीच में जब कोई रस्म होता और पौराणिक रीति थम जाता...तो राजीव की मौसियां और उसके मामा बड़े ऊंचे स्वर में संस्कृत के श्लोंकों का और वैदिक ऋचाओं का पाठ करने लगते। वे विभोर हो जाते। वड़ पक्ष के लोग ये देखकर दंग थे, उनकी समझ में नहीं आता कि वे क्या करें। लड़कियां जम्हाई लेने लगती, हम उस जम्हाई को अपने कैमरे में कैद करने की कोशिश करते ! ये वाकई एक अविस्मरणीय क्षण था, कि एक इंटरनेशनल रिलेशन का अंग्रेजीदां प्रोफेसर, जो जॉन हापकिन्स जैसे विश्वविद्यालयों में लेक्चर देता है, कैसे संस्कृत का इतना अच्छा ज्ञाता था। राजीव के स्वर्गीय नानाजी की छाप वहां चप्पे-2 पर मौजूद थी। राजीव की मौसियों का-जो पुरानी पीढ़ी की नुमांइदगी कर रही थीं- संस्कृत पर इतनी जबर्दस्त पकड़ देखकर हमें यकीन हो चला कि वाकई मैत्रेयी, गार्गी और अनुसुया इसी जमीन पर पैदा हुई हैं...(जारी)

Friday, July 3, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद - 4

इलाहाबाद का पुराना नाम प्रयाग भी है, लेकिन अब इलाहाबाद इतना अपना सा लगता है कि प्रयाग के नाम से पुकारने की मन में कभी कल्पना ही नहीं आई। यूं मेरी दादी इसे प्रयाग ही पुकारती थी। राजीव का बड़ा वाला ममेरा भाई जो बैंगलोर में कम्प्यूटर इंजिनीयर है, उसे शादी के दिन भी बार- बार ठंडा (कोक) की तलब लगती थी। वो गाड़ी निकाल कर हर दो घंटे में बाहर निकलता था। एक ऐसी ही तलब की पूर्ति के लिए वो हमें बाहर लाया, हमनें पाया कि हम प्रयागराज स्टेशन पर खडे हैं।पान वाले से उसका याराना था, उधारी भी चलती थी। हमनें ठंढ़ा पिया, प्रयागराज के नाम को गौर से देखा और अपनी दादी को एक बार फिर से याद किया। हम मुस्कराए, मन ही मन कहा-चलो नाम बदलने की सनक यहां के लीडरानों ने नहीं दिखाई। वैसे जरुरत भी नहीं है-प्रयाग हमारे जातीय स्मृति में बसा है तो इलाहाबाद ने दिल पर कब्जा कर लिया है।

शादी में बारात दूर से आयी थी, सीतामढ़ी से। कुछ लोग दिल्ली से भी आए थे। दूल्हा डाक्टर था, यूं दुल्हन भी डाक्टर है-कोई दहेज नहीं, सादगी भरा विवाह। लड़के के गांव से कुछ बराती इसलिए भी आ गए थे कि संगम नहा लेंगे-मौका मिले न मिले। तो हुआ यूं कि बहुत सारे बराती सुबह ही उपस्थित हो गए थे, उनके खानेपीने की व्यवस्था और नहाने-घुमाने की जिम्मेवारी भी अघोषित रुप से आन पड़ी थी।

राजीव के मामा डा एन के झा, जो इलाहाबाद युनिवर्सिटी में प्रोफेसर भी हैं-उनके अतिथियों में काफी सारे प्रोफेसर लोग भी थे। उनके परिवार के लोग और इलाहाबाद का मैथिल समुदाय विवाह में बढ़चढ़कर मौजूद था। हम में से कई लड़के जो कुंवारे थे-बल्कि अधिकांश कुंवारे ही थे-सजधज कर मौजूद थे-उन्होनें पूरी दुनियां की शराफत अपने चेहरे पर ओढ़ रखी थी। विवाह योग्य कन्याओं की माताएं उन लड़को को अपने निगाहों से तौल रही थी वो उनके व्यक्तित्व से उनकी आमदनी और व्यवहार को थाह रही थी। एक लड़का जो लड़की वाले की तरफ से था वो आम परोस रहा था। एक लड़की को आम देने के बाद उसने पूछा कैसा है। लड़की ने कहा-खट्टा है।

इलाहाबाद से मिथिलांचल का पुराना नाता रहा है। सदियों से मिथिला के लोग अध्ययन अध्यापन और धार्मिक वजहों से इलाहाबाद आते रहे हैं। ये कहानियां हमने बचपन से सुन रखी थी। सुना वहां कोई दरभंगा कालोनी भी है। इलाहाबाद में जिन मैथिलों ने ख्याति प्राप्त की उनमें डा गंगानाथ झा, डा अमरनाथ झा और महामहोपाध्याय डा उमेश मिश्र का नाम अहम है। गंगानाथ झा तो इलाहाबाद युनिवर्सिटी के पहले वीसी भी रहे और लगातार तीन बार वीसी रहने के बाद उन्होने अपने बेटे डा अमरनाथ झा को चार्ज सौंपा था, जो दुनिया के एकेडिमिक इतिहास में शायद अभी तक एक नायाब रिकार्ड है (एक ऐसा ही रिकार्ड कलकत्ता युनिवर्सिटी में भी बनते-बनते रह गया था जहां के वीसी सर आशुतोष मुखर्जी के बेटे श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी वीसी बने थे लेकिन दोनों के बीच कुछ अंतराल था। जी हां..ये श्यामाप्रसाद मुखर्जी वहीं थे जिन्होने बाद में जनसंघ की स्थापना की थी) इलाहाबाद युनिवर्सिटी में जीएन झा और एएन झा के नाम पर काफी भव्य और मशहूर छात्रावास है जहां रहनेवालों की आंखों में अभी भी आईएएस बनने का सपना तैरता है। हाल ही में इलाहाबाद युनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे डा जयकांत मिश्र का निधन हुआ, वे महामहोपाध्याय उमेश मिश्र के पुत्र थे। जयकांत मिश्र के बारे में प्रेमचंद के पौत्र और दिल्ली युनिवर्सिटी में इंग्लिश के प्रोफेसर आलोक राय का कहना है पूरी दुनिया में शेक्सपीयर के साहित्य और रोमांटिश्जम पर व्याख्या करने वाला शख्श जयकांत मिश्र जैसा कोई नहीं था।

तो हम इन यादों और कहानियों के साथ इलाहाबाद में थे। हम उन लोगों को ढ़ूढ़ रहे थे जिनका गंगानाथ झा या जयकांत मिश्र से कुछ वास्ता रहा हो। राजीव के ममेरी बहन की शादी मेरे लिए सिर्फ एक शादी भर नहीं थी...मैं इतिहास में गोता लगाना चाहता था...और उस बहाने बहुत कुछ जानना चाहता था, जो सालों से सुनता आ रहा था (जारी)

Thursday, July 2, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद-3

दरअसल हम इलाहाबाद जाते ही इसे घूम नहीं पाए थे। इसकी वजह थी कि हम शादी वाले घर में गए थे, थोड़ा दिखाना भी था कि सिर्फ मेहमाननवाजी करने नहीं आए हैं। 7 जून की शाम को हम पहुंचे ही थे, 8 जून को शादी थी। दिन भर भागदौड़...उसी बीच में इलाहाबाद का दर्शन। संयोग था कि मामा का घर युनिवर्सिटी इलाके में ही था, उसकी मुख्य इमारत और सारे बड़े होस्टल पास ही थी। हमने उसे जी भर के देखा। हमने शादी के दिन तक आते जाते बाहर से आनंद भवन को देखा और कल्पना की कि नेहरुजी की जीवनशैली कैसी होगी। हमने रिक्शों से, गाड़ियों से और पैदल आते जाते हर लड़की को गौर से देखा और उसकी खूबसूरती को अपने आंखों में कैद करने की कोशिश की। हम उनकी आंखों में झांककर शहर और इस प्रदेश की कानून व्यवस्था का भी जायजा ले रहे थे। हमें इलाहाबाद की लड़कियां कई मापदंडों पर आगे नजर आई। उनके चेहरे का आत्मविश्वास, शहर का आत्मविश्वास बयां कर रहा था। उनकी आखों का नशा, शहर के नशे से कम नहीं था। उनकी आलस भरी चाल, शहर की चाल बता रही थी...अपने में खोई-2 सी...थोड़ी ऊंघती हुई सी।

हम शादी के दिन भी बार-2 कर्नलगंज जाते रहे। हमारी लस्सी पीने की तलब बार-2 हमें वहां खींच ले जाती थी। हमें कैमरे की बैटरी लेनी थी, लोगों ने कर्नल गंज का नाम सुझाया, हमें बाल बनवानी थी-हम भटक गए लेकिन जब सामने देखा तो वो कर्नलगंज ही था। मेरे एक दोस्त को हाजमे की दवा लेनी थी, लोगों ने तब भी कर्नलगंज ही सुझाया। हमने अपना तकिया कलाम बना लिया-सारे मर्ज़ की एक दवा....कर्नलगंज। शायद इसकी एक वजह ये भी थी कि हम कर्नलगंज के नजदीक ही ठहरे थे।

हम इलाहाबाद के लोगों की मीठी जुबान के कायल हो गए। हमें कई दफा अपनी मैथिली कम मीठी लगी। हमने रिक्शेवाले से बात की, हमने लस्सी वाले से बात की, पनवाड़ी से बात की हमने हर उस शख्स से बात की जिससे बात की जा सकती थी। इलाहाबाद के जुबान की मिठास अभी भी यादों में ताजा है। लस्सी वाले से बात की तो लगा कि किसी बेहद सुसभ्य और सुसंस्कृत नौजवान से बात हो रही है। हमने सिर्फ उसकी बात सुनने के लिए बार-बार लस्सी पी। रिक्शा वाला ऊंचाहार(रायबरेली) का रहनेवाला था। उसने जब अवधी में बात करनी शुरु की तो लगा कि काश हम भी ऐसा बोल पाते। वो नेहरु परिवार की तारीफ में भावविभोर हो गया। उसने बताया कि उसके आंगन की खटिया पर इंदिरा जी, राजीव जी और राहुल जी बैठ चुके हैं।
संगम और आनंद भवन से पहले दो बाते और अहम हैं जो नहीं भूलाती। एक तो युनिवर्सिटी के इलाके में जगह-जगह किताबों की दुकान का होना और दूसरी दोपहर में इलाहाबाद का लगभग सो जाना। सड़क के किनारे आधी दाम के किताबों की दुकानें...नौकरियों के फॉर्म की दुकाने...और चाय के साथ अखबारों में लगभग खो गए से युवाओं के चेहरे....पटना याद आ गया। अपना महेंद्रू भी तो ऐसा ही है। लेकिन, पटना के महेंद्रू और इलाहाबाद के इन इलाकों में बहुत अंतर है। हमारा महेंद्रू भीड़भाड़ वाला इलाका है...थोड़ा कम साफ सुथरा... लेकिन इलाहाबाद खुला-खुला सा था। हम मन ही मन फिर भी तसल्ली देते रहे कि अपना पटना ज्यादा डॉक्टर, इंजिंनीयर या दूसरी कामयाबी पैदा करता है...लेकिन इलाहाबाद का शैक्षणिक ढ़ांचा और युवाओं का जुनून देखकर दिल इस बात को नहीं मान पा रहा था।

जो बात सबसे दिलचस्प थी वो ये कि इलाहाबाद को सही में किसी ने ऊंघता हुआ शहर कहा है। दिन के दो बज रहे थे, हमें लस्सी की तलब लगी थी। हम फिर से कर्नलगंज में थे...राजीव के भाई को बाल बनवाना था(शादी के माहौल में उसे कई लड़कियों पर अपना इम्प्रेसन भी देना था), हम सैलून की तलाश में गए। उधर लस्सी वाला भरी दुपहर में तान के सो रहा था। हमने उसे जगाया, उसने कहा कि बगल के दुकान में पी लीजिए। हमें ताज्जुब हुआ। कई जगह ऐसा हुआ। लगा कि ये शहर 1 बजे से चार बजे तक बंद तो नहीं रहता। दिल्ली होता तो दुकानदार नोट छाप रहे होते। पता नहीं ये बात पूरे इलाहाबाद में है या फिर हमें ही इसका एहसास हुआ ? (जारी)

Wednesday, July 1, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद-2

इलाहाबाद शुरु हो चुका था। हम रास्ते भर कल्पना करते आए थे कि यमुना कहीं हमारे बाजू से गुजरती होगी, दिख ही जाएगी। यमुना नहीं दिखी, वो तो संगम के पास दिखी। हमारा भौगोलिक ज्ञान थोड़ा दुरुस्त हुआ। बहरहाल, राजीव का ममेरा भाई यानी गौरव हमे रिसीव करने आया था। पुरानी मारुती थी, शादी का घर था-वो हमें लेने के साथ-साथ पानी भी लेने आया था। हमने स्टेशन पर पानी पिया, पान खाया, उसे निहारा और पटना स्टेशन से तुलना की। (ये हमारी बीमारी है कि हम हर शहर की तुलना पटना से करने लगते हैं) इलाहाबाद का स्टेशन अच्छा लगा, अपना सा। बहुत भीड़भाड़ नहीं, कूड़े कचरे भी कम था, लोगों की चाल में कोई बैचेनी…कोई हड़बड़ी नहीं। ये शहर का पहला एहसास था।
हमने शहर के चक्कर लगाए। पानीवाले से पानी के चार बोतल लिए(बोतल कहना उचित नहीं-वो 20 लीटर वाले को क्या तो कहते हैं)। गौरव ने बताया कि संगम यहां से नजदीक है, दिल फिर से एक बार धड़का। मां ने फोन पर बताया था कि संगम में जरुर डुबकी मार लेना। शहर की सड़के अच्छी थी, कहीं गड्ढें नहीं। हरियाली ऐसी की लगा कि काश..आंख में रिकार्डिंग की सुविधा होती।जैसा सुना था...कि यूपी उल्टा प्रदेश है-वैसा तो लगता नहीं। सोच ये भी रहा था कि क्या इन्ही सड़को पर एक मजदूरिन को देख कर निराला ने कविता लिखी होगी- वह तोड़ती पत्थर.....कहीं ये सड़क वहीं तो नहीं।

हम थोड़े आशंकित भी थे कि शादी के घर में रहने-नहाने में दिक्कत होगी। फिर मामा के रुतबे का अंदाज भी था-कहीं बड़ा सा होटल ही बुक करवाया हो। हमें क्या, हम तो मेहमाननवाजी करेंगे, खाएंगे, घूमेंगे और मस्ती करेंगे। लेकिन मामा ने बढ़िया इंतजाम किया था। युनिवर्सिटी के इलाके में ही चैथम लाईंस मे उनका फ्लैट था। एक के बाद एक लगे हुए फ्लैट-जैसे पूरे हिंन्दुस्तान के युनिवर्सिटियों में होते हैं। एकदम शान्ति,लगा अगर पढ़ाकू हो तो पक्का नोबेल जीत लोगे। इनमें से कई फ्लैट खाली थे। मामा ने 5-6 फ्लैट बुक करवा लिए थे। सबमें टैंट हाउस का गद्दा, तकिया, बाल्टी,मग, साबुन और टूथपेस्ट रखे थे। पानी की कोई दिक्कत नहीं थी। गंगा वाटर का सप्लाई था, ठंढ़े पानी में हमने जमकर नहाया।
हमने थोड़ा मेल मुलाकात करके, थोड़ी पेट पूजा करके... शहर देखने की ठानी। हलांकि इसे टुकड़े-टुकड़े में ही देख पाया लेकिन वो घड़ी अनमोल थी। हमें लस्सी पीने की याद आई। हमने रिक्शा लिया, उसने 10 रुपये में बहुत दूर तक घुमाया। हम कर्नल गंज गए...आनंद भवन के सामने से। तय किया कल इस पर धावा बोलना है। कैमरे की बैट्री को रात में फुलचार्ज पर डाल देंगे। हम कर्नल गंज गए,लस्सी पी, पान खाई और वहां की लड़कियों को देखा। लौटते हुए हमने युनिर्वसिटी की इमारत देखी, गंगानाथ झा और सुंदरलाल होस्टल देखा। हम दंग रह गए। हमने इश्वर से शिकायत की कि हमें इलाहाबाद में पैदा क्यों नहीं किया। (जारी)

Tuesday, June 30, 2009

तूने मोह लिया इलाहाबाद- 1

कुछ दिन पहले इलाहाबाद गया था। बचपन से काफी सुना था इस शहर के बारे में। हम हिंदुस्तानियों खासकर उत्तर भारतीयों के मन में जिन दो शहरों के बारे में एक खास किस्म की नॉस्टल्जिया है उसमें इलाहाबाद और कलकत्ता का नाम अहम है। पता नहीं क्यों- आप इन दोनों की शहरों में भले ही न गए हों लेकिन एक गजब का अपनापन लगता है। जिन लोगों ने थोड़ा सा साहित्य बगैरह पढ़ा है उनके मन में लाहौर के बारे में भी यहीं अपनापन है। एक जादू है, सम्मोहन है, एक नशा है। शायद इसकी वजह ये हो कि अंग्रेजी राज में यहीं तीनों शहर पहले पहल शिक्षा-दीक्षा और प्रशासन के केंद्र बने और बाद में आजादी के दीवाने क्रान्तिकारियों का बड़ा जत्था भी यहीं से निकला। दोनों शहर बौद्धिक गतिविधियों के बड़े केंद्र रहे हैं। इलाहाबाद हमारी जातीय स्मृति में बुरी तरह समाया हुआ है।

राजीव की ममेरी बहन की शादी थी। राजीव का ममेरा भाई भी आईआईएमसी में हमारा जूनियर था। सो जाना अनायास ही हो गया। ट्रेन में जाते समय इलाहाबाद के बारे में तमाम स्मृतियां जो किताबों और लोगों की बातचीत के मार्फत हमारे दिमाग तक आई थी, सामने आती गई। लगा जैसे किसी फिल्म का फ्लैशबैक चल रहा हो।

इलाहाबाद का मतलब मेरे लिए क्या था ? क्या ये वो शहर था जहां पंडित नेहरु और इंदिरा गांधी पैदा हुईं थी या महज संगम के घाट की वजह से इसे याद किया जाए। इलाहाबाद हिंदी साहित्य का गढ़ था, एक मायने में अभी भी है। जो लेखक या कवि इलाहाबाद में नहीं रहा, उसे एक तरह से मान्यता ही नहीं मिली। मन में हसरत थी कि देखें इसका सिविल लाईंस कैसा है जिसके बारे में शायद हमने कनाट प्लेस और मुम्बई के जुहू से भी ज्यादा सुन रखा था ! इलाहाबाद हाईकोर्ट की कल्पना इंदिरा गांधी वाले फैसले की याद दिलाती थी। कैसा है ये शहर...जिसके कण-कण में चिंगारी भरी हुई है। इसकी यूनिवर्सिटी बेमिशाल है, इसने सदी का सबसे लोकप्रिय अभिनेता पैदा किया है और इस जमीन ने एक नहीं दो नहीं तकरीबन आधा दर्जन प्रधानमंत्री साउथ ब्लॉक में भेजे हैं। कैसा होगा इलाहाबाद...जहां..फिराक गोरखपुरी पैदा होता है और कहता है कि मेरे अलावा अंग्रेजी सिर्फ राधाकृष्णन और मोतीलाल के बेटे को थोड़ी बहुत आती है !

ये मेरी रोमांचक यात्रा थी। मैंने सुना था कि यहीं वो इलाहाबाद है जहां कुंभ के मेले में 10 करोड़ से ज्यादा लोग जमा हो जाते हैं। इतने लोग जितनी फ्रांस की आबादी नहीं है। ये कैसा शहर है जहां हर आदमी साहित्यिक किस्म का है। सुना ये भी था इलाहाबाद की सियासी जमीन बहुत संवेदनशील है। रवीन्द्र कालिया ने लिखा कि इलाहाबाद ने जिसे अपना लिया, पूरे मुल्क ने उसे अपना लिया। इलाहाबाद ने जिसे ठुकरा दिया पूरे मुल्क ने उसे ठुकरा दिया। ये वहीं इलाहाबाद था जहां हेमवती नंदन बहुगुणा को गंगा किनारे का एक छोरा हरा देता है। ये वहीं इलाहाबाद था जहां इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिशाली फौलादी सत्ता जस्टिस जगमोहन सिन्हा के कलम का शिकार हो जाती है। और मैं उसी शहर में जा रहा था...दिल की धड़कन तेज हो गई थी...बिल्कुल गाड़ी के रफ्तार की तरह....(जारी)

Saturday, June 6, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत-7

दलितों के विकास में एक अहम बात सरकार के बड़े स्तर पर नीति निर्धारण से भी जुड़ी हुई है। ये बात ऐसी है जो तत्काल अपना असर नहीं दिखाती लेकिन ये देश के दलितों और गरीबों के विकास और देश की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बहुत जरुरी है। और वो मुद्दा है केंद्र राज्य संबंध का, राज्यों का केंद्रीय करों में हिस्सेदारी बढ़ाने का और राज्यों को और भी ज्यादा स्वायत्तता देने का। हमारे सामने ये तथ्य है कि देश की राज्य सरकारें अपने बूते कोई भी आर्थिक संसाधन नहीं जुटा पाती, वे केंद्र के सामने व्यावहारिक रुप से एक नगरपालिका से ज्यादा कुछ भी नहीं है। तमाम बड़े टैक्स केंद्र सरकार उगाहती है और राज्यों के हिस्से सेल्स, मनोरंजन और जमीन के टैक्स ही बच पाते हैं, जो नाकाफी होते हैं। पिछले दशक तक केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी 26 फीसदी तक ही थी जिसे अब बढ़ाकर शायद 29.5 फीसदी कर दिया गया है। हम यहां देश में संसाधनों के विकेंद्रीकरण की तरफ इशारा करना चाहते हैं जो आम जनता और खासकर गरीबों-दलितों के लिए सबसे जरुरी चीज है।

यह एक तथ्य है कि आर्थिक केंद्रीकरण होने से देश में कुछ ही जगह पर कारोबार और विकास के टापू पनपते है जिसका सबसे ज्यादा फायदा खाते पीते वर्गों को होता है। हालात यह है कि आजादी के लगभग 60 साल बाद भी हमारे देश में शहरों की आबादी कुल आबादी की महज 30-32 फीसदी ही है और उसमें भी एक बड़ा हिस्सा स्लम में रहने को मजबूर है। हलांकि इसका सीधा कारण तीब्र औद्योगीकरण न होना प्रतीत होता है लेकिन ऐसा इसलिए हुआ है कि देश में सारे फैसले-खासकर-उद्योग धंधों से संबंधित-दिल्ली से ही लिए जाते हैं। देश का राजनीतिक-आर्थिक एलीट- जिसमें बड़े कारोबारी, दलाल(या सलाहकार ?), राजनीतिज्ञ से लेकर बड़े नौकरशाह तक शामिल हैं- नहीं चाहता कि संसाधनों वितरण नीचे तक हो। उसे केंद्रीकृत व्यवस्था आसान लगती है। अगर कोई इस एलीट वर्ग की तस्वीर उकेरना चाहे तो बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह निरंतर गतिशील है, बहुरुपिया है और वायरस की तरह रंग बदल लेता है।

पिछले कुछ दशकों में अब जाकर सरकार ने औद्यौगिक नीति में थोड़ी सी ढ़ील दी है। दूसरी बात ये कि राज्यों के पास संसाधन इतने कम हैं कि वो कोई बड़े संरचनात्मक प्रोजेक्ट शुरु नहीं कर पाते। इससे देश में कुछ ही जगह शहरीकरण हो पाया है। हम देश के हर हिस्से को उत्पादक नहीं बना पाए हैं।

लेकिन इसका दलित हितों से क्या ताल्लुक है ? इस बात का दलित हितों से ये ताल्लुक है कि अगर देश में समान और विकेंद्रीकृत विकास होता है तो एक गरीब आदमी भी कम आमदनी में अपने घर के नजदीक रह सकता है और बचत कर सकता है। एक गरीब आदमी के बच्चे को भी घर के नजदीक युनिवर्सिटी और इंजिनीयरिंग कॉलेज मिले ये विकेंद्रीकरण का मतलब है। ऐसा क्यों है कि इस देश में सारे अच्छे कॉलेज दिल्ली-मुम्बई-पूना और बंगलूरु में ही है ? क्या महज सीटों में आरक्षण देकर एक गरीब के बच्चे को बंगलूरु के कॉलेज में पढ़ने भेजा जा सकता है जहां की फीस 5-8 लाख रुपये है ?

जाहिर है, बड़े शहरों का विकास देश के हित में कतई नहीं है-वे कूड़े के ढ़ेर और स्लम बस्तियों में तब्दील होते जा रहे हैं। वहां रहने का खर्च ज्यादा है, ऑफिस महंगे हैं, जमीन महंगी है और देश की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। दूसरी तरफ समान और विकेंद्रितकृत विकास सभी को विकास का समान मौका देती है और अच्छी जीवनशैली प्रदान करती है। व्यापक अर्थों में ये गरीबों और दलितों के लिए फायदेमंद है।

लेकिन ऐसा तभी हो पाएगा जब राज्यों को ज्यादा वित्तीय अधिकार दिए जाएं। राज्यों को कम से कम केंद्रीय करों में 40 फीसदी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए और कुछ करों की उगाही का भी अधिकार उन्हे मिलना चाहिए।

कुछ ऐतिहासिक वजहों से अपने यहां केंद्र को इतना मजबूत बना दिया गया है कि ये बात अब बड़ी वाधा बन गई है। पंडित नेहरु ने जब संविधान सभा में अपने भाषण में ये बात कही थी तो हालात कुछ और थे-लेकिन अब हम एक परिपक्व और अपेक्षाकृत मजबूत देश बन गए हैं-हमें इस पर विचार करना चाहिए।(जारी)

Saturday, May 23, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत-6

हाल के दिनों में साहित्य और दलित चिंतन में मौलिकता और उभार देखने को आया है। इस सिलसिले में ऐसे लेखकों को खारिज कर देने की प्रबृत्ति भी बढ़ी है जो गैर-दलित हैं। दलित लेखकों का एक वर्ग कहता है कि दलितों को सहानुभूति का लेखन नहीं बल्कि स्व-अनुभूति का लेखन चाहिए। एक ऐसा लेखन जो भोगे हुए यथार्थ पर आधारित हो। लेकिन ऐसा उचित नहीं जान पड़ता। कई दूसरे गैर-दलित लेखक भी हो सकते हैं जिन्होने दलितों जैसे कुछ हालात झेले हों। जातीय और समाजिक भेदभाव की बात अगर छोड़ दी जाए तो आर्थिक आभाव कमोवेश हरेक इंसान को समान रुप से प्रभावित करता है।

दूसरी बात ये है कि अगर कोई गैर-दलित लेखक दलित हितों के बारे में कोई मौलिक विचार पेश करता है तो उसे लेने में क्या बुराई है भले ही वो सहानुभूति ही क्यों न हो। हमें याद रखनी चाहिए कि अमेरिका में अश्वेतों के समर्थन में एक निर्णायक लड़ाई को अंजाम देने वाले शख्स का नाम एब्राहम लिंकन था जो श्वेत था। दूसरी बात ये कि हिंदुस्तान में दलितों के सबसे बड़े हितचिंतक, राजनीतिज्ञ और विचारक बाबा साहेब भीमराव अम्बेदकर को भी एक महाराजा ने विदेश जाने में वित्तीय मदद की थी। कहने का मतलब ये कि नीयत अगर सही हो तो कोई काम बुरा नहीं है।

दलित लेखकों का एक वर्ग इस बात पर जोर दे रहा है कि अगर दलितों तरक्की करनी है तो उन्हे अंग्रेजी सीखनी होगी। ये बात सही है, और दलित ही नहीं- हर वर्ग के लिए सही है। लेकिन हमें याद रखनी चाहिए अग्रेजी सीखना एक क्रमिक प्रक्रिया है और इसके सहारे एक बड़े वर्ग के विकास का लंबे समय तक इंतजार नहीं किया जा सकता। इस वर्ग में दलित ही नहीं कई दूसरे वर्गों के लोग भी शामिल है।

आज के हिंदुस्तान में अंग्रेजी न जानने वाला तकरीबन हर हिंदुस्तानी कई स्तरों पर भेदभाव का शिकार है। तो क्या कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सकता जिससे अंग्रेजी के ज्ञान के बिना भी सम्मानजनक जिंदगी जीने का रास्ता खुलता हो ? जो लोग सिर्फ अंग्रेजी के सहारे विकास की बात करते हैं वे प्रकारांतर से उसी समाजिक समूहों के हाथ में पूरी शक्ति देने की वकालत करते हैं जिसमें दलितों मौजूदगी शून्य से ज्यादा नहीं है। दुर्भाग्य से ये विमर्श आजादी के बाद से ही चल रहा है लेकिन इससे निपटने का कोई रास्ता किसी को नहीं सूझ रहा।

इसके लिए हाल ही का एक उदाहरण देना काफी है। ताजा लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने जब अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करने की बात की तो जिस तरह का हाय तौबा मचा उससे .यहीं लगता है कि प्रवुद्धजनों,, हालात और तंत्र में अग्रेजी ने किस कदर अपना जड़ जमाया है। भाषाई विमर्श दलित हितों से सीधे जुड़ा हुआ है। या तो पूरे हिंदुस्तान में सरकारी स्तर पर अंग्रेजी की संस्थागत और ठोस पढ़ाई की व्यवस्था की जानी चाहिए या फिर उच्च स्तर पर भी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई की माकूल व्यवस्था होनी चाहिए और नौकरियों में अंग्रेजी के आतंक को खत्म किया जाना चाहिए।

लेकिन सवाल ये है कि निजी क्षेत्र क्यों अंग्रेजी छोड़ेगा और क्षेत्रीय भाषाओं को अपनाएगा ? यहां फिर से सरकारी प्रोत्साहन की जरुरत है। सरकार को ऐसा कुछ करना होगा- चाहे वो प्रोत्साहनात्मक हो या निषेधात्मक- कि भाषाई आधार पर किसी से भेदभाव न किया जाए। सरकार क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भाषा में कामकाज करनेवाली कंपनी को प्रोत्साहित कर सकती है। इसके आलावा सरकार क्षेत्रीय भाषाओं में ज्ञान के कई विषयों की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहन दे सकती है। हरेक भाषा में अनुवाद और मौलिक लेखन को प्रोत्साहित कर के सामग्री की उपलब्धता को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए बड़ी इच्छाशक्ति की आवश्यकता है जो हमारे नेतृत्व में नहीं दिखती।(जारी)

Friday, May 22, 2009

दलित, समाज, सरकार और हकीकत-5

सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है। आज के युग में जब अधिकांश नौकरियां निजी क्षेत्र से आ रहीं हैं तो दलितों के लिए यहां दोहरा संकट है। एक तो यहां आरक्षण नहीं है दूसरी बात ये अंग्रेजी एक बड़ी वाध्यता है। निजी क्षेत्र की अधिकांश अच्छी नौकरियों में अंग्रेजी का ज्ञान जरुरी है। यहां अगर सरकार और निजी क्षेत्र मिलजुल कर काम करे तो बात बन सकती है। इसका अच्छा उदाहरण मायावती का फॉर्मूला हो सकता था जिसमें एक खास फीसदी में दलितों को आरक्षण देने पर सरकार नजी क्षेत्रों को कुछ रियायते देती। लेकिन ये फॉर्मूला पूरे देश के स्तर पर लागू नहीं हो पाया है।

दूसरी बात ये कि कई नौकरियां ऐसी हैं जहां तकनीकी दक्षता की ज्यादा जरुरत होती है और भाषाई ज्ञान कम चाहिए होता है। सरकार ऐसे क्षेत्रों को तलाश कर दलितों के बच्चों को वहां पढ़ा सकती है जिससे वो आसानी से नौकरी हासिल कर सकें। सरकार को ज्यादा से ज्यादा आईटीआई और वोकेशनल कोर्स के संस्थान खोलने चाहिए या फिर प्राइवेट क्षेत्र को इसमें पूंजी लगाने के लिए हौसलाआफजाई करनी चाहिए। हमारे देश में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी तो पैदा हो गई है लेकिन यहां जरुरत इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा छोटी नौकरियां पैदा की जाएं जिससे लाखों लोगों को खपाया जा सके।

हमारे यहां कृषि क्षेत्र को अभीतक पूरी तरह खंगाला नहीं गया है। जैसा कि मैंने हरियाणा में देखा-वहां की सरकार अब कृषि उत्पादन बढ़ाने की जगह कृषि विविधिकरण पर जोर दे रही है। चूंकि देश अब खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गया है इसलिए खेती को ऐसे दिशा में मोड़ने में जरुरत है कि कम जमीन में ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो सके। देश में अब फलों, सब्जियों और अन्य वाणिज्यिक खेती को बढ़ावा देने की नीति पर विचार होनी चाहिए। दुग्ध उत्पादन, अंडा, मांस, मधुमक्खी, मशरुम और मछली के उत्पादन पर सरकार को बड़ी नीति बनाने की जरुरत है। इससे रोजगार का विकेंद्रीकरण होगा और बड़ी आबादी को फायदा होगा जिससे दलित भी लाभान्वित होंगे।

दूसरी बात दलितों में कई ऐसी जातियां हैं जो हस्तकरघा और कलाकृतियां बनाती हैं। बांस की टोकड़िया, चटाईयां, बेंत की कुर्सियां और मिट्टी के बरतन जैसी कई चीजें हैं जो अभी तक सिर्फ स्थानीय बाजार में ही खपती है। बड़े पैमाने पर इनके कारोबार की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार को इस दिशा में भी सोचना होगा। हमारी सरकार इन सब चीजों को लेकर उदासीन है। हमने कोई ऐसी बड़ी नीति नहीं बनाई है या उसे बढ़ावा नहीं दिया है कि इसका बाजार बन सके और इसका विज्ञापन हो। हमें इन सब बातों को चिह्नित करना होगा कि वे कौन से तरीके हैं जिससे आमलोगों को फायदा हो।(जारी)